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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

६६ कुंडलिया
आखिर बड़े की चूक जोई निकसा सोइ कीन्हा ॥
पलटू मैं पापी बड़ा भूल गया भगवान ।
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
॥ मान ॥
( १६५ )
मान बड़ाई कारने पचि मूआ संसार ॥
पचि मूआ संसार जती जोगी सन्यासी ।
उनहूँ को है चाह गुफा के भीतर बासी ॥
सिद्ध सिद्धई करै प्रभुता कारन जाई ।
गोड़ धरावन हेतु महंत उपदेस चलाई ॥
राजा रंक फकीर फिरै जो खाक लगाये ।
सब के मन में चाह है खुसी बड़ाई पाये ॥
पलटू हरि के भक्त से गई प्रभुता हार ।
मान बड़ाई कारने पचि मूआ संसार ॥
( १६६ )
खुदी खोय१ को खोवै सोई है दुरवेस ॥
सोई है दुरवेस रूह की करै सफाई ।
दिल अंदर दीदार नबी का दरसन पाई ॥
बिन बादल बरसात अबर बिन बरसत पानी ।
गरमी आतस बिना जबाँ बिन बोलत बानी ॥
लामकान२ बेचून३ लाहुत४ को दिल दौड़ावै ।
फना को करै कबूल सोई वह काबा पावै ॥
पलटू जारै फिकर को रहै जिकर५ में पेस ।
खुदी खोयं को खोवै सोई है दुरवेस ॥
( १६७ )
सब कोई पीवै कूप जल खारी पड़ा समुन्द ॥
(१) आदत । (२) अनंत पद । (३) अद्वितीय । (४) सून्य । (५) सुमिरन ।

पलटू साहिबु की बानी भाग—१ ६७

खारी पड़ा समुन्द बड़े सो काम के नाहीं ।
जैसे बड़ी खजूर पथिक को मिलै न छाँहीं ॥
भक्त कहावैं बड़े भेष ना खाय को पावैं ।
पूजें नाहीं साध बड़े घर ही कहवावैं ॥
खान पियन को नाहिं बचन करकसे सुनावैं ।
पर्बत बड़े कठोर नजर दूरहि से आवैं ॥
पलटू संपति सूम की खरचै ना इक बुन्द ।
सब कोइ पीवै कूप जल खारी पड़ा समुन्द ॥
( १६८ )
बढ़ते बढ़ते बढ़ि गये जैसे बढ़ी खजूर ॥
जैसे बढ़ी खजूर पथिक छाया नहिं पावै ।
त्यों त्यो कै जो फरै ताहि कैसे कोउ खावै ॥
पात में काँटा रहै छुवत कै लोहू आवै ।
पेड़ सोऊ बेकाम कुवा को धरन बनावै ॥
सम्पति में बढ़ि जाय दया बिन भला भिखारी ।
जातिहु में बढ़ि जाय भक्ति बिन भला चमारो ॥
पलटू सोभा दो

६८ कुंडलिया
ज्ञान समाधी सुनै और कोउ सुनता नाहीं ॥
पलटू जो कोई सुनै ता के पूरे भाग ।
उलटा कूंवा गगन में तिस में जरै चिराग ॥
[ १७० ]
बंसी बाजी गगन में मगन भया मन मोर ॥
मगन भया मन मोर महल अठवें पर बैठा ।
जहँ उठै सोहंगम सब्द सब्द के भीतर पैठा ॥
नाना उठै तरंग रंग कुछ कहा न जाई ।
चाँद सुरज छिपि गये सुषमना सेज बिछाई ॥
छूटि गया तन यह नेह उन्हीं से लागी ।
दसवाँ द्वारा फोड़ि जोति बाहर है जागी ॥
पलटू धारा तेल की मेलत है गया भोर ।
बंसी बाजी गगन में मगन भया मन मोर ॥
[ १७१ ]
चढ़ै चौमहले महल पर कुंजी आवै हाथ ॥
कुंजी आवै हाथ सब्द का खोलै ताला ।
सात महल के बाद मिलै अठएँ उँजियाला ॥
बिनु कर बाजै तार नाद बिनु रसना गावै ।
महा दोप इक बरै दीप में जाय समावै ॥
दिन दिन लागै रंग सफाई दिल की अपने ।
रस रस मतलब करै सिताबी¹ करै न सपने ॥
पलटू मालिक तुही है कोई न दूजा साथ ।
चढ़ै चौमहले महल पर कुंजी आवै हाथ ॥
[ १७२ ]
चाँद सुरज पानी पवन नहीं दिवस नहिं रात ॥
(१) जल्दी ।

