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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३६
काम क्रोध को मारि तत्व का करै बिचारा ॥
भक्ति जोग के पीछे पलटू उपजै ज्ञान ।
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान ॥
( ६५ )
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ।
साहिब ताकै मोर मिहर की नजरि निहारै ॥
तुरत पदम-पद देइ औगुन को नाहिं बिचारै ॥
राम गरीवनिवाज गरीबन सदा निवाजा ।
भक्त-बछल१ भगवान करत भक्तन के काजा ॥
गाफिल नाहीं परै साच है लौ जब लावै ।
परा रहै बहि द्वार धनी कै धक्का खावै ॥
आठ पहर चौंसठ घरी पलटू परै न भोर२ ।
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ॥
( ६६ )
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
चाकर रहै हजूर होइ ना निमक-हरामी ।
डेरत रहै दिन राति लगै ना कबहीं खामी३ ॥
आठ पहर रहै ठाढ़ सोई है चाकर पूरा ।
का जानी केहि घरी हरी दै देइ अजूरा४ ॥
निवाले रोह बरोह सलाम में रहता चोटा ।५
वह काफिर बेपीर खायगा आखिर सोटा ॥
पलटू पलक न भूलिये इतना काम जरूर ।
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
(१) भक्त वत्सल = भक्त को प्यार करने वाला । (२) भूल । (३) कचाई, चूक ।
(४) मिहमताना, इनाम । (५) खाना (निवाला) मिलने के वक्त तो हाजिर (रोह ब
रोह = रूबरू) और सलाम यानी काम के वक्त गायब (चोटा = चोर ।

४० कुंडलिया
॥ सूरमा ॥
( १०० )
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
तरकस बाँधे ज्ञान मोह दल मारि हटाई ।
मारि पाँच पच्चीस दिहा गढ़ आगि लगाई ॥
काम क्रोध को मारि कैद में मन को कीन्हा ।
नव दरवाजे छोड़ि सुरत दसएँ पर दीन्हा ॥
अनहद बाजै तूर अटल सिंहासन पाया ।
जीव भया संतोष आय गुरु नाम लखाया ॥
पलटू कफ्फन बाँधि के खैंचो सुरति कमान ।
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
( १०१ )
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
संत सिपाहि क पूत इसिम¹ में दाग न लागै ।
महा मोह दल टारि बहुरि ना पानी माँगै ॥
मारै पाँच पचीस बचै ना तिगुन पावै ।
लालच का सिर काटि मुलुक में अदल चलावै ॥
तृस्ना और हङ्कार माया की गर्दन मारै ।
मन को लेवै पकरि कैद करि बेरी दारै ॥
पलटू टरै न खेत से सोई है अवधूत² ।
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
( १०२ )
काया कोट छुडावै सोई है रजपूत ॥
सोई है रजपूत देइ गढ़ आगि लगाई ।
मुरचा पाँच पचीस बात में लेइ छुड़ाई ॥
काया गढ़ के बीच जाय के थाना करना ।
मन है बड़ा मवास³ पकरि के ठौरै मरना ॥
(१) नाम । (२) मस्त फकीर । (३) ठग ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ४१
काम क्रोध को मारि लोभ औ मोह हंकारा ।
लालच का सिर काटि बहै लोहू की धारा ॥
पलटू अठएँ लोक में अमल करै अवधूत ।
काया कोट छुड़ावै सोई है रजपूत ॥
( १०३ )
संत चढ़े जो मोह१ पर काया नगर मंझार ॥
काया नगर मंझार ज्ञान का तरकस बाँधे ।
दम की गोली साधि विस्वास बन्दूक है काँधे ॥
घोड़ा है संतोष छिमा का जीन बँधाई ।
बखतर पहिरे प्रेम गगन में लै दौड़ाई ॥
मुरचा पाँच पचीस बात में लिहा छुड़ाई ।
मन के बेरी२ डारि नगर में अदल चलाई ॥
पलटू सुरति कमान करि नाम निसाना मार ।
संत चढ़े जो मोह पर काया नगर मंझार ॥
( १०४ )
लागी गोली नाम की पलटू गया है लोट ॥
पलटू गया है लोट चोट सब्दन की लागी ।
रंजक दै कै ज्ञान दिया संतन ने दागी ॥
लोथ परी भहराय उठत हैं गिद्ध मसाना ।
भागे कादर३ देखि खेत सूरा ठहराना ॥
मारैं भरि भरि भेद छेद भा तन में तिल तिल ।
कड़खा४ दै ललकार खाल गिरि परी है छिल छिल ।
सतगुरु के मैदान में रही न तनिकौ ओट ।
लागी गोली नाम की पलटू गया है लोट ॥
(१) मोह दल पर चढ़ाई की । (२) बेड़ी । (३) कायर । (४) सूरता की महिमा
के शब्द ।
६

