पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू यह साची कहै अपने मन का फेर ।
तुम्हे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
( १२० )
बहता पानी जात है धोउ सिताबी१ हाथ ॥
धोउ सिताबी हाथ करौ कछु नीकी करनी ।
बीस-सात२ है नरक मिली अठएँ२ बैतरनी ॥
तोहि से परिहि सो बयरा३ जम धिकवै भाथी ।
स्वारथ के सब लोग औसर के कोऊ न साथी ॥
आगे बूझि बिचारि करौ डेर वहि दिन केरी ।
संत सभा में बैठु परै नहिं जम की बेरी४ ॥
पलटू हरि जस गाइले येही तुम्हरे साथ ।
बहता पानी जात है धोउ सिताबी हाथ ॥
( १२१ )
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
तिन तिन चले छिपाय प्रगट में होय हरक्कत ।
भीड़ भाड़ से डेरै भीड़ में नहीं बरक्कत ॥
धनी भयो जब आप मिली हीरा की खानी ।
ठग है सब संसार जुगत से चलै अपानी ॥
जो हैं रहते गुप्त सदा वह मुक्ति में रहते ।
उन पर आवै खेद प्रगट जो सब से कहते ॥
पलटू कहिये उसी से जो तन मन दे ले जाय ।
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
( १२२ )
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार ॥
(१) जल्द । (२) नर्कों की संख्या सत्ताईस लिखी है और अट्ठाईसवीं बैतरनो
नदी है जिस को पित्र लोक में पहुँचने के लिए जीव को पार करना पड़ता है । (३) बैर,
बिगाड़ । (४) बेड़ी ।