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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

५० कुंडलिया
लालच रोगिया करै बैद को दोस लगावै ।
तनिक नहीं बिस्वास आँख कहवाँ से पावै ॥
एक होय तो कहौं गाँव का गाँव बिगरा ।
दिवसै दीपक बारि पाप का सेते डगरा १॥
पलटू सब संसार के माड़ा गया है छाय ।
अंजन देय न ज्ञान का अन्धा भया बनाय ॥
( २०० )
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
धोखा रहा समाय जानै दूजा है कोई ।
भीतर बाहर एक तसल्लो २ देखे होई ॥
जो देखा सो गया रहा जो देखा नाहीं ।
चोकर लड्डू खाँड़ खाय दोऊ पछिताहीं ॥
जोई पहुँचा जाय सोई उस घर का मालिक ।
रहे नाम में डूबि ठिकाने पहुँचे सालिक ३॥
पलटू परदा टारि दे दिल का धोखा जाय ।
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
( २०१ )
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ४॥
आगे लिहिनि तकाय पाछे की मरम न जानी ।
ज्यों ज्यों आगे जाय दिनों दिन अधिक दुरानी ॥
फिरि के ताकै नाहिं बस्तु कहवाँ से पावै ।
ज्यों मिरगा कै बास भरम कै जन्म गवावै ॥
अरुझा बेद पुरान ज्ञान बिनु को सुरझावै ।
सतसंगत से बिमुख बस्तु कहवाँ से पावै ॥
पलटू छूटै कर्म ना कैसे सकै उठाय ।


(१) पाप के मारग या भाँडे को रखवाली करते हैं। (२) शांति । (३) अभ्यासी ।
(४) चल दिये ।