४२ कुंडलिया
( १०५ )
लागी गाँसी सबद की पलटू मुआ तुरन्त ॥
पलटू मुआ तुरंत खेत के ऊपर जाई ।
सिर पहिले उड़ि गया रुंड१ से करै लड़ाई ॥
तन में तिल तिल घाव परदा खुलि लटकत जाई ।२
हैफ३ खाइ सब लोग लड़ै यह कठिन लड़ाई ॥
सतगुरु मारा तीर बीच छाती में मेरी ।
तीर चला होइ पवन निकरि गा तारू फोरी ॥
कहनेवाले बहुत हैं कथनी कथैं बेअंत ।
लागी गाँसी सबद की पलटू मुआ तुरंत ॥
( १०६ )
जियतै मरना भला है नाहिं भला बैराग ॥
नाहिं भला बैराग अस्त्र बिन करै लड़ाई ।
आठ पहर की मार चूकै से ठौर न पाई ॥
रहै खेत पर ठाढ़ सीस को लेय उतारी ।
दिन दिन आगे चलै गया जो फिरै पछारी ॥
पानी माँगै नाहिं नाहिं काहू से बोलै ।
छकै पियाला प्रेम गगन की खिड़की खोलै ॥
पलटू खरी कसौटी चढ़ै दाग पर दाग ।
जियतै मरना भला है नाहिं भला बैराग ॥
॥ पतिब्रता ॥
( १०७ )
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
सब से रहै अधीन टहल वह सब की करती ।
सास ससुर और भसुर ननद देवर से डरती ॥
( १ ) धड़ । ( २ ) आँतें निकल कर लटक रही हैं । ( ३ ) अफसोस या
अचरज करै ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ४३
सब का पोषन करै सभन की सेज बिछावै ।
सब को लेय सुताय, पास तब पिय के जावै ॥
सूतै पिय के पास सभन को राखै राजी ।
ऐसा भक्त जो होय ताहि की जीती बाजी ॥
पलटू बोलै मीठे बचन भजन में है लौलीन ।
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
( १०५ )
सोई सती सराहिये जरै पिया के साथ ॥
जरै पिया के साथ सोई है नारि सयानी ।
रहै चरन चित लाय एक से और न जानी ॥
जगत करै उपहास पिया का संग न छोड़ै ।
प्रेम की सेज बिछाय मेहर की चादर ओढ़ै ॥
ऐसी रहनी रहै तजै जो भोग बिलासा ।
मारै भूख पियास याद सँग चलती स्वासा ॥
रैन दिवस बेहोस पिया के रँग में राती ।
तन की सुधि है नहीं पिया सँग बोलत जाती ॥
पलटू गुरु परसाद से किया पिया को हाथ¹ ।
सोई सती सराहिये जरै पिया के साथ ॥
॥ उपदेश ॥
( १०६ )
हरि को दास कहाय के गुनह करै ना कोय ॥
गुनह करै ना कोय जेहि बिधि राखै रहिये ।
दुख सुख कैसउ पड़ै केहू से तनिक न कहिये ॥
तेरे मन में और करनवाला है औरै ।
तू ना करै खराब नाहक को निस दिन दौरै ॥
वा को कीजै याद जाहि की मारी टूटै ।
(१) बस में ।

