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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

४६ कुंडलिया

पलटू कबहुँ ना मरै होय न जिव का नास ।
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
( ११५ )
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
ज्यों छुरी तरबूज कुसल दोऊ बिधि नाहीं ।
गिरै गिराये घाव लगे तरबूजै माहीं ॥
कनक - कामिनी बड़ी दोऊ है तीछन¹ धारा ।
तब बचिहै तरबूज रहै छुरी से न्यारा ॥
छोट बड़ा कतलाम नहीं छुरी को दाया ।²
बचे बिबेकी संत गये जिन अंग लगाया ॥
पलटू उन से बैर है पड़े न मूरख बूझ ।
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
( ११६ )
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
बिहतर कद्दू होय संत से नइ³ कै चलिये ।
जुरै सो आगे धरै गोड़ धै सेवा करिये ॥
आपन जीवन जनम सुफल कै वह दिन जानै ।
देखत नैन जुड़ाय सीतलता मन में आनै ॥
अंतर नाहीं करै मन बच⁴ से लावै सेवा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस संत हैं तीनों देवा ॥
सीस नवावै संत को सीस बखानौ सोइ ।
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
( ११७ )
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
मरना किया कबूल मरै से बचै न कोई ।


(१) तेज । (२) छुरी निर्दईपने से सब छोटू बड़े का कतल या खून करती है।
(३) झुक कर । (४) बचन ।

दसचौदह१ औतार काल के बसि में होई ॥
सुर नर मुनि सब देव मुए सब मौत अपानी ॥
देव पितर ससि भानु पवन नभ धरती पानी ॥
राजा रंक फकीर सूर और बीर करारी ।
साधु सती औ अगिन मुए जिन सब को जारी ॥
पलटू आगे मरि रहौ आखिर मरना मूल ।
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
( ११८ )
समुझावै सो भी मरै पलटू को पछिताय ॥
पलटू को पछिताय दिना दस सबै मुसाफिर ।
हिलि मिलि रहैं सराय भोर भये पंथ पड़ा सिर ॥
इक आवै इक जाय रहै ना पैंड़ा खाली ।
इक ओर काटो जाय दूसरा लावै माली ॥
बूढ़ा बारा ज्वान नहीं है कोई इस्थिर ।
सबै बटाऊ लोग काहे को पचिये मरि मरि ॥
मरने वाला मरि गया रोवै सो मरि जाय ।
समुझावै सो भी मरै पलटू को पछिताय ॥
( ११९ )
तुझे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
अपनी ओर निबेर छोड़ि गुड़ बिष को खावै ।
कूँवाँ में तू परै और को राह बतावै ॥
औरन को उँजियार मसालची जाइ अँधेरे ।
त्यों ज्ञानी की बात मया से रहते घेरे ॥२
बेचत फिरैं कपूर आप तो खारी खावै ।
घर में लागी आग दौरि के घूर बुतावै ॥


(१) औतारों की संख्या चौबीस है। (२) माया में डूबा है और मुँह से ज्ञान
कथता है ।

पलटू यह साची कहै अपने मन का फेर ।
तुम्हे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
( १२० )
बहता पानी जात है धोउ सिताबी१ हाथ ॥
धोउ सिताबी हाथ करौ कछु नीकी करनी ।
बीस-सात२ है नरक मिली अठएँ२ बैतरनी ॥
तोहि से परिहि सो बयरा३ जम धिकवै भाथी ।
स्वारथ के सब लोग औसर के कोऊ न साथी ॥
आगे बूझि बिचारि करौ डेर वहि दिन केरी ।
संत सभा में बैठु परै नहिं जम की बेरी४ ॥
पलटू हरि जस गाइले येही तुम्हरे साथ ।
बहता पानी जात है धोउ सिताबी हाथ ॥
( १२१ )
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
तिन तिन चले छिपाय प्रगट में होय हरक्कत ।
भीड़ भाड़ से डेरै भीड़ में नहीं बरक्कत ॥
धनी भयो जब आप मिली हीरा की खानी ।
ठग है सब संसार जुगत से चलै अपानी ॥
जो हैं रहते गुप्त सदा वह मुक्ति में रहते ।
उन पर आवै खेद प्रगट जो सब से कहते ॥
पलटू कहिये उसी से जो तन मन दे ले जाय ।
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
( १२२ )
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार ॥


