पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० | कुंडलिया
झंडा गड़ा है जाय के हद बेहद के पार ॥
( १७५ )
जागत में एक सूपना मोहिं पड़ा है देख ॥
मोहिं पड़ा है देख नदो इक बड़ी है गहिरी ।
ता में धारा तीन बीच में सहर बिलौरी ॥
महल एक अँधियार बरै तहँ गैब की बाती ।
पुरुष एक तहँ रहै देखि छबि वा की माती ॥
पुरुष अलापै तान सुना मैं एक ठो जाई ।
वाहि तान के सुनत तान में गई समाई ॥
पलटू पुरुष पुरान वह रंग रूप नहिं रेख ।
जागत में एक सूपना मोहिं पड़ा है देख ॥
॥ अद्वैत ॥
( १७६ )
जल से उठत तरंग है जल हो माहिं समाय ॥
जल ही माहिं समाय सोई हरि सोई माया ।
अरुझा बेद पुरान नहीं काहू सुरझाया ॥
फूल मँहै ज्यौं बास काठ में आग छिपानी ।
दूध मँहै घिउ रहै नीर घट माहिं लुकानी ॥
जो निर्गुन सो सगुन आर न दूजा कोई ।
दूजा जो कोइ कहै ताहि को पातक होई ॥
पलटू जीव और ब्रह्म से भेद नहीं अलगाय ।
जल से उठत तरंग है जल ही माहिं समाय ॥
( १७७ )
कोटिन जुग परलय गई हमहों करनेहार ।
हमहीं करनेहार हमहि करता के करता ।
जेकर करता नाम आदि में हम हों रहता ॥
मरिहैं ब्रह्मा बिस्नु मृत्यु ना होय हमारी ।