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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

३० कुंडलिया
॥ बिस्वास ॥
( ७५ )
लगन महूरत झूठ सब और बिगाडै काम ॥
और बिगाड़ै काम साइत जनि सोधै कोई ।
एक भरोसा नाहिं कुसल कहवाँ से होई ॥
जेकरे हाथै कुसल ताहि को दिया बिसारी ।
आपन इक चतुराई बीच में करै अनारी ॥
तिनका टूटै नाहिं बिना सतगुरु की दाया ।
अजहूँ चेत गँवार जगत है झूठी काया ॥
पलटू सुभ दिन सुभ घड़ी याद पड़े जब नाम ।
लगन महूरत झूठ सब और बिगाड़ै काम ॥
( ७६ )
मोर राम मैं राम का ता से रहौं निसंक ॥
ता से रहौं निसंक तनिक मोर बार ना बाँकै ।
जो कोइ मानै बैर हारि के आपुइ थाकै ॥
दोऊ१ बिधि से राम भार उनके सिर दीन्हा ।
मो पर परै जो गाढ़ राम आपुइ पर लीन्हा ॥
राम भरोसा पाय डेरौं काहू से नाहीं ।
फूल में है ज्यों बास राम हैं हमहीं माहीं ॥
पलटू सब में राम है क्या राजा क्या रंक ।
मोर राम मैं राम का ता से रहौं निसंक ॥
( ७७ )
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
भाड़ परै संसार नाहिं काहू से कामा ।
मन बच करम लगाय जानिहौ केवल रामा ॥
लोक लाज कुल त्यागि जगत की बूझ बड़ाई२ ।
(१) परमार्थ और स्वार्थ दोनों में । (२) दुनिया की बूझ और बड़ाई की हैसियत ।

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ३१
निंदा कोउ कै जाय रहौ संतन सरनाई ॥
छोड़ौ दिन दिन संग सुनौ ना बेद पुराना ।
ठान अपनी ठानि आन ना करिहौ काना ॥
पलटू संसै छूटि गई मिलिया पूरा यार ।
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
॥ सतसंग ॥
( ७५ )
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
जाइ करै सतसंग प्रान बैराग उठावै ।
स्रवन करै बेदान्त मनन करि मन समुझावै ॥
तब साधै हठ जोग बिपर्जय¹ कौ घर पावै ।
प्रान करै आयाम पुरुष तब नजरि में आवै ॥
देखै अपनो रूप होय तब ज्ञान समाधी ।
तब दे साधन छोड़ि लेइ जब पहिले साधी ॥
पलटू खोवै आपु को तब लागैगा रंग ।
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
( ७६ )
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
जल में खोजै राम जाय के तीरथ स्रानै ।
भरमै चारिउ खूँट नहीं सुधि अपनी आनै ॥
फूल माहिं ज्यों बास काठ में अगिन छिपानी ।
खोदे बिनु नहिं मिलै अहै धरती में पानी ॥
जैसे दूध घृत छिपा छिपी मिहँदी में लाली ।
ऐसे पूरन ब्रह्म कहूँ तिल भरि नहिं खाली ॥
पलटू सतसंग बीच में करि ले अपना काम ।
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
(१) आपे को भूल जाना ।

