पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished116 पृष्ठ
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५० कुंडलिया
उहवाँ देखा जाय कुदरत कुल रही हमारी ॥
जोग किये का होय भंगि१ जो आवै नाहीं ।
केतिक कोटिन जोग रहत हैं भंगै१ माहीं ॥
पलटू पावै सहज में सतगुरु की है देर ।
इहाँ उहाँ कुछ है नहीं अपने मन का फेर ॥
( १२५ )
मन की मौज से मौज है और मौज किहि काम ॥
और मौज किहि काम मौज जौ ऐसी आवै ।
आठौ पहर अनन्द भजन में दिवस बितावै ॥
ज्ञान समुद्र के बीच उठत है लहर तरंगा ।
तिरबेनी के तीर सरसुती जमुना गंगा ॥
संत सभा के मध्य सब्द को फड़२ जब लागै ।
पुलकि पुलकि गलतान३ प्रेम में मन को पागै ॥
पलटू रहै बिबेक से छूटै नहिं सतनाम ।
मन की मौज से मौज है और मौज किहि काम ॥
( १२६ )
जो साहिब का लाल है सो पावैगा लाल४ ॥
सो पावैगा लाल जाइ के गोता मारै ।
मरजीवा ह्वै जाय लाल को तुरत निकारै ॥
निसि दिन मारै मौज मिली अब बस्तु अपानी ।
ऋद्धि सिद्धि औ मुक्ति भरत हैं उन घर पानी ॥
वे साहन के साह उन्हें है आस न दूजा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस करें सब उनकी पूजा ॥
पलटू गुरु भक्ती बिना भेष भया कंगाल ।
(१) युक्ति । (२) फड़ = बाजार — दूसरी लिपि में "झड़" है । (३) मतवाला ।
(४) पहिले “लाल” के अर्थ बालक या पुत्र के हैं और दूसरे लाल के अर्थ जवाहर के हैं।