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६६
नहीं दिवस नहि रात नाहिं उतपति संसारा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस नाहिं तब किया पसारा ॥
आदि जोति बैकुंठ सुन्न नहीं कैलासा ।
सेस कमठ दिग्पाल नाहिं धरती आकासा ॥
लोक बेद पलटू नहीं कहौं मैं तब की बात ।
चाँद सुरज पानी पवन नहीं दिवस नहिं रात ॥
( १७३ )
बिनु कागद बिनु अच्छरे बिनु मसि से लिखि देय ॥
बिनु मसि से लिखि देय सोई पंडित कहवावै ।
बिनु रसना कहै बेद अकथ की कथा सुनावै ॥
छुटी बात अस्थूल सूक्ष्म में मिला ठिकाना ।
फिर पोथी क्या पढ़ै अच्छर में आप समाना ॥
निःअच्छर अब मिला अच्छर को क्या ले करना ।
हीरा लागा हाथ पोत की कौन सरहना१ ॥
पलटू पंडित सोई है कमल हाथ नहिं लेय ।
बिनु कागद बिनु अच्छरे बिनु मसि से लिखि देय ॥
( १७४ )
झंडा गड़ा है जाय के हद बेहद के पार ॥
हद बेहद के पार तूर जहँ अनहद बाजै ॥
जगमग जोति जड़ाव सीस पर छत्र बिराजै ॥
मन बुधि चित रहे हार नहीं कोउ वह घर पावै ।
सुरत सब्द रहै पार बीच से सब फिरि आवै ॥
बेद पुरान की गम्म सकै ना उहवाँ जाई ।
तीन लोक के पार तहाँ रोसन रोसनाई ॥
पलटू ज्ञान के परे है तकिया तहाँ हमार ।
(१) क़दर, तारीफ़।

७० | कुंडलिया

झंडा गड़ा है जाय के हद बेहद के पार ॥
( १७५ )
जागत में एक सूपना मोहिं पड़ा है देख ॥
मोहिं पड़ा है देख नदो इक बड़ी है गहिरी ।
ता में धारा तीन बीच में सहर बिलौरी ॥
महल एक अँधियार बरै तहँ गैब की बाती ।
पुरुष एक तहँ रहै देखि छबि वा की माती ॥
पुरुष अलापै तान सुना मैं एक ठो जाई ।
वाहि तान के सुनत तान में गई समाई ॥
पलटू पुरुष पुरान वह रंग रूप नहिं रेख ।
जागत में एक सूपना मोहिं पड़ा है देख ॥
॥ अद्वैत ॥
( १७६ )
जल से उठत तरंग है जल हो माहिं समाय ॥
जल ही माहिं समाय सोई हरि सोई माया ।
अरुझा बेद पुरान नहीं काहू सुरझाया ॥
फूल मँहै ज्यौं बास काठ में आग छिपानी ।
दूध मँहै घिउ रहै नीर घट माहिं लुकानी ॥
जो निर्गुन सो सगुन आर न दूजा कोई ।
दूजा जो कोइ कहै ताहि को पातक होई ॥
पलटू जीव और ब्रह्म से भेद नहीं अलगाय ।
जल से उठत तरंग है जल ही माहिं समाय ॥
( १७७ )
कोटिन जुग परलय गई हमहों करनेहार ।
हमहीं करनेहार हमहि करता के करता ।
जेकर करता नाम आदि में हम हों रहता ॥
मरिहैं ब्रह्मा बिस्नु मृत्यु ना होय हमारी ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७१
मरिहैं सिय१ के लाल मरैगी सिव की नारी ॥
धरती अगिन अकास मुवा है पवन और पानी ।
आदि जोति मरि गई रही देवतन की नानी ॥
पलटू हम मरते नहीं ज्ञानी लेहु विचार ।
कोटिन जुग परलय गई हम हीं करनेहार ॥
( १७८ )
आदि अंत हम हीं रहे सब में मेरो बास ॥
सब में मेरो बास और ना दूजा कोई ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस रूप सब हमरै होई ।
हमहीं उतपति करैं करैं हमहीं संहारा ।
घट घट में हम रहें रहें हम सब से न्यारा ॥०
पारब्रह्म भगवान अंस हमरै कहवाये ।०
हमहीं सोहं सब्द जोति है सुन्न में आये ॥
पलटू देह के धरे से वे साहिब हम दास ।
आदि अंत हम हीं रहे सब में मेरो बास ॥
॥ उलटावती ॥
( १७९ )
गंगा पाछे को बही मछरी चढ़ी पहार ॥
मछरी चढ़ी पहार चूल्ह में फन्दा लाया ।
पुखरा भीटे बाँधि नीर में आग छिपाया ॥
अहिरिन फेकै जाल कुहारिन भैंसि चरावै ।
तेली कै मरिगा बैल बैठि के धुबइन गावै ॥
महुवा में लागा दाख२ भाँग में भया लुबाना३ ।
साँप के बिल के बीच जाय के मूस लुकाना ॥
पलटू संत बिबेकी बुझिहैं सबद सम्हार ।
(१) सिया नाम सीताजी का है—एक पाठ में "सिव" हैं। (२) मुनक्का ।
(३) एक प्रकार की गोंद जो सुगन्धि के लिए जलाई जाती है ।