३२ कुंडलिया
( ८० )
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
सीतल होवत साँप ताप को तुरत बुझाई ।
संगत के परभाव सीतलता वा में आई ॥
मूरख ज्ञानी होय जाय ज्ञानी में बैठै ।
फूल अलग का अलग बासना तिल में पैठै ॥
कंचन लोहा होय जहाँ पारस छुइ जाई ।
पनपै ऊकठा १ काठ जहाँ उन सरदी पाई ॥
पलटू संगत किये से मिटते तीनिउँ ताप ।
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
( ८१ )
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
लोहा महँग बिकान छुए से कीमत निकरी ।
चंदन के परसंग चंदन भई बन की लकरी ॥
जैसे तिल का तेल फूल सँग महँग बिकाई ।
सतसंगति में पड़ा संत भा सदन कसाई ॥
गंग में है सुभगंग मिली जो नारा सोती ।
सीप बीच जो पड़ै बूँद सो होवै मोती ॥
पलटू हरि के नाम से गनिका चढ़ी बिमान ।
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
( ८२ )
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
दियना लीजै बार महल में है उँजियारा ।
उदय होय ससि भान अमावस मिटै अँधियारा ॥
ज्ञान होय परगास कुमति जूआ में हारै ।
दुतिया २ खंडन करै एक को बैठि बिचारै ॥
(१) कटा हुआ । (२) द्वैत भाव ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३३
रचि रचि तीसौ सखी अभूषन प्रेम बनाई ।
गोबरधन मन पूजि बहुरि सब घर को आई ॥
पलटू सतसंगत मिला खेलि लेहु दिन चार ।
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
( ८३ )
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
घर में रहै सिकार भेद ना कोउ बतावै ।
गया अहेरी भूलि कहाँ से सावज¹ पावै ॥
खोजा चारिउ खूँट कहीं कुछ नजर न आवै ।
कतहूँ ना सुधि आइ नहीं कोउ भेद बतावै ॥
जप तप तीरथ बरत किया बहु नेम अचारा ।
खोजा बेद पुरान सबै सतसंग पुकारा ॥
सतगुरु किया इसारा पलटू लीन्हा मार ।
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
( ८४ )
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
खाये आलस होय कहो कैसी बिधि कीजै ।
दोऊ बिधि से बिपति दोस का को हम दीजै ॥
मन बैरी है बड़ा कहे में अपने नाहीं ।
पुन्न में करता पाप पाप में पुन्न कराही ॥
सुभ असुभ के बीच पड़ा है जीव बिचारा ।
दोऊ में वह मिला बात सब वही बिगारा ॥
पलटू सतसंगत दोऊ छुटै करै जो कोय ।
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
( ८५ )
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा² जाय ॥

(१) शिकार । (२) इस कुंडलिया में बिगड़ने का शब्द व्यंग से सुधरने के
अर्थ में कहा है।
५

३५ कुंडलिया
सो सो बिगरा जाय फूल सँग तेल बसाना ।
ज्ञानी के संग परा ज्ञान मूरख ने जाना ॥
पारस के परसंग बिगरि गा लोहा जाई ।
लोहा से भा कनक आपनी जाति गँवाई ॥
सलिता गइ है बिगरि मिली गंगा में जाई ।
मलया के परसंग काठ चन्दन कहवाई ॥
पलटू काग से हंस भा और काग पछिताइ ।
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा जाइ ॥
( ८६ )
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा१ हुआ तमाम ॥
मुद्दा हुआ तमाम परे सतसंगति माहीं ।
निस दिन तौलै पूर घाट२ अब सुपनेहु नाहीं ॥
पूँजी पाई साच दिनों दिन होती बढ़ती ।
सतगुरु के परताप भई है दौलत चढ़ती ॥
कोठी दसवें द्वार३ सहज की खेप चलावो ।
कोई न टोकनहार नफ़ा घर बैठे पावो ॥
दूनों पाँव पसारि कै निस दिन करो अराम ।
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा हुआ तमाम ॥
॥ सतसंग अनधिकारी को ॥
( ८७ )
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
लेता नाहीं कोय सीस को धरै उतारी ।
वही सकस४ को मिलै मरै की करै तयारी ॥
कडू बहुत सतनाम देखत कै डेरै सरीरा ।
रोटी खावनहार खायगा क्योंकर हीरा ॥
अंधा होवै नीक बैद का पथ जो खावै ।
(१) मतलब या काम। (२) कमी। (३) शून्य। (४) आदमी।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३५
मलयागिर की बास बाँस में नहीं समावै ॥
पलटू पारस क्या करै जो लोहा खोटा होय ।
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
॥ शब्द ॥
( ८८ )
सबद छुड़ावै राज को सबदै करै फकीर ॥
सबदै करै फकीर सबद फिर राम मिलावै ।
जिन के लागा सबद तिन्हें कछु और न भावै ॥
मरे सबद की घाव उन्हें को सकै जियाई ।
होइ गा उनका काम परी रोवै दुनियाई ॥
घायल भा वह फिरै सबद कै चोट है भारी ।
जियतै मिरतक होय झुकै फिर उठै सँभारी ॥
पलटू जिन के सबद का लगा कलेजे तीर ।
सबद छुड़ावै राज को सबदै करै फकीर ॥
( ८६ )
सुरत सबद के मिलन में मुझ को भया अनंद ॥
मुझ को भया अनंद मिला पानी में पानी ।
दोऊ से भा सूत नहीं मिलि कै अलगानी ॥
मुलुक भया सलतन्त१ मिला हाकिम को राजा ।
रैयत करै अराम खोलि के दस दरवाजा२ ॥
छूटी सकल बियाधि मिटी इंद्रिन की दुतिया ।
को अब करै उपाधि चोर से मिलि गइ कुतिया ॥
पलटू सतगुरु साहिब काटौ मेरी बंद ।
सुरत सबद के मिलन में मुझ को भया अनंद ॥
( ६० )
जोग जुगत आसन नहीं साधन नहीं बिबेक ॥
(१) अमन । (२) दसवाँ द्वार सन्तों का जो ओंकार पद के परे है ।

