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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८५
मन करु सालिग्राम पूजते हाथ पिराने ।
धावत तीरथ बरत रैनि दिन गोड़ खियाने ॥
माला फेरि न जाय परे अँगुरिन में घट्टा ।
राम बोलि न जाय जीभ में लागै लट्ठा१॥
निति उठि चन्दन देत माथ कै लोहू सोखा ।
बालभोग के खात मिट्यो ना मन का धोखा ॥
जल पषान के पूजते सरा न एकौ काम ।
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिग्राम ॥
( २१३ )
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
सब को लागै टेढ़ बूझ बिनु कौन बतावै ।
आपु चलै सब टेढ़ टेढ़ हम को गोहरावै ॥
हम रहते निहकरम नाहिं करमन की आसा ।
तुम्हरे तीरथ बरत बहुरि मूरति बिस्वासा ॥
हमरे केवल राम आन को नाहीं जानों ।
तुम्हरे देवता पित्र भूत की पूजा मानो ॥
पलटू उलटा लोग सब नाहक करते खेढ़२ ।
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
( २१४ )
मैं अपने रँग बावरी जरि जरि मरते लोग ॥
जरि जरि मरते लोग सोच नाहक को करते ।
पर संपति को देखि मूढ़ बिनु मारे मरते ॥
ना काहू की जाति पाँति हम बैठन जाई ।
लोग करै चौवाव३ एक को एक बुलाई ॥
चलिहौं सूधी चाल राम के मारग माहीं ।
देव पितर तजि करम मानों काहू को नाहीं ॥
(१) लासा बंध जाना । (२) रार, झगड़ा । (३) निन्दा ।