पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग-१ ६६
नहीं दिवस नहि रात नाहिं उतपति संसारा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस नाहिं तब किया पसारा ॥
आदि जोति बैकुंठ सुन्न नहीं कैलासा ।
सेस कमठ दिग्पाल नाहिं धरती आकासा ॥
लोक बेद पलटू नहीं कहौं मैं तब की बात ।
चाँद सुरज पानी पवन नहीं दिवस नहिं रात ॥
( १७३ )
बिनु कागद बिनु अच्छरे बिनु मसि से लिखि देय ॥
बिनु मसि से लिखि देय सोई पंडित कहवावै ।
बिनु रसना कहै बेद अकथ की कथा सुनावै ॥
छुटी बात अस्थूल सूक्ष्म में मिला ठिकाना ।
फिर पोथी क्या पढ़ै अच्छर में आप समाना ॥
निःअच्छर अब मिला अच्छर को क्या ले करना ।
हीरा लागा हाथ पोत की कौन सरहना१ ॥
पलटू पंडित सोई है कमल हाथ नहिं लेय ।
बिनु कागद बिनु अच्छरे बिनु मसि से लिखि देय ॥
( १७४ )
झंडा गड़ा है जाय के हद बेहद के पार ॥
हद बेहद के पार तूर जहँ अनहद बाजै ॥
जगमग जोति जड़ाव सीस पर छत्र बिराजै ॥
मन बुधि चित रहे हार नहीं कोउ वह घर पावै ।
सुरत सब्द रहै पार बीच से सब फिरि आवै ॥
बेद पुरान की गम्म सकै ना उहवाँ जाई ।
तीन लोक के पार तहाँ रोसन रोसनाई ॥
पलटू ज्ञान के परे है तकिया तहाँ हमार ।
(१) क़दर, तारीफ़।