पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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नारा बहि कै मिल्यो गंग में गंग कहाई ॥
पारस के परसंग लोह से कनक कहावै ॥
आगि मँहै जो परै जरै आगै होइ जावै ॥
राम का घर है बड़ा सकल ऐगुन छिपि जाई ।
जैसे तिल को तेल फूल सँग बास बसाई ॥
भजन केरे परताप तें तन मन निरमल होय ॥
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
( १४३ )
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
करै सिंह को संग सिंह की रहनी रहना ।
अपनो मारा खाय नहीं मुरदा को गहना ॥
नहिं भोजन नहिं आस नहीं इन्द्री की तिष्टा१ ।
आठ सिद्धि नौ निधि ताहि को देखत बिष्टा२ ॥
दुष्ट मित्र सब एक लगै ना गरमी पाला ।
अस्तुति निंदा त्यागि चलत है अपनी चाला ॥
पलटू झूठा ना टिकै जब लगि लगै न रंग ।
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
( १४४ )
स्वाँती को जल एक है अपनी अपनी खानि ॥
अपनी अपनी खानि सीप से मोती कहियै ।
हीरा होइ हिरंज सीस गज मुक्ता लहियै ॥
केश परै कपूर बेन३ तें लोचन४ ब्याला५ ।
अहि मुख जहर समान उपल६ तें लोह कराला ॥
गौ लोचन गौ सीस मिरग मद नाभि तें जानौ ।
भिन्न भिन्न गुन होय नीर एकहि पहिचानौ ॥
(१) चाह । (२) गलोज । (३) बाँस । (४) बंसलोचन । (५) दुष्ट—यह अहि =
सांप का विशेषण है। (६) पत्थर ।
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