७२ कुंडलिया
गंगा पाछे को बही मछली चढ़ी पहार ॥
( १८० )
खसम बिचारा मरि गया जोरू गावै तान ॥
जोरू गावै तान फिरा अहिबात¹ हमारा ।
फूट सकल संसार माँग भरि सेंदुर धारा ॥
हम पतिबरता नारि खसम को जियतै मारी ।
वा को मूड़ौं मूड़ सखर जो करै हमारी ॥
दुतिया गइ है भागि सुनौ अब राँध परोसिन ।
पिया मरे आराम मिला सुख मोकहँ दिन दिन ॥
पलटू ऐसे पद कहै बूझै सोइ निरबान ।
खसम बिचारा मरि गया जोरू गावै तान ॥
( १८१ )
खसम मुवा तौ भल भया सिर की गई बलाय ॥
सिर की गई बलाय बहुत सुख हम ने माना ।
लागे मंगल होन बजन लागे सदियाना² ॥
दीपक बरै अकास महल पर सेज बिछाया ।
सूतौं महौं अकेल खबर जब मुए की पाया ।
सूतौं पाँव पसारि भरम की डोरी टूटी ।
मने कौन अब करै खसम बिनु दुबिधा छूटी ॥
पलटू सोई सुहागिनी जियतै पिय को खाय ।
खसम मुवा तौ भल भया सिर की गई बलाय ॥
॥ मन ॥
( १८२ )
मन मारे मरता नहीं कीन्हे कोटि उपाय ॥
कीन्हे कोटि उपाय नहीं कोइ मन की जानै ।
मन के मन में और कोई जनि मन की मानै ॥
(१) सुहाग । (२) खुशी का बाजा ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७३
हाड़ चाम नहिं मास नहीं कछु रूप न रेखा ।
कैसे लागै हाथ नहीं कोउ मन को देखा ॥
छिन में कथै बैराग छिनै में होवै राजा ।
छिन में रोवै हँसे छिनै में आपु बिराजा ॥
पलटू पलकै भरे में लाख कोस पर जाय ।
मन मारे मरता नहीं कीन्हे कोटि उपाय ॥
॥ माया ॥
( १८३ )
माया ठगनी जग ठगा इकहै१ ठगा न कोय ॥
इकहै ठगा न कोय लिये है तिगुर्न गाँसी ।
सुर नर मुनि देय डिगाय करै यह सब की हाँसी ॥
इंद्रहु को यह ठगा ठगा दुर्बासै जाई ।
नारद मुनि को ठगा चली ना कछु चतुराई ॥
सिवसंकर को ठगा बड़े जो नेजाधारी ।
सिंगी ऋषी जवान२ बीछ कै बन में मारी ॥
पलटू इह को सो ठगा जो साचा भक्ता होय ।
माया ठगनी जग ठगा इकहै ठगा न कोय ॥
( १८४ )
माया बड़ी बहादुरी लूटि लिहा संसार ॥
लूटि लिहा संसार केहू को मानै नहीं ।
तनिक उजुर जो करै ताहि को कच्चा खाही ॥
कहूँ कनक कहूँ कामिनि सुन्दर भेष बनावै ।
ताकै जेकरी ओर नजर से मारि गिरावै ॥
जोगी जती औ तपी गुफा से पकरि मँगावै ।
बचै न कोऊ भागि दुपहरै लूटा जावै ॥
(१) इस को । (२) बहादुर ।
१०

