पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ कुंडलिया
( १०५ )
लागी गाँसी सबद की पलटू मुआ तुरन्त ॥
पलटू मुआ तुरंत खेत के ऊपर जाई ।
सिर पहिले उड़ि गया रुंड१ से करै लड़ाई ॥
तन में तिल तिल घाव परदा खुलि लटकत जाई ।२
हैफ३ खाइ सब लोग लड़ै यह कठिन लड़ाई ॥
सतगुरु मारा तीर बीच छाती में मेरी ।
तीर चला होइ पवन निकरि गा तारू फोरी ॥
कहनेवाले बहुत हैं कथनी कथैं बेअंत ।
लागी गाँसी सबद की पलटू मुआ तुरंत ॥
( १०६ )
जियतै मरना भला है नाहिं भला बैराग ॥
नाहिं भला बैराग अस्त्र बिन करै लड़ाई ।
आठ पहर की मार चूकै से ठौर न पाई ॥
रहै खेत पर ठाढ़ सीस को लेय उतारी ।
दिन दिन आगे चलै गया जो फिरै पछारी ॥
पानी माँगै नाहिं नाहिं काहू से बोलै ।
छकै पियाला प्रेम गगन की खिड़की खोलै ॥
पलटू खरी कसौटी चढ़ै दाग पर दाग ।
जियतै मरना भला है नाहिं भला बैराग ॥
॥ पतिब्रता ॥
( १०७ )
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
सब से रहै अधीन टहल वह सब की करती ।
सास ससुर और भसुर ननद देवर से डरती ॥
( १ ) धड़ । ( २ ) आँतें निकल कर लटक रही हैं । ( ३ ) अफसोस या
अचरज करै ।