पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसहज घाट हरि ध्यान ज्ञान से मन परमोथै ।
नहिं संग्रह नहिं त्याग आपनी काया सोधै ॥
० प्रेम भभूत लगाइ धरै धीरज मृगछाला ।
० तिलक उनमुनी भाल जपत है अजपा माला ॥
पलटू ऐसा होय जो सो जोगी परमान ।
भीतर औंटै तत्व को उठै सबद की खानि ॥
(२२५)
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
पलटूदास न लेइ रहै कर जोरे ठाढ़ी ।
सरनागति मैं रहौं सरन बिनु लागै गाढ़ी१ ।
गोड़ दाबि मैं देउँ चरन धै सेवा करिहौं ।
चौका देइहौं लीपि बहुरि मैं पानी भरिहौं ॥
पैंडा देउँ बुहारि सबन कै जूठ उठावौं ।
जनि दुरियावहु मोहिं रहै मैं इहवाँ पावौं ॥
मुक्ति रहै द्वारे खड़ी लट से झाड़ू देइ ।
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
(२२६)
सुरति सुहागिनि उलटि कै मिली सबद में जाय ॥
मिली सबद में जाय कन्त को बसि में कीन्हा ।
चलै न सिव कै जोर जाय जब सक्ती लीन्हा ॥
फिर सक्ती ना रही मिली जब सिव में जाई ।
सिव भी फिर ना रहे सक्ति से सीव कहाई ॥
अपने मन कै फेर और ना दूजा कोई ।
० सक्ती सिव है एक नाम कहने को दोई ॥
पलटू सक्ती सीव का भेद गया अलग़ाय ।
सुरत सुहागिनि उलटि कै मिली सबद में जाय ॥
(१) गाढ़ = दुख ।