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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

६० कुंडलिया
पलटू सतगुरु रहनि को परखि लेय जो कोय ।
समुझाये से क्या भया जब ज्ञान आपु से होय ॥
( १५० )
ज्ञान समाधि जा को मिली सो क्या लावै ध्यान ॥
सो क्या लावै ध्यान ध्यान दुतिया कहवावै ॥
आप भया पासाह कौन के मुजरे जावै ।
० भजनी१ से भा भजत२ कौन अब आवै जावै ।
लिहा निसाना मारि कौन अब तीर चलावै ॥
मन के संकल्प भजन रूप अपनो दरसावै ।
जो इहवाँ सो उहाँ सँकल्प को दूरि बहावैं ॥
पलटू लगी सो लगि गई कौन होय हैरान ।
ज्ञान समाधि जा को मिली सो क्या लावै ध्यान ॥
( १५१ )
समुझे को समुझावै हीरा आगे पोत ॥
हीरा आगे पोत ज्ञानी को मूढ़ बुझावै ।
जहवाँ आँधी चलै बेना कै बतास३ चलावै ॥
अटकर सेती अंध डिठियारे४ राह बतावै ।
जैसे पंडित चतुर संत से बाद५ न आवै ॥
सुधा क पीवनहार ताहि को छाछ दिखावै ।
जेकरे बाजै तूर तहाँ का डफ्फ बजावै ॥
पलटू दीपक का करै जहँ सूरज की जोत ।
समुझे को समुझावै हीरा आगे पोत ॥
( १५२ )
अपनी अपनी करनी अपने अपने साथ ॥
(१) भजन करने वाला । (२) जिसका भजन किया जाता है । (३) पंखे की हवा ।
(४) आँख वाले को । (५) बाज न आवै, पीछे पड़ा रहै ।