पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब को बानी भाग—१ ७६
अपकारी जिव जाहिंगे पलटू अपने आप ॥
( १६७ )
बनियाँ बानि न छोड़ै पसँघा मारे जाय ॥
पसँघा मारे जाय पूर को मरम न जानी ।
निसु दिन तौलै घाटि खोय१ यह परी पुशनी ॥
केतिक कहा पुकारि कहा नहिं करै अनारी ।
लालच से भा पतित सहै नाना दुख भारी ॥
यह मन भा निरलज्ज लाज नहिं करै अपानी ।
जिन हरि पैदा किया ताहि का मरम न जानी ॥
चौरासी फिरि आइ कै पलटू जूती खाय ।
बनियाँ बानि न छोड़ै पसँघा मारे जाय ॥
( १६८ )
संत रतन की कोठरी कुंजी दुष्टन हाथ ॥
कुंजी दुष्टन हाथ अटकि के खोलहिं जाई ।
संत भये परसिद्ध परभुता नाम दिखाई ॥
चकमक भये हैं दुष्ट संत जन जैसे पथरी ।
हरि की प्रभुता आगि प्रगट है वा से निकरी ॥
आगि देखि सब डेरे जगत में भय तब ब्यापी ।
दुष्टन के परताप बस्तु परगट भई ढाँपी ॥
पलटू परदा खुलि गया सबै नवावै माथ ।
संत रतन की कोठरी कुंजी दुष्टन हाथ ॥
॥ कर्म्म भर्म्म—देई देवा ॥
( १६६ )
अंजन देय न ज्ञान का अंधा भया बनाय२ ॥
अंधा भया बनाय बैद की बात न मानै ।
बिषय बयाला३ खाय, करे संजम ना जानै ॥
( १ ) आदत । ( २ ) पूरा । ( ३ ) हवा ।