(१) जल्द । (२) नर्कों की संख्या सत्ताईस लिखी है और अट्ठाईसवीं बैतरनो
नदी है जिस को पित्र लोक में पहुँचने के लिए जीव को पार करना पड़ता है । (३) बैर,
बिगाड़ । (४) बेड़ी ।

पलटू साहिब की बानी भाग— १ ४६
तब छूटै संसार जगत से प्रीति न कीजै।
लोभ मोह को जारि सत्य पद मारग लीजै॥
मारै भूख पियास जगत की करै न आसा।
काम क्रोध को जारि तजै सब भोग बिलासा॥
सदा रहै निवृत्त१ चित्त ना अंतै जावै।
मन को लेवै फेरि भजन में जाय लगावै॥
पलटू हिरन के कारने जड़भर्त लिया अवतार२।
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार॥
( १२३ )
तो कहँ कोऊ कछु कहै कीजै अपनो काम॥
कीजै अपनो काम जगत को भूकन दीजै।
जाति बरन कुल खोय संतन को मारग लीजै॥
लोक बेद दे छोड़ि करै कोउ कितनौ हाँसी।
पाप पुन्न दोउ तजौं यही दोउ गर की फाँसी॥
करम न करिहौ एक भरम कोउ लाख दिखावै।
टरै न तेरी टेक कोटि ब्रह्मा समुझावै॥
पलट तनिक न छोड़िहौ जिउ के संगै नाम।
तो कहँ कोऊ कछु कहै कीजै अपनो काम॥
( १२४ )
इहाँ उहाँ कुछ है नहीं अपने मन का फेर॥
अपने मन का फेर सक्ति सिव दूसर नाहीं।
माया से है अंत३ तेहि से बोचे माहीं॥
जब मैं इहवाँ रहा सोच उहवाँ की भारी।
(१) निष्काम। (२) जड़ भरत राजा भरत को कहते हैं जिन्होंने राज-पाट
छोड़ कर बन में भगवत आराधन के लिये बास किया। एक हिरन से इनकी ऐसी गहरी
प्रीत हो गई थी कि उसी के वियोग में प्रान त्याग किया और उस बासना के कारन हिरन
का चोला पाया। (३) अलग।
७

५० कुंडलिया
उहवाँ देखा जाय कुदरत कुल रही हमारी ॥
जोग किये का होय भंगि१ जो आवै नाहीं ।
केतिक कोटिन जोग रहत हैं भंगै१ माहीं ॥
पलटू पावै सहज में सतगुरु की है देर ।
इहाँ उहाँ कुछ है नहीं अपने मन का फेर ॥
( १२५ )
मन की मौज से मौज है और मौज किहि काम ॥
और मौज किहि काम मौज जौ ऐसी आवै ।
आठौ पहर अनन्द भजन में दिवस बितावै ॥
ज्ञान समुद्र के बीच उठत है लहर तरंगा ।
तिरबेनी के तीर सरसुती जमुना गंगा ॥
संत सभा के मध्य सब्द को फड़२ जब लागै ।
पुलकि पुलकि गलतान३ प्रेम में मन को पागै ॥
पलटू रहै बिबेक से छूटै नहिं सतनाम ।
मन की मौज से मौज है और मौज किहि काम ॥
( १२६ )
जो साहिब का लाल है सो पावैगा लाल४ ॥
सो पावैगा लाल जाइ के गोता मारै ।
मरजीवा ह्वै जाय लाल को तुरत निकारै ॥
निसि दिन मारै मौज मिली अब बस्तु अपानी ।
ऋद्धि सिद्धि औ मुक्ति भरत हैं उन घर पानी ॥
वे साहन के साह उन्हें है आस न दूजा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस करें सब उनकी पूजा ॥
पलटू गुरु भक्ती बिना भेष भया कंगाल ।

(१) युक्ति । (२) फड़ = बाजार — दूसरी लिपि में "झड़" है । (३) मतवाला ।
(४) पहिले “लाल” के अर्थ बालक या पुत्र के हैं और दूसरे लाल के अर्थ जवाहर के हैं।

