पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ कुंडलिया
पलटू कबहुँ ना मरै होय न जिव का नास ।
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
( ११५ )
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
ज्यों छुरी तरबूज कुसल दोऊ बिधि नाहीं ।
गिरै गिराये घाव लगे तरबूजै माहीं ॥
कनक - कामिनी बड़ी दोऊ है तीछन¹ धारा ।
तब बचिहै तरबूज रहै छुरी से न्यारा ॥
छोट बड़ा कतलाम नहीं छुरी को दाया ।²
बचे बिबेकी संत गये जिन अंग लगाया ॥
पलटू उन से बैर है पड़े न मूरख बूझ ।
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
( ११६ )
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
बिहतर कद्दू होय संत से नइ³ कै चलिये ।
जुरै सो आगे धरै गोड़ धै सेवा करिये ॥
आपन जीवन जनम सुफल कै वह दिन जानै ।
देखत नैन जुड़ाय सीतलता मन में आनै ॥
अंतर नाहीं करै मन बच⁴ से लावै सेवा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस संत हैं तीनों देवा ॥
सीस नवावै संत को सीस बखानौ सोइ ।
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
( ११७ )
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
मरना किया कबूल मरै से बचै न कोई ।
(१) तेज । (२) छुरी निर्दईपने से सब छोटू बड़े का कतल या खून करती है।
(३) झुक कर । (४) बचन ।