साधन नहीं बिबेक साधन सब कै के छूटा ।
लागी सहज समाधि सब्द ब्रह्मांड में फूटा ॥
खंडन तनिक न होय तेलवत१ लागी धारा ।
जोति निरन्तर बरै दसो दिसि भा उजियारा ॥
ज्ञान ध्यान सब छूटि छूटि संजम चतुराई ।
तन की सुधि गइ बिसरि अरूढ़२ अवस्था आई ॥
पलटू मैं भजनै भया रही न दूजी रेख ।
जोग जुगत आसन नहीं साधन नहीं बिबेक ॥
॥ ध्यान ॥
( ६१ )
कमठ दृष्टि जो लावई सो ध्यानी परमान ॥
सो ध्यानी परमान सुरति से अंडा सेवै ।
आप रहै जल माहिं सूखे में अंडा देवै ॥
जस पनिहारी कलस भरे मारग में आवै ।
कर छोड़े मुख बचन चित कलसा में लावै ॥
फनि मनि धरै उतारि आपु चरने को जावै ।
वह गाफिल ना परै सुरति मनि माहिं रहावै ॥
पलटू सब कारज करै सुरति रहै अलगान ।
कमठ दृष्टि जो लावई सो ध्यानी परमान ॥
( ६२ )
जैसे कामिनि के विषय कामी लावै ध्यान ॥
कामी लावै ध्यान रैन दिन चित्त न टारै ।
तन मन धन मर्याद कामिनि के ऊपर वारै ॥
लाख कोऊ जो कहै कहा ना तनिकौ मानै ।
बिन देखे ना रहै वाहि को सर्बस जानै ॥
लेय वाहि को नाम वाहि की करै बड़ाई ।
(१) तेल के समान । (२) ऊँची ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३७
तनिक बिसारै नाहिं कनक ज्यों किरपन१ पाई ॥
ऐसी प्रीति अब दीजिये पलटू को भगवान ।
जैसे कामिनि के विषय कामी लावै ध्यान ॥
॥ घट मठ ॥
( ६३ )
साहिब साहिब क्या करै साहिब तेरे पास ॥
साहिब तेरे पास याद करु होवै हाजिर ।
अंदर धसि कै देखु मिलेगा साहिब नादिर ॥
मान मनी हो फना२ नूर तब नजर में आवै ।
बुरका३ डारै टारि खुदा बाखुद४ दिखरावै ॥
रूह करै मेराज५ कुफर का खोलि कुलाबा६ ।
तीसौ रोजा रहै अंदर में सात रिकाबा७ ॥
लामकान में रब्ब को पावै पलटूदास ।
साहिब साहिब क्या करै साहिब तेरे पास ॥
( ६४ )
दिल में आवै है नजर उस मालिक का नूर ॥
उस मालिक का नूर कहाँ को ढूँढ़न जावै ।
सब में पूर समान दरस घर बैठे पावै ॥
धरती नभ जल पवन तेही का सकल पसारा ।
छुटै भरम की गाँठि सकल घट ठाकुरद्वारा ॥
तिल भरि नाहिं कहीं जहाँ नहिं सिरजनहारा ।
वोही आवै नजर फुरा८ बिस्वास हमारा ॥
पलटू नेरे साच के झूठे से है दूर ।
दिल में आवै है नजर उस मालिक का नूर ॥
( ६५ )
खोजत खोजत मरि गये घर ही लागा रंग ॥
(१) कंजूस । (२) नष्ट । (३) घूँघट । (४) अपने में । (५) चढ़ाई । (६) जंजीर,
सिकरी । (७) पद, स्थान । (८) सच्चा ।