पलटू साहिब की बानी भाग--१ ५१
जो साहिब का लाल है सो पावैगा लाल ॥
( १२७ )
जीव जाय तो जाय दे जन्म जाय बरु नष्ट ॥
जन्म जाय बरु नष्ट लोक की तजो बड़ाई ।
दुख नाना सहि रहो पड़ौ दरबार में जाई ॥
मात पिता निज बन्धु तजौ भगनी सुत नारी ।
तजि दो भोग बिलास सहत रहौ सब की गारी ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान का ढोल बजाओ ।
देखै सब संसार कलाएँ उलटी खाओ ॥
पलटू नाम न छोड़िहौ सहि लो इतना कष्ट ।
जीव जाय तो जाय दे जन्म जाय बरु नष्ट ॥
( १२८ )
खोजत हीरा को फिरै नहीं पोत को दाम ॥
नहीं पोत को दाम जौहरि की गाँठ खुलावै ।
बातन की बकवाद जौहरी को बिलमावै ॥
लम्बी बोलत बात करै बातन की लदनी ।
कौड़ी गाँठि नाहिं करत है बातें इतनी ॥
लिहा जौहरी ताड़¹ फिरा है गाहक खाली ।
थैली लई समेटि दिहा गाहक को टाली ॥
लोक लाज छूटै नहीं पलटू चाहै नाम ।
खोजत हीरा को फिरै नहीं पोत को दाम ॥
( १२६ )
मूरख को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
नाहक होइ अकाज कहे से बात न बूझै ।
अंधा आठौ गाँठि इलाज न पन्थ न सूझै ॥
ब्रह्मा उतरै आय कहे से ज्ञान न आवै ।
( १ ) जान गया ।

५२ कुंडलिया
अमृत दीजै ब्याल¹ नहीं वा को बिष जावै ॥
लगै न भीतर ज्ञान ताहि से मन न मिलावै ।
मारै भाल पषान धसै नहिं उलटा आवै ॥
पलट जो बूझै नहीं बोलै से रहु बाज ।
मूरखै को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
( १३० )
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
बिना बिचार बिबेक भये सब एकै घानी ।
पीना² भा संसार जाठि ऊपर मर्दनी ॥
इतना दुख सब सहैं तूहू पर नाहिं डराते ।
फिर फिर पेरे जायँ कर्म में फिर लपटाते ॥
देखी देखा पड़ै आपु से आपु पेरावै ।
पेरे से जो बचै ताहि को हँसी³ लगावै ॥
पलटू मैं रोवन लगा चलता कोल्हू देख ।
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
( १३१ )
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
करि लो अपना काम सोच मोहिं वा दिन केरी ।
जेहि से कौल करार कौल से आपन हेरी ॥
कीन्हों भक्ति करार जन्म तब मानुष पायो ।
मोकहँ है सो चेत गर्भ के बिच करि आयो ॥
औंधे बासन मँहै नीर जिन्ह लिया उबारी ।
तेकहँ तजि कै रहौं कुसल का होय तुम्हारी ॥
जगत हँसे तो हँसन दे पलटू हँसै न राम ।
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
( १३२ )
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
(१) साँप । (२) मोटा । (३) उस को पाखंडी कह कर संसार हँसता है ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ५३
भक्ति करौ निर्धार लोक की लाज न मानौ ।
देव पितर मुख खाक डारि इक गुरु को जानौ ॥
तजि दो कुल की रीति खोलि घूँघट को नाचौ ।
बेद पुरान मत काच काछनी काछौ साचौ ॥
सुभ आसुभ दोउ काटु पाँव की अपने बेरी ।
निसि दिन रहौ अनन्द कोऊ का करिहै तेरी ॥
पलटू सतगुरु चरन पर डारि देहु सिर भार ।
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
( १३३ )
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
तन मन लज्जा खोय छोड़ि कै मान बड़ाई ।
जाति बरन कुल खोय पड़ौगे सरन में जाई ॥
लाख कोऊ जो हँसै जगत की लाज न मानौ ।
ज्यों हिन्दू त्यों तुरुक सकल घट साहिब जानौ ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान की ढोल बजाओ ।
काटौ जम की फाँस भरम को दूर बहाओ ॥
पलटू बरिहौ¹ नाम को होनो होय सो होय ।
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
( १३४ )
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
ता को सुमिरु गंवार भला अपना जो चाहो ।
झूठा है संसार रैन सपने सा जानो ॥
माता पिता सुत बन्धु झूठ इनको सब जानो ।
सतसंगति हरि भजन सत्त दुइ इनको मानो ॥
और देव सब बृथा आस इन की ना कीजै ।
(१) ब्याहो ।