४४ कुंडलिया
आधी को तू जाय घरहि में सम्मै१ फूटै ॥
पलटू गुनह किये से भजन माहिं भंग होय ।
हरि को दास कहाय के गुनह करै ना कोय ॥
( ११० )
अपनी ओर निभाइये हारि परै की जीति ॥
हारि परै की जीति ताहि की लाज न कीजै ।
कोटिन बहै बयारि कदम आगे को दीजै ॥
तिल तिल लागै घाव खेत से टरना नाहीं ।
गिरि गिरि उठे सम्हारि सोई है मरद सिपाही ॥
लरि लीजै भरि पेट कानि२ कुल अपनि न लावै ।
उन की उनके हाथ बड़न से सब बनि आवै ॥
पलटू सतगुरु नाम से साची कीजै प्रीति ।
अपनी ओर निभाइये हारि परै की जीति ॥
( १११ )
काजर दिहे से का भया ताकन को ढब नाहिं ॥
ताकन को ढब नाहिं ताकन की गति है न्यारी ।
इक टक लेवै ताकि सोई है पिय की प्यारी ॥
ताकै नैन मिरोरि नहीं चित अंतै टारै ।
बिन ताकें केहि काम लाख कोउ नैन सँवारै ॥
ताके में है फेर फेर काजर में नाहीं ।
भंगि३ मिली जो नाहिं नफा क्या जोग के माहीं ॥
पलटू सनकारत४ रहा पिय को खिन खिन माहिं ।
काजर दिहे से का भया ताकन को ढब नाहिं ॥
( ११२ )
जाकी जैसी भावना तासे तस ब्यौहार ॥
तासे तस ब्यौहार परस्पर दूनौं तारी५ ।
(१) सबही । (२) लाज । (३) युक्ति । (४) इशारा करना । (५) दोनों ताली •
या हथेली साथ बजती हैं ।

द्वितीय भाग: रेख़्ता एवं झूलना छन्द संग्रह

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ४५
जो जेहि लाइक होय सोई तस ज्ञान बिचारी ॥
जो कोई डारै फूल ताहि को फूल तयारी ।
जो कोई गारी देत ताहि को हाजिर गारी ॥
जो कोई अस्तुति करै आपनी अस्तुति पावै ।
जो कोई निन्दा करै ताहि के आगे आवै ॥
पलटू जस मैं पीव का वैसे पीव हमार ।
जाकी जैसी भावना तासे तस ब्यौहार ॥
( ११३ )
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
ऐना टेढ़ा नाहिं टेढ़ को टेढ़ सूझै ।
जो कोई देखै सोझ ताहि को सोझै बूझै ॥
जाको कुछ नहिं भेद भावना अपनी दरसै ।
जाको जैसी प्रीति मूरति सो तैसी परसै ॥
दुर्जन के दुर्बुद्धि पाप से अपने जरते ।
सज्जन के है सुमति सुमति से अपने तरते ॥
पलटू ऐना संत हैं सब देखै तेहि माहिं ।
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ।
( ११४ )
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
भौंरा लीजै बास जन्म मानुष को पाया ।
करी न गुरु की भक्ति जक्त में आइ भुलाया ॥
भौंरा कीजै चेत कहा तू फिरै भुलाना ।
हरि को नाम सुगन्ध छोड़ि पांड़र¹ लिपटाना ॥
ऋतु बसंत की जात कली को रस लै लीजै ।
बहुरि न ऐसो दाँव चेत चित भौंरा कीजै ॥
(१) एक बेसुगंध का फूल ।

४६ कुंडलिया

पलटू कबहुँ ना मरै होय न जिव का नास ।
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
( ११५ )
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
ज्यों छुरी तरबूज कुसल दोऊ बिधि नाहीं ।
गिरै गिराये घाव लगे तरबूजै माहीं ॥
कनक - कामिनी बड़ी दोऊ है तीछन¹ धारा ।
तब बचिहै तरबूज रहै छुरी से न्यारा ॥
छोट बड़ा कतलाम नहीं छुरी को दाया ।²
बचे बिबेकी संत गये जिन अंग लगाया ॥
पलटू उन से बैर है पड़े न मूरख बूझ ।
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
( ११६ )
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
बिहतर कद्दू होय संत से नइ³ कै चलिये ।
जुरै सो आगे धरै गोड़ धै सेवा करिये ॥
आपन जीवन जनम सुफल कै वह दिन जानै ।
देखत नैन जुड़ाय सीतलता मन में आनै ॥
अंतर नाहीं करै मन बच⁴ से लावै सेवा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस संत हैं तीनों देवा ॥
सीस नवावै संत को सीस बखानौ सोइ ।
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
( ११७ )
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
मरना किया कबूल मरै से बचै न कोई ।


