पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ कुंडलिया
आधी को तू जाय घरहि में सम्मै१ फूटै ॥
पलटू गुनह किये से भजन माहिं भंग होय ।
हरि को दास कहाय के गुनह करै ना कोय ॥
( ११० )
अपनी ओर निभाइये हारि परै की जीति ॥
हारि परै की जीति ताहि की लाज न कीजै ।
कोटिन बहै बयारि कदम आगे को दीजै ॥
तिल तिल लागै घाव खेत से टरना नाहीं ।
गिरि गिरि उठे सम्हारि सोई है मरद सिपाही ॥
लरि लीजै भरि पेट कानि२ कुल अपनि न लावै ।
उन की उनके हाथ बड़न से सब बनि आवै ॥
पलटू सतगुरु नाम से साची कीजै प्रीति ।
अपनी ओर निभाइये हारि परै की जीति ॥
( १११ )
काजर दिहे से का भया ताकन को ढब नाहिं ॥
ताकन को ढब नाहिं ताकन की गति है न्यारी ।
इक टक लेवै ताकि सोई है पिय की प्यारी ॥
ताकै नैन मिरोरि नहीं चित अंतै टारै ।
बिन ताकें केहि काम लाख कोउ नैन सँवारै ॥
ताके में है फेर फेर काजर में नाहीं ।
भंगि३ मिली जो नाहिं नफा क्या जोग के माहीं ॥
पलटू सनकारत४ रहा पिय को खिन खिन माहिं ।
काजर दिहे से का भया ताकन को ढब नाहिं ॥
( ११२ )
जाकी जैसी भावना तासे तस ब्यौहार ॥
तासे तस ब्यौहार परस्पर दूनौं तारी५ ।
(१) सबही । (२) लाज । (३) युक्ति । (४) इशारा करना । (५) दोनों ताली •
या हथेली साथ बजती हैं ।