५४ कुंडलिया
सब देवन के देव हरी अन्तर भजि लीजै ॥
पलटू हरि के भजन बिन कोउ न खतरै पार ।
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
( १३५ )
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
त्यों त्यों गरुई होय सुने संतन की बानी ।
थोपै थोप अघाय ज्ञान के सागर पानी ॥
रस रस बाढ़ै प्रीति दिनों दिन लागन¹ लागी ।
लगत लगत लगि जाय भरम आपुइ से भागी ॥
रस रस चलै सो जाय गिरै जो आतुर² धावै ।
तिल तिल लागै रंग भंगि³ तब सहजै आवै ॥
भक्ति पोढ़ पलटू करै धीरज धरै जो कोय ।
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
( १३६ )
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
आपुइ जाते हारि कथनियाँ बाद४ न आवैं ।
घरे मसलहत करैं बटुरि कै सौ सौ धावैं ॥
आवैं हमरे पास बैठि कै गाल बजावैं ।
उलटा पुलटा कहैं बचन बिपरीत सुनावैं ॥
बोली ठोली करैं छिमा करि चुप मैं मारौं ।
भूँकि भूँकि फिरि जायँ जुगत से उनको टारौं ॥
पलटू हम से लड़न को आवै सब संसार ।
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
( १३७ )
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
करम न कीजै त्याग जक्त की बूझ बड़ाई ।
(१) लगन । (२) जल्दी । (३) युक्ति । (४) बाज़ ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१. ५५
ओहु ओर दारै तोरि एहर कुछ एक न पाई ॥
उत कुल से वे गये नाहिं इत मिला ठिकाना ।
केहू ओर में माहिं बीच के बीच भुलाना ॥
जेहुँ जेहुँ पावै बस्तु तेहुँ तेहुँ करम को छोड़ै ।
खातिर जमा को लेइ जगत से मुहड़ा मोड़ै ॥
पलट पग धरु निरख करि ता तें लगै न दाग ।
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
( १३८ )
दुइ पासाही फकर१ की इक दुनियाँ इक दीन ॥
इक दुनियाँ इक दीन दोऊ को राखै राजी ।
सब की मिलै मुराद गैब की नौबति बाजी ॥
हाथ जोरि मुहताज सिकन्दर रहते ठाढ़े ।
हुकुम बजावहिं भूप जबाँ२ से जो कछु काढ़े ॥
चलै फहम३ की फौज दरोग४ की कोट ढहाई ।
बेदावा तहसोल सबुर कै तलब लगाई ॥
पलट ऐसी साहिबी साहिब रहै तबीन५ ।
दुइ पासाही फकर की इक दुनियाँ इक दीन ॥
( १३६ )
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ।
मूरख पहरा देइ भोर भये आपुइ रोवै ।
साँध परोसी चोर माल धरि गाफिल सोवै ॥
सुनहु साहु धनवंत सबै सम्पति के घाती ।
नहिं कीजै बिस्वास जागत रहिये दिन राती ॥
दिन दिन बढ़ती होइ आन को चित्त न दीजै ।
सब से रहिये दूर केहू को मित्र न कीजै ॥
(१) फकीरी । (२) जुबान, जीभ । (३) बिचार । (४) झूठ । (५) ताबेदार ।