७५ कुंडलिया
पलटू डरपै संत से वे मारैं पैजार ॥
माया बड़ी बहादुरी लूटि लिहा संसार ॥
( १८५ )
माया की चक्की चलै पीसि गया संसार ॥
पीसि गया संसार बचै ना लाख बचावै ।
दोऊ पट के बीच कोऊ ना साबित जावै ॥
काम क्रोध मद लोभ चक्की के पीसनहारे ।
तिरगुन डारै झीक१ पकरि कै सबै निकारे ॥
दुरमति बड़ी सयानि सानि कै रोटी पोवै ।
करम तवा में धारि सेंकि कै साबित होवै ॥
तृस्ना बड़ी छिनारि जाइ उन सब घर घाला ।
काल बड़ा बरियार किया उन एक निवाला ॥
पलटू हरि के भजन बिनु कोऊ न उतरै पार ।
माया की चक्की चलै पीसि गया संसार ॥
( १८६ )
नागिनि पैदा करत है आपुइ नागिनि खाय ॥
आपुइ नागिनि खाय नागिनि से कोय न बाचै ।
नेजाधारी सम्भु नागिनि के आगे नाचै ॥
सिंगी ऋषि को जाय नागिनि ने बन में खाई ।
नारद आगे पड़े लहर उन्हूँ को आई ॥
सुर नर मुनि गनदेव सभन को नागिनि लीलै ।
जोगी जती औ तपी नहीं काहू को ढीलै२ ।
सन्त बिबेकी गरुड़ हैं पलटू देखि डेराय ।
नागिनि पैदा करत है आपुइ नागिनि खाय ॥
( १८७ )
कुसल कहाँ से पाइये नागिनि के परसंग ॥

(१) मुट्ठी मुट्ठी अनाज जो चक्की में डालते हैं । (२) छोड़े ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७५
नागिनि के परसंग जीव कै भच्छक सोई ।
पहरू कीजै चोर कुसल कहवाँ से होई ॥
रूई के घर बीच तहाँ पावक लै राखै ॥
बालक आगे जहर राखि करिके वा चाखै ॥
कनक धार जो होय ताहि ना अंग लगावै ।
खाया चाहै खीर गाँव में सेर बसावै ।
पलटू माया से डेरै करै भजन में भंग ।
कुसल कहाँ से पाइये नागिनि के परसंग ॥
( १८८ )
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन देखा चारिउ खूँट ॥
देखा चारिउ खूँट माया से बचै न कोई ।
राजा रंक फकीर माया के बसि में होई ॥
सब को बसि में करै जगत को माया जीती ।
आपु न बसि में होय रहै वह सब से रीती ॥
हरि को देइ भुलाय अमल वह अपना करती ।
ऐसी है वह नारि खसम को नाहीं डरती ॥
पलटू सब संसार को माया लीन्हो लूट ।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन देखा चारिउ खूँट ॥
( १८६ )
मन माया छोड़ै नहीं बधै आपु से जाय ।
बधै आपु से जाय गही ज्यों मरकट मूठी ।
ज्यों नलनी का सुआ बात सब ऐसी झूठी ॥
छोड़ै नहीं आपु भरम में पड़ा गँवारा ।
खैंचि लेय जो हाथ कोऊ ना पकड़नहारा ॥
जिव लै बचै तो भागु भूलि गइ सब चतुराई ।
रोवन लागे पूत काल ने पकरा आई ॥
पलटू आसा बधिक है लालच बुरी बलाय ।

