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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

६६ कुंडलिया
आखिर बड़े की चूक जोई निकसा सोइ कीन्हा ॥
पलटू मैं पापी बड़ा भूल गया भगवान ।
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
॥ मान ॥
( १६५ )
मान बड़ाई कारने पचि मूआ संसार ॥
पचि मूआ संसार जती जोगी सन्यासी ।
उनहूँ को है चाह गुफा के भीतर बासी ॥
सिद्ध सिद्धई करै प्रभुता कारन जाई ।
गोड़ धरावन हेतु महंत उपदेस चलाई ॥
राजा रंक फकीर फिरै जो खाक लगाये ।
सब के मन में चाह है खुसी बड़ाई पाये ॥
पलटू हरि के भक्त से गई प्रभुता हार ।
मान बड़ाई कारने पचि मूआ संसार ॥
( १६६ )
खुदी खोय१ को खोवै सोई है दुरवेस ॥
सोई है दुरवेस रूह की करै सफाई ।
दिल अंदर दीदार नबी का दरसन पाई ॥
बिन बादल बरसात अबर बिन बरसत पानी ।
गरमी आतस बिना जबाँ बिन बोलत बानी ॥
लामकान२ बेचून३ लाहुत४ को दिल दौड़ावै ।
फना को करै कबूल सोई वह काबा पावै ॥
पलटू जारै फिकर को रहै जिकर५ में पेस ।
खुदी खोयं को खोवै सोई है दुरवेस ॥
( १६७ )
सब कोई पीवै कूप जल खारी पड़ा समुन्द ॥
(१) आदत । (२) अनंत पद । (३) अद्वितीय । (४) सून्य । (५) सुमिरन ।