पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ६५
जब पिउ लागै हाथ नीच ह्वै सब से रहना ।
पच्छा पच्छी त्यागि ऊँच बानी नहिं कहना ॥
मान बड़ाई खोय खाक में जीते मिलना ।
गारी कोउ दै जाय छिमा करि चुपके रहना ॥
सब की करै तारीफ आप को छोटा जानै ।
पहिले हाथ उठाय सीस पर सब को आनै १ ।
पलटू सोई सुहागिनी हीरा झलकै माथ ।
मन मिहीन करि लीजिये जब पिव लागै हाथ ॥
( १६३ )
जोग जुगत ना ज्ञान कछु गुरु दासन को दास ॥
गुरु दासन को दास सन्तन ने कीन्ही दाया ।
सहज बात कछु गहिनि छुड़ाइनि हरि की माया ॥
ताकिनि तनिक कटाच्छ भक्ति भूतल २ उर जागी ।
स्वस्ता ३ मन में आई जगत की भ्रमना भागी ॥
भक्ति अभय पद दीन्ह सनातन मारग वा की ।
अविरल ओकर नाम लगै ना कबहीं टाँकी ॥
पलटू ज्ञान न ध्यान तप महा पुरुष कै आस ।
जोग जुगत ना ज्ञान कछु गुरु दासन को दास ॥
( १६४ )
दूसर पलट इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
भक्ति दई तेहि जान नाम पर पकरयो मोकहँ ।
गिरा परा धन पाय छिपायों मैं ले ओकहँ ॥
लिखा रहा कुछ आन कर्म में दीन्हा आनै ॥
जानौं महीं अकेल कोऊ दूसर नहिं जानै ॥
पाछे भा फिर चेत देय पर नाहीं लीन्हा ॥
(१) प्रनाम करै । (२) पृथ्वी भर की । (३) शांति ।
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