मन माया छोड़ै नहीं भझै आपु से जाय ॥
॥ अज्ञानता ॥
( १६० )
घर में जिन्दा छोड़ि कै मुरदा पूजन जायँ ॥
मुरदा पूजन जायँ भोति को सिरदा१ नावैं ।
पान फूल और खाँड़ जाइ कै तुरत चढ़ावैं ॥
ताल कि माटी आनि ऊँच कै बाँधिनि चौरी ।
लीपि पोति के धरिनि पूरी औ बरा कचौरी ॥
पीयर लूगा२ पहिरि जाइ कै बैठिनि बूढ़ा ।
भरमि भरमि अभुवाई माँगत हैं खसी३ कै मँड़ा ॥
पलटू सब घर बाँटि कै लै लै बैठे खायँ ।
घर में जिंदा छोड़ि कै मुरदा पूजन जायँ ॥
( १६१ )
जियतै देइ गिरास ना मुए परावै पिंड ॥
मुए परावै पिंड कौन है खावनहारो ।
राँध परोसिनि नेवति खवावै ससुरा सारो ॥
पितरन के मुँह छार धोख दै लेइ बड़ाई ।
मुए बैल को घास देहु कहु कैसे खाई ॥
अपने परुसा४ लेइ पित्र को छोड़ै पानी ।
करै पित्र से भूत बड़ो मूरख अज्ञानी ॥
पलटू पुरषा मुक्ति में करत भंड औ भिंड ।
जियतै देइ गिरास ना मुए परावै पिंड ॥
( १६२ )
पानी का को देइ प्यास से मुवा मुसाफिर ॥
मुवा मुसाफिर प्यास डोर औ लुटिया पासै ।
बैठ कुवाँ की जगत जतन बिनु कौन निकालै ॥
(१) सिजदा = दंडवत । (२) कपड़ा । (३) बकरा । (४) परोसा, पत्तल ।

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ७७
आगे भोजन धरा थारि में खाता नाहीं।
भूख भूख करै सोर कौन डारै मुख माहीं ॥
दीया बाती तेल आगि है नाहिं जरावै।
खसम सोया है पास खसम को खोजन जावै ॥
पलटू डगरा१ सूध अटकि कै परता गिर गिर।
पानी का को देइ प्यास से मुवा मुसाफिर ॥
( १६३ )
लहँगा परिगा दाग फूहरि साबुन से धोवै ॥
फूहरि धोवै दाग छुटै ना और बढ़ावै।
ज्यों ज्यों मलै बनाय सारे लहँगा फैलावै ॥
गाफिल में गइ सोय खसम को दोष लगावै।
ऐसी फूहरि नारि आप को नाहिं बचावै ॥
धोबी को नहिं देइ घरहिं में आपु छुड़ावै।
इक बेर दिहिसि निखारि लाज से नाहिं दिखावै ॥
पलटू परदा खोलि आपनौ घर घर रोवै।
लहँगा परिगा दाग फूहरि साबुन से धोवै ॥
( १६४ )
अँधरन केरि बजार में गया एक डिठियार ॥
गया एक डिठियार सबै अंधा उठि धाये।
अहमक आये आजु सबै मिलि तारो लाये ॥
डारौ आँखि फोरि रहौ तुम हमरी नाईं ।
सब अँधरन मिलि अंध अंध वा को ठहराई ॥
जँहवाँ लाखन अंध एक क्या करै बिचारा।
सुनै न वा की कोऊ तहाँ डिठियारै हारा ॥
पलटुदास यहि बात को कोऊ न करै बिचार।
(१) रास्ता ।