३८ कुंडलिया
घर ही लागा रंग कीन्ह जब संतन दाया ।
मन में भा बिस्वास छूटि गइ सहजै माया ॥
बस्तु जो रही हिरान ताहि का लगा ठिकाना ।
अब चित चलै न इत उत आपु में आपु समाना ॥
उठती लहर तरंग हृदय में सीतल लागे ।
भरम गई है सोय बैठि कै चेतन जागे ॥
पलटू खातिर जमा भई सतगुरु के परसंग ।
खोजत खोजत मरि गये घर ही लागा रंग ॥
( ६६ )
नजर मँहै सब की पड़े कोऊ देखै नाहिं ॥
कोऊ देखै नाहिं सीस पै सब के छाजै ।
पूरन ब्रह्म अखंड सकल घट आपु बिराजै ॥
दिवसै फिरै भुलान रहै तिरगुन महँ माता ।
देखि देखि दै छाड़ि पंडित पहँ¹ पूजन जाता ॥
भूला सब संसार भेद नहिं जानै वा की ।
देखत है इक संत ज्ञान की दीठी² जा की ॥
पलटू खाली कहूँ नहिं परगट है जग माहिं ।
नजर मँहै सब की पड़े कोऊ देखै नाहिं ॥
॥ दास ॥
( ६७ )
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान³ ॥
सो बैराग प्रमान सेवा साधुन की कीजै ।
तब छोड़ै संसार बूझ घरही में लीजै ॥
काढ़े रस रस गोड़⁴ कछुक दिन फिरै उदासी ।
सतगुरु उहवाँ बसैं जहाँ काया की कासी ॥
आसन से दृढ़ होय घटावै नींद अहारा ।
(१) पास । (२) दृष्टि, निगाह । (३) मानने योग्य । (४) धीरे-धीरे कदम बढ़ावै ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३६
काम क्रोध को मारि तत्व का करै बिचारा ॥
भक्ति जोग के पीछे पलटू उपजै ज्ञान ।
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान ॥
( ६५ )
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ।
साहिब ताकै मोर मिहर की नजरि निहारै ॥
तुरत पदम-पद देइ औगुन को नाहिं बिचारै ॥
राम गरीवनिवाज गरीबन सदा निवाजा ।
भक्त-बछल१ भगवान करत भक्तन के काजा ॥
गाफिल नाहीं परै साच है लौ जब लावै ।
परा रहै बहि द्वार धनी कै धक्का खावै ॥
आठ पहर चौंसठ घरी पलटू परै न भोर२ ।
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ॥
( ६६ )
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
चाकर रहै हजूर होइ ना निमक-हरामी ।
डेरत रहै दिन राति लगै ना कबहीं खामी३ ॥
आठ पहर रहै ठाढ़ सोई है चाकर पूरा ।
का जानी केहि घरी हरी दै देइ अजूरा४ ॥
निवाले रोह बरोह सलाम में रहता चोटा ।५
वह काफिर बेपीर खायगा आखिर सोटा ॥
पलटू पलक न भूलिये इतना काम जरूर ।
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
(१) भक्त वत्सल = भक्त को प्यार करने वाला । (२) भूल । (३) कचाई, चूक ।
(४) मिहमताना, इनाम । (५) खाना (निवाला) मिलने के वक्त तो हाजिर (रोह ब
रोह = रूबरू) और सलाम यानी काम के वक्त गायब (चोटा = चोर ।

