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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

७८ कुंडलिया
अँधरन केरि बजार में गया एक डिठियार ॥
( १६५ )
सब अँधरन के बीच एक है काना राजा ॥
काना राजा रहै ताहि कै रैयत आँधा ।
काना को अगुवाइ एक इक पकरिनि काँधा ॥
बीच मिला दरियाव अंध को ठाढ़ कराई ।
लेन गया वह थाह सूँसि¹ लैगा घिसियाई ॥
साँझ आइ नियरानि अंध सब करें बिचारा ।
लाग खान को करन बड़ा सरदार हमारा ॥
आधी रात के बीच सबै मिलि गौगा² लाई ।
भेड़हा³ बोला आय चलो इक एक बुलाई ॥
एक एक तुम चलो नाहिं है बासन⁴ दूजा ।
गरदन धै लैजाय करै ताही की पूजा ॥
पलटू सब को खाय मगन ह्वै भेड़हा गाजा ।
सब अँधरन के बीच एक है काना राजा ॥
॥ दुष्ट ॥
( १६६ )
अपकारी जिव जाहिंगे पलटू अपने आप ॥
पलटू अपने आप संत का सरल सुभाऊ ।
सब को मानहिं भला नाहिं कछु करहिं दुराऊ ॥
लाख दुष्ट जो होइ भला तेहू का मानैं ।
आपन ऐसा जीव संत जन सब का जानैं ॥
अपनी करनी जाय होय जो निंदक कोई ।
आन को गड़हा खनै परैगा आपुहि सोई ॥
जब देखै वह संत को तब चढ़ि आवै ताप⁵ ।
(१) कर्म से भाव हैं। (२) शोर। (३) काल से भाव हैं। (४) बरतन।
(५) बुखार।