पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ कुंडलिया
गंगा पाछे को बही मछली चढ़ी पहार ॥
( १८० )
खसम बिचारा मरि गया जोरू गावै तान ॥
जोरू गावै तान फिरा अहिबात¹ हमारा ।
फूट सकल संसार माँग भरि सेंदुर धारा ॥
हम पतिबरता नारि खसम को जियतै मारी ।
वा को मूड़ौं मूड़ सखर जो करै हमारी ॥
दुतिया गइ है भागि सुनौ अब राँध परोसिन ।
पिया मरे आराम मिला सुख मोकहँ दिन दिन ॥
पलटू ऐसे पद कहै बूझै सोइ निरबान ।
खसम बिचारा मरि गया जोरू गावै तान ॥
( १८१ )
खसम मुवा तौ भल भया सिर की गई बलाय ॥
सिर की गई बलाय बहुत सुख हम ने माना ।
लागे मंगल होन बजन लागे सदियाना² ॥
दीपक बरै अकास महल पर सेज बिछाया ।
सूतौं महौं अकेल खबर जब मुए की पाया ।
सूतौं पाँव पसारि भरम की डोरी टूटी ।
मने कौन अब करै खसम बिनु दुबिधा छूटी ॥
पलटू सोई सुहागिनी जियतै पिय को खाय ।
खसम मुवा तौ भल भया सिर की गई बलाय ॥
॥ मन ॥
( १८२ )
मन मारे मरता नहीं कीन्हे कोटि उपाय ॥
कीन्हे कोटि उपाय नहीं कोइ मन की जानै ।
मन के मन में और कोई जनि मन की मानै ॥
(१) सुहाग । (२) खुशी का बाजा ।