५६ कुंडलिया
पलटू जो ऐसे रहै द्रव्य कोऊ नहिं लेइ ।
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ॥
( १४० )
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
भरम करै संसार होइ आसन से पक्का ।
भली बुरी कोउ कहै रहै सहि सब का धक्का ॥
धीरज धै संतोष रहै दृढ़ है ठहराई ।
जो कछु आवै खाइ बचै सो देइ लुटाई ॥
लगै न माया मोह जगत की छोड़ै आसा ।
बल तजि निरबल होय सबुर से करै दिलासा ॥
काम क्रोध को मारि कै मारै नींद अहार ।
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
( १४१ )
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
पाछे तौ सिर खोलु बचा तुम सुनौ फकीरी ।
हेलुआ जूती एक, नाहिं आवै दिलगीरी १ ॥
रूखा सूखा खाउ मिलै जो गम का टुकड़ा ।
फीका कड़ुवा नाहिं स्वाद सब छोड़ौ झगड़ा ॥
हक हलाल वह जानु सबर से बैठे आवै ।
खाना वही हराम किसी से माँगन जावै ॥
पलटू वह घर राम का बच्चा तू जनि बोलु ।
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
( १४२ )
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
नीच कहै ना कोय गये जब से सरनाई ।
( १ ) नापसंद होना, दुख मानना ।

[Page Header: पलटू साहिब की बानी भाग—१ | ५७]

नारा बहि कै मिल्यो गंग में गंग कहाई ॥
पारस के परसंग लोह से कनक कहावै ॥
आगि मँहै जो परै जरै आगै होइ जावै ॥
राम का घर है बड़ा सकल ऐगुन छिपि जाई ।
जैसे तिल को तेल फूल सँग बास बसाई ॥
भजन केरे परताप तें तन मन निरमल होय ॥
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
( १४३ )
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
करै सिंह को संग सिंह की रहनी रहना ।
अपनो मारा खाय नहीं मुरदा को गहना ॥
नहिं भोजन नहिं आस नहीं इन्द्री की तिष्टा१ ।
आठ सिद्धि नौ निधि ताहि को देखत बिष्टा२ ॥
दुष्ट मित्र सब एक लगै ना गरमी पाला ।
अस्तुति निंदा त्यागि चलत है अपनी चाला ॥
पलटू झूठा ना टिकै जब लगि लगै न रंग ।
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
( १४४ )
स्वाँती को जल एक है अपनी अपनी खानि ॥
अपनी अपनी खानि सीप से मोती कहियै ।
हीरा होइ हिरंज सीस गज मुक्ता लहियै ॥
केश परै कपूर बेन३ तें लोचन४ ब्याला५ ।
अहि मुख जहर समान उपल६ तें लोह कराला ॥
गौ लोचन गौ सीस मिरग मद नाभि तें जानौ ।
भिन्न भिन्न गुन होय नीर एकहि पहिचानौ ॥


(१) चाह । (२) गलोज । (३) बाँस । (४) बंसलोचन । (५) दुष्ट—यह अहि =
सांप का विशेषण है। (६) पत्थर ।
८

५८ कुंडलिया
पलटू खामिंद एक है निसचै प्रेम प्रधान ।
० उपजै बस्तु सुभाव तें अपनी अपनी खानि ॥
( १४५ )
भक्ति बीज जब बोवै निसि दिन करै बिबेक ॥
निसि दिन करै बिबेक लागि तब निकरन साखा ।
डार पात बहु फूल जतन से जिन ने राखा ॥
हरि चरचा से सींचि ज्ञान कै बाँधै बेड़ा ।
पहुँचै सोर पताल खात संतन कै खेड़ा१ ॥
सोभित बृच्छ बिसाल मीठ फल लटकन लागे ।
बिस्वास सोई रखवार बैठि कै पहरा जागै ॥
पलटू यहि बिधि जोगवै उपजै ज्ञान बिसेख ॥
भक्ति बीज जब बोवै निसि दिन करै बिबेक ॥
( १४६ )
पलटू सरबस दीजिये मित्र न कीजै कोय ॥
मित्र न कीजै कोय चित्त दै बैर बिसाहै२ ।
निस दिन होय बिनास ओर वह नाहिं निबाहै ॥
चिन्ता बाढ़ै रोग लगा छिन छिन तन छीजै ।
कम्मर३ गरुवा होय ज्यों ज्यों पानी से भीजै ॥
जोग जुगत की हानि जहाँ चित अंतै जावै ।
भक्ति आपनी जाय एक मन कहूँ लगावै ॥
० राम मिताई ना चलै और मित्र जो होय ।
० पलटू सरबस दीजिये मित्र न कीजै कोय ॥
( १४७ )
रवा४ टूटै रवा फाटै कहिये परदा खोल ॥
कहिये परदा खोल रवा ना बाकी कीजै५ ।
(१) गाँव । (२) मोल ले । (३) कम्मल । (४) चाहे । (५) जर्रा (रवा)
भर न उठाय रक्खो ।

: yes, two slants and a dot. It is "करैं".

