पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 116 में से
संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ३६
काम क्रोध को मारि तत्व का करै बिचारा ॥
भक्ति जोग के पीछे पलटू उपजै ज्ञान ।
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान ॥
( ६५ )
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ।
साहिब ताकै मोर मिहर की नजरि निहारै ॥
तुरत पदम-पद देइ औगुन को नाहिं बिचारै ॥
राम गरीवनिवाज गरीबन सदा निवाजा ।
भक्त-बछल१ भगवान करत भक्तन के काजा ॥
गाफिल नाहीं परै साच है लौ जब लावै ।
परा रहै बहि द्वार धनी कै धक्का खावै ॥
आठ पहर चौंसठ घरी पलटू परै न भोर२ ।
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ॥
( ६६ )
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
चाकर रहै हजूर होइ ना निमक-हरामी ।
डेरत रहै दिन राति लगै ना कबहीं खामी३ ॥
आठ पहर रहै ठाढ़ सोई है चाकर पूरा ।
का जानी केहि घरी हरी दै देइ अजूरा४ ॥
निवाले रोह बरोह सलाम में रहता चोटा ।५
वह काफिर बेपीर खायगा आखिर सोटा ॥
पलटू पलक न भूलिये इतना काम जरूर ।
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
(१) भक्त वत्सल = भक्त को प्यार करने वाला । (२) भूल । (३) कचाई, चूक ।
(४) मिहमताना, इनाम । (५) खाना (निवाला) मिलने के वक्त तो हाजिर (रोह ब
रोह = रूबरू) और सलाम यानी काम के वक्त गायब (चोटा = चोर ।