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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७३
हाड़ चाम नहिं मास नहीं कछु रूप न रेखा ।
कैसे लागै हाथ नहीं कोउ मन को देखा ॥
छिन में कथै बैराग छिनै में होवै राजा ।
छिन में रोवै हँसे छिनै में आपु बिराजा ॥
पलटू पलकै भरे में लाख कोस पर जाय ।
मन मारे मरता नहीं कीन्हे कोटि उपाय ॥
॥ माया ॥
( १८३ )
माया ठगनी जग ठगा इकहै१ ठगा न कोय ॥
इकहै ठगा न कोय लिये है तिगुर्न गाँसी ।
सुर नर मुनि देय डिगाय करै यह सब की हाँसी ॥
इंद्रहु को यह ठगा ठगा दुर्बासै जाई ।
नारद मुनि को ठगा चली ना कछु चतुराई ॥
सिवसंकर को ठगा बड़े जो नेजाधारी ।
सिंगी ऋषी जवान२ बीछ कै बन में मारी ॥
पलटू इह को सो ठगा जो साचा भक्ता होय ।
माया ठगनी जग ठगा इकहै ठगा न कोय ॥
( १८४ )
माया बड़ी बहादुरी लूटि लिहा संसार ॥
लूटि लिहा संसार केहू को मानै नहीं ।
तनिक उजुर जो करै ताहि को कच्चा खाही ॥
कहूँ कनक कहूँ कामिनि सुन्दर भेष बनावै ।
ताकै जेकरी ओर नजर से मारि गिरावै ॥
जोगी जती औ तपी गुफा से पकरि मँगावै ।
बचै न कोऊ भागि दुपहरै लूटा जावै ॥
(१) इस को । (२) बहादुर ।
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