पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ कुंडलिया
सब देवन के देव हरी अन्तर भजि लीजै ॥
पलटू हरि के भजन बिन कोउ न खतरै पार ।
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
( १३५ )
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
त्यों त्यों गरुई होय सुने संतन की बानी ।
थोपै थोप अघाय ज्ञान के सागर पानी ॥
रस रस बाढ़ै प्रीति दिनों दिन लागन¹ लागी ।
लगत लगत लगि जाय भरम आपुइ से भागी ॥
रस रस चलै सो जाय गिरै जो आतुर² धावै ।
तिल तिल लागै रंग भंगि³ तब सहजै आवै ॥
भक्ति पोढ़ पलटू करै धीरज धरै जो कोय ।
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
( १३६ )
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
आपुइ जाते हारि कथनियाँ बाद४ न आवैं ।
घरे मसलहत करैं बटुरि कै सौ सौ धावैं ॥
आवैं हमरे पास बैठि कै गाल बजावैं ।
उलटा पुलटा कहैं बचन बिपरीत सुनावैं ॥
बोली ठोली करैं छिमा करि चुप मैं मारौं ।
भूँकि भूँकि फिरि जायँ जुगत से उनको टारौं ॥
पलटू हम से लड़न को आवै सब संसार ।
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
( १३७ )
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
करम न कीजै त्याग जक्त की बूझ बड़ाई ।
(१) लगन । (२) जल्दी । (३) युक्ति । (४) बाज़ ।