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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

४० कुंडलिया
॥ सूरमा ॥
( १०० )
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
तरकस बाँधे ज्ञान मोह दल मारि हटाई ।
मारि पाँच पच्चीस दिहा गढ़ आगि लगाई ॥
काम क्रोध को मारि कैद में मन को कीन्हा ।
नव दरवाजे छोड़ि सुरत दसएँ पर दीन्हा ॥
अनहद बाजै तूर अटल सिंहासन पाया ।
जीव भया संतोष आय गुरु नाम लखाया ॥
पलटू कफ्फन बाँधि के खैंचो सुरति कमान ।
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
( १०१ )
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
संत सिपाहि क पूत इसिम¹ में दाग न लागै ।
महा मोह दल टारि बहुरि ना पानी माँगै ॥
मारै पाँच पचीस बचै ना तिगुन पावै ।
लालच का सिर काटि मुलुक में अदल चलावै ॥
तृस्ना और हङ्कार माया की गर्दन मारै ।
मन को लेवै पकरि कैद करि बेरी दारै ॥
पलटू टरै न खेत से सोई है अवधूत² ।
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
( १०२ )
काया कोट छुडावै सोई है रजपूत ॥
सोई है रजपूत देइ गढ़ आगि लगाई ।
मुरचा पाँच पचीस बात में लेइ छुड़ाई ॥
काया गढ़ के बीच जाय के थाना करना ।
मन है बड़ा मवास³ पकरि के ठौरै मरना ॥
(१) नाम । (२) मस्त फकीर । (३) ठग ।