७८ कुंडलिया
अँधरन केरि बजार में गया एक डिठियार ॥
( १६५ )
सब अँधरन के बीच एक है काना राजा ॥
काना राजा रहै ताहि कै रैयत आँधा ।
काना को अगुवाइ एक इक पकरिनि काँधा ॥
बीच मिला दरियाव अंध को ठाढ़ कराई ।
लेन गया वह थाह सूँसि¹ लैगा घिसियाई ॥
साँझ आइ नियरानि अंध सब करें बिचारा ।
लाग खान को करन बड़ा सरदार हमारा ॥
आधी रात के बीच सबै मिलि गौगा² लाई ।
भेड़हा³ बोला आय चलो इक एक बुलाई ॥
एक एक तुम चलो नाहिं है बासन⁴ दूजा ।
गरदन धै लैजाय करै ताही की पूजा ॥
पलटू सब को खाय मगन ह्वै भेड़हा गाजा ।
सब अँधरन के बीच एक है काना राजा ॥
॥ दुष्ट ॥
( १६६ )
अपकारी जिव जाहिंगे पलटू अपने आप ॥
पलटू अपने आप संत का सरल सुभाऊ ।
सब को मानहिं भला नाहिं कछु करहिं दुराऊ ॥
लाख दुष्ट जो होइ भला तेहू का मानैं ।
आपन ऐसा जीव संत जन सब का जानैं ॥
अपनी करनी जाय होय जो निंदक कोई ।
आन को गड़हा खनै परैगा आपुहि सोई ॥
जब देखै वह संत को तब चढ़ि आवै ताप⁵ ।
(१) कर्म से भाव हैं। (२) शोर। (३) काल से भाव हैं। (४) बरतन।
(५) बुखार।

पलटू साहिब को बानी भाग—१ ७६
अपकारी जिव जाहिंगे पलटू अपने आप ॥
( १६७ )
बनियाँ बानि न छोड़ै पसँघा मारे जाय ॥
पसँघा मारे जाय पूर को मरम न जानी ।
निसु दिन तौलै घाटि खोय१ यह परी पुशनी ॥
केतिक कहा पुकारि कहा नहिं करै अनारी ।
लालच से भा पतित सहै नाना दुख भारी ॥
यह मन भा निरलज्ज लाज नहिं करै अपानी ।
जिन हरि पैदा किया ताहि का मरम न जानी ॥
चौरासी फिरि आइ कै पलटू जूती खाय ।
बनियाँ बानि न छोड़ै पसँघा मारे जाय ॥
( १६८ )
संत रतन की कोठरी कुंजी दुष्टन हाथ ॥
कुंजी दुष्टन हाथ अटकि के खोलहिं जाई ।
संत भये परसिद्ध परभुता नाम दिखाई ॥
चकमक भये हैं दुष्ट संत जन जैसे पथरी ।
हरि की प्रभुता आगि प्रगट है वा से निकरी ॥
आगि देखि सब डेरे जगत में भय तब ब्यापी ।
दुष्टन के परताप बस्तु परगट भई ढाँपी ॥
पलटू परदा खुलि गया सबै नवावै माथ ।
संत रतन की कोठरी कुंजी दुष्टन हाथ ॥
॥ कर्म्म भर्म्म—देई देवा ॥
( १६६ )
अंजन देय न ज्ञान का अंधा भया बनाय२ ॥
अंधा भया बनाय बैद की बात न मानै ।
बिषय बयाला३ खाय, करे संजम ना जानै ॥
( १ ) आदत । ( २ ) पूरा । ( ३ ) हवा ।

तृतीय भाग: अरिल्ल, साखी एवं पद संग्रह उपसंहार

५० कुंडलिया
लालच रोगिया करै बैद को दोस लगावै ।
तनिक नहीं बिस्वास आँख कहवाँ से पावै ॥
एक होय तो कहौं गाँव का गाँव बिगरा ।
दिवसै दीपक बारि पाप का सेते डगरा १॥
पलटू सब संसार के माड़ा गया है छाय ।
अंजन देय न ज्ञान का अन्धा भया बनाय ॥
( २०० )
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
धोखा रहा समाय जानै दूजा है कोई ।
भीतर बाहर एक तसल्लो २ देखे होई ॥
जो देखा सो गया रहा जो देखा नाहीं ।
चोकर लड्डू खाँड़ खाय दोऊ पछिताहीं ॥
जोई पहुँचा जाय सोई उस घर का मालिक ।
रहे नाम में डूबि ठिकाने पहुँचे सालिक ३॥
पलटू परदा टारि दे दिल का धोखा जाय ।
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
( २०१ )
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ४॥
आगे लिहिनि तकाय पाछे की मरम न जानी ।
ज्यों ज्यों आगे जाय दिनों दिन अधिक दुरानी ॥
फिरि के ताकै नाहिं बस्तु कहवाँ से पावै ।
ज्यों मिरगा कै बास भरम कै जन्म गवावै ॥
अरुझा बेद पुरान ज्ञान बिनु को सुरझावै ।
सतसंगत से बिमुख बस्तु कहवाँ से पावै ॥
पलटू छूटै कर्म ना कैसे सकै उठाय ।