(१) तेज । (२) छुरी निर्दईपने से सब छोटू बड़े का कतल या खून करती है।
(३) झुक कर । (४) बचन ।

दसचौदह१ औतार काल के बसि में होई ॥
सुर नर मुनि सब देव मुए सब मौत अपानी ॥
देव पितर ससि भानु पवन नभ धरती पानी ॥
राजा रंक फकीर सूर और बीर करारी ।
साधु सती औ अगिन मुए जिन सब को जारी ॥
पलटू आगे मरि रहौ आखिर मरना मूल ।
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
( ११८ )
समुझावै सो भी मरै पलटू को पछिताय ॥
पलटू को पछिताय दिना दस सबै मुसाफिर ।
हिलि मिलि रहैं सराय भोर भये पंथ पड़ा सिर ॥
इक आवै इक जाय रहै ना पैंड़ा खाली ।
इक ओर काटो जाय दूसरा लावै माली ॥
बूढ़ा बारा ज्वान नहीं है कोई इस्थिर ।
सबै बटाऊ लोग काहे को पचिये मरि मरि ॥
मरने वाला मरि गया रोवै सो मरि जाय ।
समुझावै सो भी मरै पलटू को पछिताय ॥
( ११९ )
तुझे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
अपनी ओर निबेर छोड़ि गुड़ बिष को खावै ।
कूँवाँ में तू परै और को राह बतावै ॥
औरन को उँजियार मसालची जाइ अँधेरे ।
त्यों ज्ञानी की बात मया से रहते घेरे ॥२
बेचत फिरैं कपूर आप तो खारी खावै ।
घर में लागी आग दौरि के घूर बुतावै ॥


(१) औतारों की संख्या चौबीस है। (२) माया में डूबा है और मुँह से ज्ञान
कथता है ।

पलटू यह साची कहै अपने मन का फेर ।
तुम्हे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
( १२० )
बहता पानी जात है धोउ सिताबी१ हाथ ॥
धोउ सिताबी हाथ करौ कछु नीकी करनी ।
बीस-सात२ है नरक मिली अठएँ२ बैतरनी ॥
तोहि से परिहि सो बयरा३ जम धिकवै भाथी ।
स्वारथ के सब लोग औसर के कोऊ न साथी ॥
आगे बूझि बिचारि करौ डेर वहि दिन केरी ।
संत सभा में बैठु परै नहिं जम की बेरी४ ॥
पलटू हरि जस गाइले येही तुम्हरे साथ ।
बहता पानी जात है धोउ सिताबी हाथ ॥
( १२१ )
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
तिन तिन चले छिपाय प्रगट में होय हरक्कत ।
भीड़ भाड़ से डेरै भीड़ में नहीं बरक्कत ॥
धनी भयो जब आप मिली हीरा की खानी ।
ठग है सब संसार जुगत से चलै अपानी ॥
जो हैं रहते गुप्त सदा वह मुक्ति में रहते ।
उन पर आवै खेद प्रगट जो सब से कहते ॥
पलटू कहिये उसी से जो तन मन दे ले जाय ।
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
( १२२ )
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार ॥


(१) जल्द । (२) नर्कों की संख्या सत्ताईस लिखी है और अट्ठाईसवीं बैतरनो
नदी है जिस को पित्र लोक में पहुँचने के लिए जीव को पार करना पड़ता है । (३) बैर,
बिगाड़ । (४) बेड़ी ।

