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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ४५
जो जेहि लाइक होय सोई तस ज्ञान बिचारी ॥
जो कोई डारै फूल ताहि को फूल तयारी ।
जो कोई गारी देत ताहि को हाजिर गारी ॥
जो कोई अस्तुति करै आपनी अस्तुति पावै ।
जो कोई निन्दा करै ताहि के आगे आवै ॥
पलटू जस मैं पीव का वैसे पीव हमार ।
जाकी जैसी भावना तासे तस ब्यौहार ॥
( ११३ )
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
ऐना टेढ़ा नाहिं टेढ़ को टेढ़ सूझै ।
जो कोई देखै सोझ ताहि को सोझै बूझै ॥
जाको कुछ नहिं भेद भावना अपनी दरसै ।
जाको जैसी प्रीति मूरति सो तैसी परसै ॥
दुर्जन के दुर्बुद्धि पाप से अपने जरते ।
सज्जन के है सुमति सुमति से अपने तरते ॥
पलटू ऐना संत हैं सब देखै तेहि माहिं ।
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ।
( ११४ )
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
भौंरा लीजै बास जन्म मानुष को पाया ।
करी न गुरु की भक्ति जक्त में आइ भुलाया ॥
भौंरा कीजै चेत कहा तू फिरै भुलाना ।
हरि को नाम सुगन्ध छोड़ि पांड़र¹ लिपटाना ॥
ऋतु बसंत की जात कली को रस लै लीजै ।
बहुरि न ऐसो दाँव चेत चित भौंरा कीजै ॥
(१) एक बेसुगंध का फूल ।