पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ७१
मरिहैं सिय१ के लाल मरैगी सिव की नारी ॥
धरती अगिन अकास मुवा है पवन और पानी ।
आदि जोति मरि गई रही देवतन की नानी ॥
पलटू हम मरते नहीं ज्ञानी लेहु विचार ।
कोटिन जुग परलय गई हम हीं करनेहार ॥
( १७८ )
आदि अंत हम हीं रहे सब में मेरो बास ॥
सब में मेरो बास और ना दूजा कोई ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस रूप सब हमरै होई ।
हमहीं उतपति करैं करैं हमहीं संहारा ।
घट घट में हम रहें रहें हम सब से न्यारा ॥०
पारब्रह्म भगवान अंस हमरै कहवाये ।०
हमहीं सोहं सब्द जोति है सुन्न में आये ॥
पलटू देह के धरे से वे साहिब हम दास ।
आदि अंत हम हीं रहे सब में मेरो बास ॥
॥ उलटावती ॥
( १७९ )
गंगा पाछे को बही मछरी चढ़ी पहार ॥
मछरी चढ़ी पहार चूल्ह में फन्दा लाया ।
पुखरा भीटे बाँधि नीर में आग छिपाया ॥
अहिरिन फेकै जाल कुहारिन भैंसि चरावै ।
तेली कै मरिगा बैल बैठि के धुबइन गावै ॥
महुवा में लागा दाख२ भाँग में भया लुबाना३ ।
साँप के बिल के बीच जाय के मूस लुकाना ॥
पलटू संत बिबेकी बुझिहैं सबद सम्हार ।
(१) सिया नाम सीताजी का है—एक पाठ में "सिव" हैं। (२) मुनक्का ।
(३) एक प्रकार की गोंद जो सुगन्धि के लिए जलाई जाती है ।