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सर्वकोश
पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

५२ कुंडलिया
अमृत दीजै ब्याल¹ नहीं वा को बिष जावै ॥
लगै न भीतर ज्ञान ताहि से मन न मिलावै ।
मारै भाल पषान धसै नहिं उलटा आवै ॥
पलट जो बूझै नहीं बोलै से रहु बाज ।
मूरखै को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
( १३० )
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
बिना बिचार बिबेक भये सब एकै घानी ।
पीना² भा संसार जाठि ऊपर मर्दनी ॥
इतना दुख सब सहैं तूहू पर नाहिं डराते ।
फिर फिर पेरे जायँ कर्म में फिर लपटाते ॥
देखी देखा पड़ै आपु से आपु पेरावै ।
पेरे से जो बचै ताहि को हँसी³ लगावै ॥
पलटू मैं रोवन लगा चलता कोल्हू देख ।
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
( १३१ )
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
करि लो अपना काम सोच मोहिं वा दिन केरी ।
जेहि से कौल करार कौल से आपन हेरी ॥
कीन्हों भक्ति करार जन्म तब मानुष पायो ।
मोकहँ है सो चेत गर्भ के बिच करि आयो ॥
औंधे बासन मँहै नीर जिन्ह लिया उबारी ।
तेकहँ तजि कै रहौं कुसल का होय तुम्हारी ॥
जगत हँसे तो हँसन दे पलटू हँसै न राम ।
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
( १३२ )
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
(१) साँप । (२) मोटा । (३) उस को पाखंडी कह कर संसार हँसता है ।