पलटू साहिब की बानी भाग— १ ४६
तब छूटै संसार जगत से प्रीति न कीजै।
लोभ मोह को जारि सत्य पद मारग लीजै॥
मारै भूख पियास जगत की करै न आसा।
काम क्रोध को जारि तजै सब भोग बिलासा॥
सदा रहै निवृत्त१ चित्त ना अंतै जावै।
मन को लेवै फेरि भजन में जाय लगावै॥
पलटू हिरन के कारने जड़भर्त लिया अवतार२।
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार॥
( १२३ )
तो कहँ कोऊ कछु कहै कीजै अपनो काम॥
कीजै अपनो काम जगत को भूकन दीजै।
जाति बरन कुल खोय संतन को मारग लीजै॥
लोक बेद दे छोड़ि करै कोउ कितनौ हाँसी।
पाप पुन्न दोउ तजौं यही दोउ गर की फाँसी॥
करम न करिहौ एक भरम कोउ लाख दिखावै।
टरै न तेरी टेक कोटि ब्रह्मा समुझावै॥
पलट तनिक न छोड़िहौ जिउ के संगै नाम।
तो कहँ कोऊ कछु कहै कीजै अपनो काम॥
( १२४ )
इहाँ उहाँ कुछ है नहीं अपने मन का फेर॥
अपने मन का फेर सक्ति सिव दूसर नाहीं।
माया से है अंत३ तेहि से बोचे माहीं॥
जब मैं इहवाँ रहा सोच उहवाँ की भारी।
(१) निष्काम। (२) जड़ भरत राजा भरत को कहते हैं जिन्होंने राज-पाट
छोड़ कर बन में भगवत आराधन के लिये बास किया। एक हिरन से इनकी ऐसी गहरी
प्रीत हो गई थी कि उसी के वियोग में प्रान त्याग किया और उस बासना के कारन हिरन
का चोला पाया। (३) अलग।
७

५० कुंडलिया
उहवाँ देखा जाय कुदरत कुल रही हमारी ॥
जोग किये का होय भंगि१ जो आवै नाहीं ।
केतिक कोटिन जोग रहत हैं भंगै१ माहीं ॥
पलटू पावै सहज में सतगुरु की है देर ।
इहाँ उहाँ कुछ है नहीं अपने मन का फेर ॥
( १२५ )
मन की मौज से मौज है और मौज किहि काम ॥
और मौज किहि काम मौज जौ ऐसी आवै ।
आठौ पहर अनन्द भजन में दिवस बितावै ॥
ज्ञान समुद्र के बीच उठत है लहर तरंगा ।
तिरबेनी के तीर सरसुती जमुना गंगा ॥
संत सभा के मध्य सब्द को फड़२ जब लागै ।
पुलकि पुलकि गलतान३ प्रेम में मन को पागै ॥
पलटू रहै बिबेक से छूटै नहिं सतनाम ।
मन की मौज से मौज है और मौज किहि काम ॥
( १२६ )
जो साहिब का लाल है सो पावैगा लाल४ ॥
सो पावैगा लाल जाइ के गोता मारै ।
मरजीवा ह्वै जाय लाल को तुरत निकारै ॥
निसि दिन मारै मौज मिली अब बस्तु अपानी ।
ऋद्धि सिद्धि औ मुक्ति भरत हैं उन घर पानी ॥
वे साहन के साह उन्हें है आस न दूजा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस करें सब उनकी पूजा ॥
पलटू गुरु भक्ती बिना भेष भया कंगाल ।

(१) युक्ति । (२) फड़ = बाजार — दूसरी लिपि में "झड़" है । (३) मतवाला ।
(४) पहिले “लाल” के अर्थ बालक या पुत्र के हैं और दूसरे लाल के अर्थ जवाहर के हैं।