४० कुंडलिया
॥ सूरमा ॥
( १०० )
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
तरकस बाँधे ज्ञान मोह दल मारि हटाई ।
मारि पाँच पच्चीस दिहा गढ़ आगि लगाई ॥
काम क्रोध को मारि कैद में मन को कीन्हा ।
नव दरवाजे छोड़ि सुरत दसएँ पर दीन्हा ॥
अनहद बाजै तूर अटल सिंहासन पाया ।
जीव भया संतोष आय गुरु नाम लखाया ॥
पलटू कफ्फन बाँधि के खैंचो सुरति कमान ।
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
( १०१ )
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
संत सिपाहि क पूत इसिम¹ में दाग न लागै ।
महा मोह दल टारि बहुरि ना पानी माँगै ॥
मारै पाँच पचीस बचै ना तिगुन पावै ।
लालच का सिर काटि मुलुक में अदल चलावै ॥
तृस्ना और हङ्कार माया की गर्दन मारै ।
मन को लेवै पकरि कैद करि बेरी दारै ॥
पलटू टरै न खेत से सोई है अवधूत² ।
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
( १०२ )
काया कोट छुडावै सोई है रजपूत ॥
सोई है रजपूत देइ गढ़ आगि लगाई ।
मुरचा पाँच पचीस बात में लेइ छुड़ाई ॥
काया गढ़ के बीच जाय के थाना करना ।
मन है बड़ा मवास³ पकरि के ठौरै मरना ॥
(१) नाम । (२) मस्त फकीर । (३) ठग ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ४१
काम क्रोध को मारि लोभ औ मोह हंकारा ।
लालच का सिर काटि बहै लोहू की धारा ॥
पलटू अठएँ लोक में अमल करै अवधूत ।
काया कोट छुड़ावै सोई है रजपूत ॥
( १०३ )
संत चढ़े जो मोह१ पर काया नगर मंझार ॥
काया नगर मंझार ज्ञान का तरकस बाँधे ।
दम की गोली साधि विस्वास बन्दूक है काँधे ॥
घोड़ा है संतोष छिमा का जीन बँधाई ।
बखतर पहिरे प्रेम गगन में लै दौड़ाई ॥
मुरचा पाँच पचीस बात में लिहा छुड़ाई ।
मन के बेरी२ डारि नगर में अदल चलाई ॥
पलटू सुरति कमान करि नाम निसाना मार ।
संत चढ़े जो मोह पर काया नगर मंझार ॥
( १०४ )
लागी गोली नाम की पलटू गया है लोट ॥
पलटू गया है लोट चोट सब्दन की लागी ।
रंजक दै कै ज्ञान दिया संतन ने दागी ॥
लोथ परी भहराय उठत हैं गिद्ध मसाना ।
भागे कादर३ देखि खेत सूरा ठहराना ॥
मारैं भरि भरि भेद छेद भा तन में तिल तिल ।
कड़खा४ दै ललकार खाल गिरि परी है छिल छिल ।
सतगुरु के मैदान में रही न तनिकौ ओट ।
लागी गोली नाम की पलटू गया है लोट ॥
(१) मोह दल पर चढ़ाई की । (२) बेड़ी । (३) कायर । (४) सूरता की महिमा
के शब्द ।
६

४२ कुंडलिया
( १०५ )
लागी गाँसी सबद की पलटू मुआ तुरन्त ॥
पलटू मुआ तुरंत खेत के ऊपर जाई ।
सिर पहिले उड़ि गया रुंड१ से करै लड़ाई ॥
तन में तिल तिल घाव परदा खुलि लटकत जाई ।२
हैफ३ खाइ सब लोग लड़ै यह कठिन लड़ाई ॥
सतगुरु मारा तीर बीच छाती में मेरी ।
तीर चला होइ पवन निकरि गा तारू फोरी ॥
कहनेवाले बहुत हैं कथनी कथैं बेअंत ।
लागी गाँसी सबद की पलटू मुआ तुरंत ॥
( १०६ )
जियतै मरना भला है नाहिं भला बैराग ॥
नाहिं भला बैराग अस्त्र बिन करै लड़ाई ।
आठ पहर की मार चूकै से ठौर न पाई ॥
रहै खेत पर ठाढ़ सीस को लेय उतारी ।
दिन दिन आगे चलै गया जो फिरै पछारी ॥
पानी माँगै नाहिं नाहिं काहू से बोलै ।
छकै पियाला प्रेम गगन की खिड़की खोलै ॥
पलटू खरी कसौटी चढ़ै दाग पर दाग ।
जियतै मरना भला है नाहिं भला बैराग ॥
॥ पतिब्रता ॥
( १०७ )
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
सब से रहै अधीन टहल वह सब की करती ।
सास ससुर और भसुर ननद देवर से डरती ॥
( १ ) धड़ । ( २ ) आँतें निकल कर लटक रही हैं । ( ३ ) अफसोस या
अचरज करै ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ४३
सब का पोषन करै सभन की सेज बिछावै ।
सब को लेय सुताय, पास तब पिय के जावै ॥
सूतै पिय के पास सभन को राखै राजी ।
ऐसा भक्त जो होय ताहि की जीती बाजी ॥
पलटू बोलै मीठे बचन भजन में है लौलीन ।
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
( १०५ )
सोई सती सराहिये जरै पिया के साथ ॥
जरै पिया के साथ सोई है नारि सयानी ।
रहै चरन चित लाय एक से और न जानी ॥
जगत करै उपहास पिया का संग न छोड़ै ।
प्रेम की सेज बिछाय मेहर की चादर ओढ़ै ॥
ऐसी रहनी रहै तजै जो भोग बिलासा ।
मारै भूख पियास याद सँग चलती स्वासा ॥
रैन दिवस बेहोस पिया के रँग में राती ।
तन की सुधि है नहीं पिया सँग बोलत जाती ॥
पलटू गुरु परसाद से किया पिया को हाथ¹ ।
सोई सती सराहिये जरै पिया के साथ ॥
॥ उपदेश ॥
( १०६ )
हरि को दास कहाय के गुनह करै ना कोय ॥
गुनह करै ना कोय जेहि बिधि राखै रहिये ।
दुख सुख कैसउ पड़ै केहू से तनिक न कहिये ॥
तेरे मन में और करनवाला है औरै ।
तू ना करै खराब नाहक को निस दिन दौरै ॥
वा को कीजै याद जाहि की मारी टूटै ।
(१) बस में ।

