पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ५३
भक्ति करौ निर्धार लोक की लाज न मानौ ।
देव पितर मुख खाक डारि इक गुरु को जानौ ॥
तजि दो कुल की रीति खोलि घूँघट को नाचौ ।
बेद पुरान मत काच काछनी काछौ साचौ ॥
सुभ आसुभ दोउ काटु पाँव की अपने बेरी ।
निसि दिन रहौ अनन्द कोऊ का करिहै तेरी ॥
पलटू सतगुरु चरन पर डारि देहु सिर भार ।
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
( १३३ )
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
तन मन लज्जा खोय छोड़ि कै मान बड़ाई ।
जाति बरन कुल खोय पड़ौगे सरन में जाई ॥
लाख कोऊ जो हँसै जगत की लाज न मानौ ।
ज्यों हिन्दू त्यों तुरुक सकल घट साहिब जानौ ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान की ढोल बजाओ ।
काटौ जम की फाँस भरम को दूर बहाओ ॥
पलटू बरिहौ¹ नाम को होनो होय सो होय ।
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
( १३४ )
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
ता को सुमिरु गंवार भला अपना जो चाहो ।
झूठा है संसार रैन सपने सा जानो ॥
माता पिता सुत बन्धु झूठ इनको सब जानो ।
सतसंगति हरि भजन सत्त दुइ इनको मानो ॥
और देव सब बृथा आस इन की ना कीजै ।
(१) ब्याहो ।