पलटू साहिब की बानी भाग--१ ५१
जो साहिब का लाल है सो पावैगा लाल ॥
( १२७ )
जीव जाय तो जाय दे जन्म जाय बरु नष्ट ॥
जन्म जाय बरु नष्ट लोक की तजो बड़ाई ।
दुख नाना सहि रहो पड़ौ दरबार में जाई ॥
मात पिता निज बन्धु तजौ भगनी सुत नारी ।
तजि दो भोग बिलास सहत रहौ सब की गारी ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान का ढोल बजाओ ।
देखै सब संसार कलाएँ उलटी खाओ ॥
पलटू नाम न छोड़िहौ सहि लो इतना कष्ट ।
जीव जाय तो जाय दे जन्म जाय बरु नष्ट ॥
( १२८ )
खोजत हीरा को फिरै नहीं पोत को दाम ॥
नहीं पोत को दाम जौहरि की गाँठ खुलावै ।
बातन की बकवाद जौहरी को बिलमावै ॥
लम्बी बोलत बात करै बातन की लदनी ।
कौड़ी गाँठि नाहिं करत है बातें इतनी ॥
लिहा जौहरी ताड़¹ फिरा है गाहक खाली ।
थैली लई समेटि दिहा गाहक को टाली ॥
लोक लाज छूटै नहीं पलटू चाहै नाम ।
खोजत हीरा को फिरै नहीं पोत को दाम ॥
( १२६ )
मूरख को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
नाहक होइ अकाज कहे से बात न बूझै ।
अंधा आठौ गाँठि इलाज न पन्थ न सूझै ॥
ब्रह्मा उतरै आय कहे से ज्ञान न आवै ।
( १ ) जान गया ।

५२ कुंडलिया
अमृत दीजै ब्याल¹ नहीं वा को बिष जावै ॥
लगै न भीतर ज्ञान ताहि से मन न मिलावै ।
मारै भाल पषान धसै नहिं उलटा आवै ॥
पलट जो बूझै नहीं बोलै से रहु बाज ।
मूरखै को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
( १३० )
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
बिना बिचार बिबेक भये सब एकै घानी ।
पीना² भा संसार जाठि ऊपर मर्दनी ॥
इतना दुख सब सहैं तूहू पर नाहिं डराते ।
फिर फिर पेरे जायँ कर्म में फिर लपटाते ॥
देखी देखा पड़ै आपु से आपु पेरावै ।
पेरे से जो बचै ताहि को हँसी³ लगावै ॥
पलटू मैं रोवन लगा चलता कोल्हू देख ।
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
( १३१ )
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
करि लो अपना काम सोच मोहिं वा दिन केरी ।
जेहि से कौल करार कौल से आपन हेरी ॥
कीन्हों भक्ति करार जन्म तब मानुष पायो ।
मोकहँ है सो चेत गर्भ के बिच करि आयो ॥
औंधे बासन मँहै नीर जिन्ह लिया उबारी ।
तेकहँ तजि कै रहौं कुसल का होय तुम्हारी ॥
जगत हँसे तो हँसन दे पलटू हँसै न राम ।
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
( १३२ )
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
(१) साँप । (२) मोटा । (३) उस को पाखंडी कह कर संसार हँसता है ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ५३
भक्ति करौ निर्धार लोक की लाज न मानौ ।
देव पितर मुख खाक डारि इक गुरु को जानौ ॥
तजि दो कुल की रीति खोलि घूँघट को नाचौ ।
बेद पुरान मत काच काछनी काछौ साचौ ॥
सुभ आसुभ दोउ काटु पाँव की अपने बेरी ।
निसि दिन रहौ अनन्द कोऊ का करिहै तेरी ॥
पलटू सतगुरु चरन पर डारि देहु सिर भार ।
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
( १३३ )
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
तन मन लज्जा खोय छोड़ि कै मान बड़ाई ।
जाति बरन कुल खोय पड़ौगे सरन में जाई ॥
लाख कोऊ जो हँसै जगत की लाज न मानौ ।
ज्यों हिन्दू त्यों तुरुक सकल घट साहिब जानौ ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान की ढोल बजाओ ।
काटौ जम की फाँस भरम को दूर बहाओ ॥
पलटू बरिहौ¹ नाम को होनो होय सो होय ।
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
( १३४ )
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
ता को सुमिरु गंवार भला अपना जो चाहो ।
झूठा है संसार रैन सपने सा जानो ॥
माता पिता सुत बन्धु झूठ इनको सब जानो ।
सतसंगति हरि भजन सत्त दुइ इनको मानो ॥
और देव सब बृथा आस इन की ना कीजै ।
(१) ब्याहो ।