(१) पाप के मारग या भाँडे को रखवाली करते हैं। (२) शांति । (३) अभ्यासी ।
(४) चल दिये ।

पलटू साहिब की बानी भाग १ 59
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ॥
( २०२ )
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
छिल छिल जाता अंग धसन भेड़ी की देखा ।
करम बड़ा परधान गड़ी पत्थर पर मेखा ॥
साच बात को मेटि झूठ कौ जाल पसारा ।
जल पषान के बीच बहै सब सुधी धारा ॥
परघट है भगवान सकल घट सूझत नाहीं ।
जीव से करते द्रोह भरमना पूजन जाहीं ॥
पलटू मैं का से कहौं कुवाँ पड़ी है भंग ।
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
( २०३ )
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
ढूँढ़त फिरै पहार नहीं घट की सुधि जानै ।
जप तप तीरथ बरत जाय के तिल तिल छानै ॥
गई आप को भूलि और की बात न मानै ।
चूल्है लड़िका रहै चतुरई अपनी ठानै ॥
भरमी फिरै भुलान जाइ कै देस देसान्तर ।
लड़िका से नहिं भेट मिलत है पानी पाथर ॥
पलटू सतसंगति करै भूल में वाही सार१ ।
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
( २०४ )
सूधी मारग में चलौं हँसै सकल संसार ॥
हँसै सकल ससार करम की राह बताई ।
लोक बेद की राह चला हम से नहिं जाई ॥
सूधी लिह्ना तकाय राह संतन की पाई ।
(१) भूल मिटाने को सतसंग ही सार जतन है।
११

८२ कुंडलिया
मन में भया अनन्द छूटि गइ सब दुचिताई ॥
उन कै इहवै हेतु¹ रह यह हमरी आवै ।
इहै बूझि कै हँसै हाथ से निबुका² जावै ॥
पलटू सब का एक मत को अब करै बिचार ।
सुधी मारग मैं चलौं हँसै सकल संसार ॥
(२०५)
भरमि भरमि सब जग मुवा झूठा देवा सेव ॥
झूठा देवा सेव नाम को दिया भुलाई ।
बाँधे जमपुर जाहिं काल चोटी घिसियाई ॥
पानी से जिन पिंड गरभ के बीच सँवारा ।
ऐसा साहिब छोड़ि जन्म औरै से हारा ।
ऐसे मूरख लोग खबर ना करैं अपानी ।
सिरजनहारा छोड़ि पूजते भूत भवानी ॥
पलटू इक गुरुदेव बिनु दूजा कोय न देव ।
भरमि भरमि सब जग मुवा झूठा देवा सेव ॥
(२०६)
संत चरन को छोड़ि कै पूजत भूत बैताल ॥
पूजत भूत बैताल मुए पर भूतै होई ।
जेकर जहवाँ जीव अन्त को होवै सोई ॥
देव पितर सब झूठ सकल यह मन की भ्रमना ।
यही भरम में पड़ा लगा है जीवन मरना ॥
देई देवा सेइ परम पद केहि ने पावा ।
भैरौ दुर्गा सीव बाँधि कै नरक पठावा ॥
पलट अंत घसीटिहै चोटी धरि धरि काल ।
संत चरन को छोड़ि कै पूजत भत बैताल ॥
(१) संसार का यही अभिप्राय है । (२) निकला ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८३
( २०७ )
लिये कुल्हाड़ी हाथ में मारत अपने पाँय ॥
मारत अपने पाँय पूजत है देई देवा ।
सतगुरु संत बिसारि करै भूतन की सेवा ॥
चाहै कुसल गँवार अमी दै माहुर खावै ।
मने किये से लड़ै नरक में दौड़ा जावै ॥
पौंडै१ जल के बीच हाथ में बाँधे रसरी ।
परै भरम में जाइ ताहि को कैसे पकरी ॥
पलटू नर तन पाइ कै भजन मँहै अलसाय ।
लिये कुल्हाड़ी हाथ में मारत अपने पाँय ॥
( २०८ )
सात पुरी हम देखिया देखे चारो धाम ॥
देखे चारो धाम सबन माँ पाथर पानी ।
करमन के बसि पड़े मुक्ति की राह भुलानी ॥
चलत चलत पग थके छीन भइ अपनी काया ।
काम क्रोध नहिं मिटे बैठ कर बहुत नहाया ॥
ऊपर डाला धोय मैल दिल बीच समाना ।
पाथर में गयो भूल संत का मरम न जाना ॥
पलटू नाहक पचि मुए सन्तन में है नाम ।
सात पुरी हम देखिया देखे चारो धाम ॥
( २०६ )
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटी बीनन जाय ॥
टेंटी बीनन जाय जानै येही है मेवा ।
तीरथ मँहै नहाय करै मूरति की सेवा ॥
छोड़ि बोलता ब्रह्म करै पथरे की पूजा ।
खसम न आवै पास नारि जब खोजै दूजा ॥
(१) तैरै।

