पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ७५
नागिनि के परसंग जीव कै भच्छक सोई ।
पहरू कीजै चोर कुसल कहवाँ से होई ॥
रूई के घर बीच तहाँ पावक लै राखै ॥
बालक आगे जहर राखि करिके वा चाखै ॥
कनक धार जो होय ताहि ना अंग लगावै ।
खाया चाहै खीर गाँव में सेर बसावै ।
पलटू माया से डेरै करै भजन में भंग ।
कुसल कहाँ से पाइये नागिनि के परसंग ॥
( १८८ )
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन देखा चारिउ खूँट ॥
देखा चारिउ खूँट माया से बचै न कोई ।
राजा रंक फकीर माया के बसि में होई ॥
सब को बसि में करै जगत को माया जीती ।
आपु न बसि में होय रहै वह सब से रीती ॥
हरि को देइ भुलाय अमल वह अपना करती ।
ऐसी है वह नारि खसम को नाहीं डरती ॥
पलटू सब संसार को माया लीन्हो लूट ।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन देखा चारिउ खूँट ॥
( १८६ )
मन माया छोड़ै नहीं बधै आपु से जाय ।
बधै आपु से जाय गही ज्यों मरकट मूठी ।
ज्यों नलनी का सुआ बात सब ऐसी झूठी ॥
छोड़ै नहीं आपु भरम में पड़ा गँवारा ।
खैंचि लेय जो हाथ कोऊ ना पकड़नहारा ॥
जिव लै बचै तो भागु भूलि गइ सब चतुराई ।
रोवन लागे पूत काल ने पकरा आई ॥
पलटू आसा बधिक है लालच बुरी बलाय ।