पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग-१ ६३
बिना काछ कै नाच भाँड़ कै स्वाँग बनावै ॥
आदि अंत मधि माहिं जो हरि कौ बर्त निबाहै ।
जीवन ता कौ सुफल निगम दिन राति सराह्रै ॥
बात जीव के संग नाहिं जो हारि ललकरी१ ।
हरि भक्तन की रीति टेक पकरी सो पकरी ॥
पलटू काछ औ नाच से तनिक न तजविज२ होय ।
जौन काछ कौ काछिये नाच नाचिये सोय ॥
( १५८ )
साधु को ऐसा चाहिये ज्यों सिसु३ अड़नि अड़ै ॥
ज्यों सिसु अड़नि अड़ै टेक अपनी नहिं टारै ।
पुरजे पुरजे कटै कोऊ कितनौ जो मारै ॥
धरन धरी सो धरी वही हरि के ब्रत धारी ।
धोये तनिक न छुटै रंग जब चढ़ा करारी ॥
धरन नीबाहै और साँच में दाग न लागै ॥
ज्यों पतिब्रता नारि डिगै ना लाख डिगावै ॥
पलटू लोह की मेख ज्यों पत्थर बीच गड़ै ।
साधु को ऐसा चाहिये ज्यों सिसु अड़नि अड़ै ॥
॥ बिनय ॥
( १५६ )
पतितपावन बाना धर्यो तुमहिं परी है लाज ॥
तुमहिं परी है लाज बात यह हम ने बूझी ।
जब तुम बाना धर्यो नाहिं तब तुम कहँ सूझी ॥
अब तो तारे बनै नहीं तो बाना उतारौ ।
फिर काहे को बड़ा बाच जो कहिकै हारौ ॥
आगहिं तुम गये चूक दोष नहिं दीजै मेरो ।
तुम यह जानत नाहिं पतित होइहैं बहुतेरे ॥
(१) हौसला । (२) तजावज = फर्क । (३) बालक ।