८४ कुंडलिया
सूखा हाड़ चबाय स्वान मुख आवै लोहू ।
है हाड़ के भोर१ भेद ना जानै वोहू ॥
पलटू आगे धरा है आप से नाहीं खाय ।
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटो बीनन जाय ॥
( २१० )
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
लगवारन से प्रीति जीव से द्रोह बढ़ावै ।
पूजत फिरै पषान नहीं जो बोलै खावै ॥
सम्मै पूरन ब्रह्म ताहि को तनिक न मानै ।
करै नटी२ को काम लोक पतिबरता जानै ॥
उदर पालना करै नाम ठाकुर को लेई ।
सर्ब जीव भगवान ताहि को तनिक न सेई ॥
पलटू सबै सराहिये जरै जगत की रीति ।
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
( २११ )
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
बिस्वा होइ गइ बाँझ जाहि के पुरुष घनेरे ।
नाहिं एक की आस फिरै घर घर बहुतेरे ॥
एक केरि होइ रहै दुसर से होइ गलानी३ ।
तुरत गरभ रहि जाइ सिवाती४ चात्रिक पानी ॥
राम पुरुष को छोड़ि करै देवतन की पूजा ।
बिस्या की यह रीति खसम तजि खोजै दूजा ॥
पलटू बिना बिचार से मूरख डूबै माँझ५ ।
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
( २१२ )
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिगराम ॥
(१) भूल । (२) हरजाई । (३) घिन । (४) स्वांति । (५) मंझधार में ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८५
मन करु सालिग्राम पूजते हाथ पिराने ।
धावत तीरथ बरत रैनि दिन गोड़ खियाने ॥
माला फेरि न जाय परे अँगुरिन में घट्टा ।
राम बोलि न जाय जीभ में लागै लट्ठा१॥
निति उठि चन्दन देत माथ कै लोहू सोखा ।
बालभोग के खात मिट्यो ना मन का धोखा ॥
जल पषान के पूजते सरा न एकौ काम ।
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिग्राम ॥
( २१३ )
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
सब को लागै टेढ़ बूझ बिनु कौन बतावै ।
आपु चलै सब टेढ़ टेढ़ हम को गोहरावै ॥
हम रहते निहकरम नाहिं करमन की आसा ।
तुम्हरे तीरथ बरत बहुरि मूरति बिस्वासा ॥
हमरे केवल राम आन को नाहीं जानों ।
तुम्हरे देवता पित्र भूत की पूजा मानो ॥
पलटू उलटा लोग सब नाहक करते खेढ़२ ।
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
( २१४ )
मैं अपने रँग बावरी जरि जरि मरते लोग ॥
जरि जरि मरते लोग सोच नाहक को करते ।
पर संपति को देखि मूढ़ बिनु मारे मरते ॥
ना काहू की जाति पाँति हम बैठन जाई ।
लोग करै चौवाव३ एक को एक बुलाई ॥
चलिहौं सूधी चाल राम के मारग माहीं ।
देव पितर तजि करम मानों काहू को नाहीं ॥
(१) लासा बंध जाना । (२) रार, झगड़ा । (३) निन्दा ।