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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

पलटू साहिब की बानी भाग—१. ५५
ओहु ओर दारै तोरि एहर कुछ एक न पाई ॥
उत कुल से वे गये नाहिं इत मिला ठिकाना ।
केहू ओर में माहिं बीच के बीच भुलाना ॥
जेहुँ जेहुँ पावै बस्तु तेहुँ तेहुँ करम को छोड़ै ।
खातिर जमा को लेइ जगत से मुहड़ा मोड़ै ॥
पलट पग धरु निरख करि ता तें लगै न दाग ।
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
( १३८ )
दुइ पासाही फकर१ की इक दुनियाँ इक दीन ॥
इक दुनियाँ इक दीन दोऊ को राखै राजी ।
सब की मिलै मुराद गैब की नौबति बाजी ॥
हाथ जोरि मुहताज सिकन्दर रहते ठाढ़े ।
हुकुम बजावहिं भूप जबाँ२ से जो कछु काढ़े ॥
चलै फहम३ की फौज दरोग४ की कोट ढहाई ।
बेदावा तहसोल सबुर कै तलब लगाई ॥
पलट ऐसी साहिबी साहिब रहै तबीन५ ।
दुइ पासाही फकर की इक दुनियाँ इक दीन ॥
( १३६ )
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ।
मूरख पहरा देइ भोर भये आपुइ रोवै ।
साँध परोसी चोर माल धरि गाफिल सोवै ॥
सुनहु साहु धनवंत सबै सम्पति के घाती ।
नहिं कीजै बिस्वास जागत रहिये दिन राती ॥
दिन दिन बढ़ती होइ आन को चित्त न दीजै ।
सब से रहिये दूर केहू को मित्र न कीजै ॥
(१) फकीरी । (२) जुबान, जीभ । (३) बिचार । (४) झूठ । (५) ताबेदार ।