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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

पलटू साहिब की बानी भाग--१ ५१
जो साहिब का लाल है सो पावैगा लाल ॥
( १२७ )
जीव जाय तो जाय दे जन्म जाय बरु नष्ट ॥
जन्म जाय बरु नष्ट लोक की तजो बड़ाई ।
दुख नाना सहि रहो पड़ौ दरबार में जाई ॥
मात पिता निज बन्धु तजौ भगनी सुत नारी ।
तजि दो भोग बिलास सहत रहौ सब की गारी ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान का ढोल बजाओ ।
देखै सब संसार कलाएँ उलटी खाओ ॥
पलटू नाम न छोड़िहौ सहि लो इतना कष्ट ।
जीव जाय तो जाय दे जन्म जाय बरु नष्ट ॥
( १२८ )
खोजत हीरा को फिरै नहीं पोत को दाम ॥
नहीं पोत को दाम जौहरि की गाँठ खुलावै ।
बातन की बकवाद जौहरी को बिलमावै ॥
लम्बी बोलत बात करै बातन की लदनी ।
कौड़ी गाँठि नाहिं करत है बातें इतनी ॥
लिहा जौहरी ताड़¹ फिरा है गाहक खाली ।
थैली लई समेटि दिहा गाहक को टाली ॥
लोक लाज छूटै नहीं पलटू चाहै नाम ।
खोजत हीरा को फिरै नहीं पोत को दाम ॥
( १२६ )
मूरख को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
नाहक होइ अकाज कहे से बात न बूझै ।
अंधा आठौ गाँठि इलाज न पन्थ न सूझै ॥
ब्रह्मा उतरै आय कहे से ज्ञान न आवै ।
( १ ) जान गया ।