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सर्वकोश
पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

८८ कुंडलिया
ब्रह्म कोटि कुलीन नीच अब कहिये सोई ॥
उनसे बड़ा न कोय और सब उन के नीचे ।
उन्हें बराबर नहीं कोऊ तिलोकी के बीचे ॥
अबिनासी की गोद में पलटू करै बिलास ।
गनिका गिद्ध अजामिल सदना औ रैदास ॥
॥ निन्दक ॥
( २२० )
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
काम हमारा होय बिना कौड़ी को चाकर ।
कमर बाँधि के फिरै करै तिहुँ लोक उजागर ॥
उसे हमारी सोच पलक भर नाहिं बिसारी ।
लगी रहै दिन रात प्रेम से देता गारी ॥
संत कँहै दृढ़ करै जगत का भरम छुड़ावै ।
निन्दक गुरू हमार नाम से वही मिलावै !
सुनि के निन्दक मरि गया पलटू दिया है रोय ।
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
( २२१ )
निन्दक रहै जो कुसल से हम को जोखों नाहिं ॥
हम को जोखों नाहिं गाँठि कौ साबुन लावै ।
खरचै अपनो दाम हमारी मैल छुड़ावै ॥
तन मन धन सब देहि संत की निन्दा कारन ।
लेहिं संत तेहि तार बड़े वे अधम-उधारन ॥
संत भरोसा बड़ा सदा निन्दक का करते ।
निन्दक की अति प्रीति भाव दूसर नहिं धरते ॥
पलटू वे परसवारथी निन्दक नर्क न जाहिं ।
निन्दक रहै जो कुसल से हम को जोखों नाहिं ॥