Wait, let's check line 8 again:
"रवा टूटै रवा फाटै कहिये परदा खोल ।"
Wait, is there a danda after बोल in line 7 and खोल in line 8?
Line 7 ends with: बोल । (single danda)
Line 8 ends with: खोल । (single danda)
Wait, let's check:
Line 2 ends with: पीजै ॥ (double danda)
Line 3 ends with: अधरमी । (single danda)
Line 4 ends with: सरमी ॥ (double danda)
Line 5 ends with: करनी । (single danda)
Line 6 ends with: ब्योहरनी ॥ (double danda)
Line 7 ends with: बोल । (single danda)
Line 8 ends with: खोल । (single danda)
This is a standard Kundaliya ending structure (the last two lines are a doha or soratha, or kundaliya rhyming lines).

Heading:
॥ ज्ञान ॥
( १४८ )

Pada:
परदा अंदर का टरै देखि परै तब रूप ॥
देखि परै तब रूप मिटै सब मन का धोखा ।
परै सबद टकसार बहुत चोखे से चोखा ॥
[L1

६० कुंडलिया
पलटू सतगुरु रहनि को परखि लेय जो कोय ।
समुझाये से क्या भया जब ज्ञान आपु से होय ॥
( १५० )
ज्ञान समाधि जा को मिली सो क्या लावै ध्यान ॥
सो क्या लावै ध्यान ध्यान दुतिया कहवावै ॥
आप भया पासाह कौन के मुजरे जावै ।
० भजनी१ से भा भजत२ कौन अब आवै जावै ।
लिहा निसाना मारि कौन अब तीर चलावै ॥
मन के संकल्प भजन रूप अपनो दरसावै ।
जो इहवाँ सो उहाँ सँकल्प को दूरि बहावैं ॥
पलटू लगी सो लगि गई कौन होय हैरान ।
ज्ञान समाधि जा को मिली सो क्या लावै ध्यान ॥
( १५१ )
समुझे को समुझावै हीरा आगे पोत ॥
हीरा आगे पोत ज्ञानी को मूढ़ बुझावै ।
जहवाँ आँधी चलै बेना कै बतास३ चलावै ॥
अटकर सेती अंध डिठियारे४ राह बतावै ।
जैसे पंडित चतुर संत से बाद५ न आवै ॥
सुधा क पीवनहार ताहि को छाछ दिखावै ।
जेकरे बाजै तूर तहाँ का डफ्फ बजावै ॥
पलटू दीपक का करै जहँ सूरज की जोत ।
समुझे को समुझावै हीरा आगे पोत ॥
( १५२ )
अपनी अपनी करनी अपने अपने साथ ॥
(१) भजन करने वाला । (२) जिसका भजन किया जाता है । (३) पंखे की हवा ।
(४) आँख वाले को । (५) बाज न आवै, पीछे पड़ा रहै ।

पलटू साहिब की बानी भाग - १ ६१
अपने अपने साथ करै सो आगे आवै ।
बाप कै करनी बाप पूत कै पूतै पावै ॥
जोरू कै जोरूहिं फलै खसम कै खसम कौ फलता ।
अपनी करनी सेती जीव सब पार उतरता ॥
नेकी बदी है संग और ना संगी कोई ।
देखौ बूझि बिचारि संग ये जैहैं दोई ॥
पलटू करनी और की नहीं और के माथ ।
अपनी अपनी करनी अपने अपने साथ ॥
( १५३ )
सरबंगी जो नाम कै रहनी सहित बिबेक ॥
रहनी सहित बिबेक एक करि सब कौ मानै ।
खान पियन में जुदा नहीं एकै में सानै ॥
लिये रहै मर्जाद तजै ना नेम अचारा ।
धर्म सनातन सहित असुभ सुभ करै बिचारा ॥
बोलै सब्द अघोर भजन अद्वैता अंगी ।
कारज निर्मल करै सोई पूरा सरबंगी ॥
पलट बाहर कुल धरम भीतर राखै एक ।
सरबंगी जो नाम कै रहनी सहित बिबेक ॥
॥ शरण और व्रत टेक) ॥
( १५४ )
करम धरम सब छाड़ि कै पड़े सरन में आय ॥
पड़े सरन में आय तजो बल बुधि चतुराई ।
जप तप नेम अचार नहीं जानौं कछु भाई ॥
पूजा ज्ञान न ध्यान तिलक नहिं देवै जानौं ।
जोग जुगत कछु नहीं नहीं तीरथ व्रत मानौं ॥
एक भरोसा पाय दिया सिर भार लराई १ ।
(१) गिरा दिया ।