५४ कुंडलिया
सब देवन के देव हरी अन्तर भजि लीजै ॥
पलटू हरि के भजन बिन कोउ न खतरै पार ।
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
( १३५ )
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
त्यों त्यों गरुई होय सुने संतन की बानी ।
थोपै थोप अघाय ज्ञान के सागर पानी ॥
रस रस बाढ़ै प्रीति दिनों दिन लागन¹ लागी ।
लगत लगत लगि जाय भरम आपुइ से भागी ॥
रस रस चलै सो जाय गिरै जो आतुर² धावै ।
तिल तिल लागै रंग भंगि³ तब सहजै आवै ॥
भक्ति पोढ़ पलटू करै धीरज धरै जो कोय ।
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
( १३६ )
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
आपुइ जाते हारि कथनियाँ बाद४ न आवैं ।
घरे मसलहत करैं बटुरि कै सौ सौ धावैं ॥
आवैं हमरे पास बैठि कै गाल बजावैं ।
उलटा पुलटा कहैं बचन बिपरीत सुनावैं ॥
बोली ठोली करैं छिमा करि चुप मैं मारौं ।
भूँकि भूँकि फिरि जायँ जुगत से उनको टारौं ॥
पलटू हम से लड़न को आवै सब संसार ।
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
( १३७ )
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
करम न कीजै त्याग जक्त की बूझ बड़ाई ।
(१) लगन । (२) जल्दी । (३) युक्ति । (४) बाज़ ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१. ५५
ओहु ओर दारै तोरि एहर कुछ एक न पाई ॥
उत कुल से वे गये नाहिं इत मिला ठिकाना ।
केहू ओर में माहिं बीच के बीच भुलाना ॥
जेहुँ जेहुँ पावै बस्तु तेहुँ तेहुँ करम को छोड़ै ।
खातिर जमा को लेइ जगत से मुहड़ा मोड़ै ॥
पलट पग धरु निरख करि ता तें लगै न दाग ।
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
( १३८ )
दुइ पासाही फकर१ की इक दुनियाँ इक दीन ॥
इक दुनियाँ इक दीन दोऊ को राखै राजी ।
सब की मिलै मुराद गैब की नौबति बाजी ॥
हाथ जोरि मुहताज सिकन्दर रहते ठाढ़े ।
हुकुम बजावहिं भूप जबाँ२ से जो कछु काढ़े ॥
चलै फहम३ की फौज दरोग४ की कोट ढहाई ।
बेदावा तहसोल सबुर कै तलब लगाई ॥
पलट ऐसी साहिबी साहिब रहै तबीन५ ।
दुइ पासाही फकर की इक दुनियाँ इक दीन ॥
( १३६ )
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ।
मूरख पहरा देइ भोर भये आपुइ रोवै ।
साँध परोसी चोर माल धरि गाफिल सोवै ॥
सुनहु साहु धनवंत सबै सम्पति के घाती ।
नहिं कीजै बिस्वास जागत रहिये दिन राती ॥
दिन दिन बढ़ती होइ आन को चित्त न दीजै ।
सब से रहिये दूर केहू को मित्र न कीजै ॥
(१) फकीरी । (२) जुबान, जीभ । (३) बिचार । (४) झूठ । (५) ताबेदार ।

५६ कुंडलिया
पलटू जो ऐसे रहै द्रव्य कोऊ नहिं लेइ ।
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ॥
( १४० )
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
भरम करै संसार होइ आसन से पक्का ।
भली बुरी कोउ कहै रहै सहि सब का धक्का ॥
धीरज धै संतोष रहै दृढ़ है ठहराई ।
जो कछु आवै खाइ बचै सो देइ लुटाई ॥
लगै न माया मोह जगत की छोड़ै आसा ।
बल तजि निरबल होय सबुर से करै दिलासा ॥
काम क्रोध को मारि कै मारै नींद अहार ।
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
( १४१ )
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
पाछे तौ सिर खोलु बचा तुम सुनौ फकीरी ।
हेलुआ जूती एक, नाहिं आवै दिलगीरी १ ॥
रूखा सूखा खाउ मिलै जो गम का टुकड़ा ।
फीका कड़ुवा नाहिं स्वाद सब छोड़ौ झगड़ा ॥
हक हलाल वह जानु सबर से बैठे आवै ।
खाना वही हराम किसी से माँगन जावै ॥
पलटू वह घर राम का बच्चा तू जनि बोलु ।
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
( १४२ )
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
नीच कहै ना कोय गये जब से सरनाई ।
( १ ) नापसंद होना, दुख मानना ।

