पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ कुंडलिया
पलटू जो ऐसे रहै द्रव्य कोऊ नहिं लेइ ।
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ॥
( १४० )
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
भरम करै संसार होइ आसन से पक्का ।
भली बुरी कोउ कहै रहै सहि सब का धक्का ॥
धीरज धै संतोष रहै दृढ़ है ठहराई ।
जो कछु आवै खाइ बचै सो देइ लुटाई ॥
लगै न माया मोह जगत की छोड़ै आसा ।
बल तजि निरबल होय सबुर से करै दिलासा ॥
काम क्रोध को मारि कै मारै नींद अहार ।
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
( १४१ )
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
पाछे तौ सिर खोलु बचा तुम सुनौ फकीरी ।
हेलुआ जूती एक, नाहिं आवै दिलगीरी १ ॥
रूखा सूखा खाउ मिलै जो गम का टुकड़ा ।
फीका कड़ुवा नाहिं स्वाद सब छोड़ौ झगड़ा ॥
हक हलाल वह जानु सबर से बैठे आवै ।
खाना वही हराम किसी से माँगन जावै ॥
पलटू वह घर राम का बच्चा तू जनि बोलु ।
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
( १४२ )
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
नीच कहै ना कोय गये जब से सरनाई ।
( १ ) नापसंद होना, दुख मानना ।