६२ कुंडलिया
पंछी को पछ¹ गया रहा इक नाम सहाई ॥
पलटू में जियतै मुवा नाम भरोसा पाय ।
करम धरम सब छाड़ि कै पड़े सरन में आय ॥
( १५५ )
पलटू सोवै मगन में साहिब चौकीदार ॥
साहिब चौकीदार मगन होइ सोवन लागे ।
दूनों पाँव पसार देखि कै दुस्मन भागे ॥
जाके सिर पर राम ताहि को बार न बाँकै ।
गाफिल में मैं रहौं आपनी आपुइ ताकै ॥
हम को नाहीं सोच सोच सब उन को भारी ।
छिन भरि परै न भोर² लेत हैं खबर हमारी ॥
लाज तजा जिन राम पर डारि दिहा सिर भार ।
पलटू सोवै मगन में साहिब चौकीदार ॥
( १५६ )
कोउ कितनौ चुगुली करै सुनै न बात³ हमार ॥
सुनै न बात हमार गये जब से सरनाई ।
सब ऐगुन करि माफ लिहिन मोकँह अपनाई ॥
करत फिरौं अन्याय काम ना क्रोध बिचारा ।
कैसेउ पूत कपूत पिता को आखिर प्यारा ।
लोभी लंपट चोर कुकरमी जातिन नीचा ।
अपने सरन की लाज जानि पद दीन्हेउ ऊँचा ॥
पलटू हम से राम से ऐसो भा ब्योहार ।
कोउ कितनौ चुगुली करै सुनै न बात हमार ॥
( १५७ )
जौन काछ कौ काढिये नाच नाचिये सोय ॥
नाच साचिये सोय तबै तौ सोभा पावै ।
(१) पंख । (२) भूल । (३) शिकायत ।

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६३
बिना काछ कै नाच भाँड़ कै स्वाँग बनावै ॥
आदि अंत मधि माहिं जो हरि कौ बर्त निबाहै ।
जीवन ता कौ सुफल निगम दिन राति सराह्रै ॥
बात जीव के संग नाहिं जो हारि ललकरी१ ।
हरि भक्तन की रीति टेक पकरी सो पकरी ॥
पलटू काछ औ नाच से तनिक न तजविज२ होय ।
जौन काछ कौ काछिये नाच नाचिये सोय ॥
( १५८ )
साधु को ऐसा चाहिये ज्यों सिसु३ अड़नि अड़ै ॥
ज्यों सिसु अड़नि अड़ै टेक अपनी नहिं टारै ।
पुरजे पुरजे कटै कोऊ कितनौ जो मारै ॥
धरन धरी सो धरी वही हरि के ब्रत धारी ।
धोये तनिक न छुटै रंग जब चढ़ा करारी ॥
धरन नीबाहै और साँच में दाग न लागै ॥
ज्यों पतिब्रता नारि डिगै ना लाख डिगावै ॥
पलटू लोह की मेख ज्यों पत्थर बीच गड़ै ।
साधु को ऐसा चाहिये ज्यों सिसु अड़नि अड़ै ॥
॥ बिनय ॥
( १५६ )
पतितपावन बाना धर्यो तुमहिं परी है लाज ॥
तुमहिं परी है लाज बात यह हम ने बूझी ।
जब तुम बाना धर्यो नाहिं तब तुम कहँ सूझी ॥
अब तो तारे बनै नहीं तो बाना उतारौ ।
फिर काहे को बड़ा बाच जो कहिकै हारौ ॥
आगहिं तुम गये चूक दोष नहिं दीजै मेरो ।
तुम यह जानत नाहिं पतित होइहैं बहुतेरे ॥
(१) हौसला । (२) तजावज = फर्क । (३) बालक ।