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नारा बहि कै मिल्यो गंग में गंग कहाई ॥
पारस के परसंग लोह से कनक कहावै ॥
आगि मँहै जो परै जरै आगै होइ जावै ॥
राम का घर है बड़ा सकल ऐगुन छिपि जाई ।
जैसे तिल को तेल फूल सँग बास बसाई ॥
भजन केरे परताप तें तन मन निरमल होय ॥
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
( १४३ )
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
करै सिंह को संग सिंह की रहनी रहना ।
अपनो मारा खाय नहीं मुरदा को गहना ॥
नहिं भोजन नहिं आस नहीं इन्द्री की तिष्टा१ ।
आठ सिद्धि नौ निधि ताहि को देखत बिष्टा२ ॥
दुष्ट मित्र सब एक लगै ना गरमी पाला ।
अस्तुति निंदा त्यागि चलत है अपनी चाला ॥
पलटू झूठा ना टिकै जब लगि लगै न रंग ।
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
( १४४ )
स्वाँती को जल एक है अपनी अपनी खानि ॥
अपनी अपनी खानि सीप से मोती कहियै ।
हीरा होइ हिरंज सीस गज मुक्ता लहियै ॥
केश परै कपूर बेन३ तें लोचन४ ब्याला५ ।
अहि मुख जहर समान उपल६ तें लोह कराला ॥
गौ लोचन गौ सीस मिरग मद नाभि तें जानौ ।
भिन्न भिन्न गुन होय नीर एकहि पहिचानौ ॥


(१) चाह । (२) गलोज । (३) बाँस । (४) बंसलोचन । (५) दुष्ट—यह अहि =
सांप का विशेषण है। (६) पत्थर ।
८

५८ कुंडलिया
पलटू खामिंद एक है निसचै प्रेम प्रधान ।
० उपजै बस्तु सुभाव तें अपनी अपनी खानि ॥
( १४५ )
भक्ति बीज जब बोवै निसि दिन करै बिबेक ॥
निसि दिन करै बिबेक लागि तब निकरन साखा ।
डार पात बहु फूल जतन से जिन ने राखा ॥
हरि चरचा से सींचि ज्ञान कै बाँधै बेड़ा ।
पहुँचै सोर पताल खात संतन कै खेड़ा१ ॥
सोभित बृच्छ बिसाल मीठ फल लटकन लागे ।
बिस्वास सोई रखवार बैठि कै पहरा जागै ॥
पलटू यहि बिधि जोगवै उपजै ज्ञान बिसेख ॥
भक्ति बीज जब बोवै निसि दिन करै बिबेक ॥
( १४६ )
पलटू सरबस दीजिये मित्र न कीजै कोय ॥
मित्र न कीजै कोय चित्त दै बैर बिसाहै२ ।
निस दिन होय बिनास ओर वह नाहिं निबाहै ॥
चिन्ता बाढ़ै रोग लगा छिन छिन तन छीजै ।
कम्मर३ गरुवा होय ज्यों ज्यों पानी से भीजै ॥
जोग जुगत की हानि जहाँ चित अंतै जावै ।
भक्ति आपनी जाय एक मन कहूँ लगावै ॥
० राम मिताई ना चलै और मित्र जो होय ।
० पलटू सरबस दीजिये मित्र न कीजै कोय ॥
( १४७ )
रवा४ टूटै रवा फाटै कहिये परदा खोल ॥
कहिये परदा खोल रवा ना बाकी कीजै५ ।
(१) गाँव । (२) मोल ले । (३) कम्मल । (४) चाहे । (५) जर्रा (रवा)
भर न उठाय रक्खो ।