६४ कुंडलिया
पलटू मैं तो पतित हौं किये असुभ सब काज ।
पतितेपावन बाना धर्यो तुमहिं परी है लाज ॥
( १६० )
दीनन पर दाया करौ सुनिये दीनदयाल ॥
सुनिये दीनदयाल दीन को बहुत निवाजा ।
भया अभीखन दीन किया लंकापति राजा ॥
रिपु रावन की बधू दीन है बिनती कीन्हा ।
सिलोचना पति सीस मुक्ति सायुज्य सो दीन्हा ॥
ब्रह्मै कीन्हौ द्रोह गयौ बछरा हरि आनी१ ।
दीन भया जब आय मित्रता वा से मानी ॥
पलटू पावै भक्ति को लेहु जक्त जंजाल ।
दीनन पर दाया करौ सुनिये दीनदयाल ॥
( १६१ )
पलटू पूछै हंस से बिनती कै कर जोर ॥
बिनती कै कर जोर साच तुम बात बतावौ ।
भई साहिबी तोर नर्क से जीव बचावैौ ॥
अंधा पंगुल लूल सबन कौ मिलै ठिकाना ।
इक इक सब के हाथ नाम का द्यो परवाना ॥
संत रूप अवतार लियौ परस्वारथ काजां ।
चौरासी चौखान सबन के तुम हौ राजा ॥
जीव तरै जब जक्त कौ तब तुम बंदीछोर ।
पलटू पूछै हंस से बिनती कै कर जोर ॥
॥ दीनता ॥
( १६२ )
मन मिहीन करि लीजिये जब पिउ लागै हाथ ॥
( १ ) कथा है कि ब्रह्मा श्रीकृष्ण की परीक्षा के लिये उन के सब बछड़े हर कर
अपने लोक को ले गये जिस पर श्रीकृष्ण ने वैसे ही बछड़े तुर्त रच लिये । यह लीला
देख कर ब्रह्मा बहुत लज्जित हुए ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६५
जब पिउ लागै हाथ नीच ह्वै सब से रहना ।
पच्छा पच्छी त्यागि ऊँच बानी नहिं कहना ॥
मान बड़ाई खोय खाक में जीते मिलना ।
गारी कोउ दै जाय छिमा करि चुपके रहना ॥
सब की करै तारीफ आप को छोटा जानै ।
पहिले हाथ उठाय सीस पर सब को आनै १ ।
पलटू सोई सुहागिनी हीरा झलकै माथ ।
मन मिहीन करि लीजिये जब पिव लागै हाथ ॥
( १६३ )
जोग जुगत ना ज्ञान कछु गुरु दासन को दास ॥
गुरु दासन को दास सन्तन ने कीन्ही दाया ।
सहज बात कछु गहिनि छुड़ाइनि हरि की माया ॥
ताकिनि तनिक कटाच्छ भक्ति भूतल २ उर जागी ।
स्वस्ता ३ मन में आई जगत की भ्रमना भागी ॥
भक्ति अभय पद दीन्ह सनातन मारग वा की ।
अविरल ओकर नाम लगै ना कबहीं टाँकी ॥
पलटू ज्ञान न ध्यान तप महा पुरुष कै आस ।
जोग जुगत ना ज्ञान कछु गुरु दासन को दास ॥
( १६४ )
दूसर पलट इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
भक्ति दई तेहि जान नाम पर पकरयो मोकहँ ।
गिरा परा धन पाय छिपायों मैं ले ओकहँ ॥
लिखा रहा कुछ आन कर्म में दीन्हा आनै ॥
जानौं महीं अकेल कोऊ दूसर नहिं जानै ॥
पाछे भा फिर चेत देय पर नाहीं लीन्हा ॥
(१) प्रनाम करै । (२) पृथ्वी भर की । (३) शांति ।
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