४४ कुंडलिया
आधी को तू जाय घरहि में सम्मै१ फूटै ॥
पलटू गुनह किये से भजन माहिं भंग होय ।
हरि को दास कहाय के गुनह करै ना कोय ॥
( ११० )
अपनी ओर निभाइये हारि परै की जीति ॥
हारि परै की जीति ताहि की लाज न कीजै ।
कोटिन बहै बयारि कदम आगे को दीजै ॥
तिल तिल लागै घाव खेत से टरना नाहीं ।
गिरि गिरि उठे सम्हारि सोई है मरद सिपाही ॥
लरि लीजै भरि पेट कानि२ कुल अपनि न लावै ।
उन की उनके हाथ बड़न से सब बनि आवै ॥
पलटू सतगुरु नाम से साची कीजै प्रीति ।
अपनी ओर निभाइये हारि परै की जीति ॥
( १११ )
काजर दिहे से का भया ताकन को ढब नाहिं ॥
ताकन को ढब नाहिं ताकन की गति है न्यारी ।
इक टक लेवै ताकि सोई है पिय की प्यारी ॥
ताकै नैन मिरोरि नहीं चित अंतै टारै ।
बिन ताकें केहि काम लाख कोउ नैन सँवारै ॥
ताके में है फेर फेर काजर में नाहीं ।
भंगि३ मिली जो नाहिं नफा क्या जोग के माहीं ॥
पलटू सनकारत४ रहा पिय को खिन खिन माहिं ।
काजर दिहे से का भया ताकन को ढब नाहिं ॥
( ११२ )
जाकी जैसी भावना तासे तस ब्यौहार ॥
तासे तस ब्यौहार परस्पर दूनौं तारी५ ।
(१) सबही । (२) लाज । (३) युक्ति । (४) इशारा करना । (५) दोनों ताली •
या हथेली साथ बजती हैं ।

द्वितीय भाग: रेख़्ता एवं झूलना छन्द संग्रह

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ४५
जो जेहि लाइक होय सोई तस ज्ञान बिचारी ॥
जो कोई डारै फूल ताहि को फूल तयारी ।
जो कोई गारी देत ताहि को हाजिर गारी ॥
जो कोई अस्तुति करै आपनी अस्तुति पावै ।
जो कोई निन्दा करै ताहि के आगे आवै ॥
पलटू जस मैं पीव का वैसे पीव हमार ।
जाकी जैसी भावना तासे तस ब्यौहार ॥
( ११३ )
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
ऐना टेढ़ा नाहिं टेढ़ को टेढ़ सूझै ।
जो कोई देखै सोझ ताहि को सोझै बूझै ॥
जाको कुछ नहिं भेद भावना अपनी दरसै ।
जाको जैसी प्रीति मूरति सो तैसी परसै ॥
दुर्जन के दुर्बुद्धि पाप से अपने जरते ।
सज्जन के है सुमति सुमति से अपने तरते ॥
पलटू ऐना संत हैं सब देखै तेहि माहिं ।
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ।
( ११४ )
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
भौंरा लीजै बास जन्म मानुष को पाया ।
करी न गुरु की भक्ति जक्त में आइ भुलाया ॥
भौंरा कीजै चेत कहा तू फिरै भुलाना ।
हरि को नाम सुगन्ध छोड़ि पांड़र¹ लिपटाना ॥
ऋतु बसंत की जात कली को रस लै लीजै ।
बहुरि न ऐसो दाँव चेत चित भौंरा कीजै ॥
(१) एक बेसुगंध का फूल ।

४६ कुंडलिया

पलटू कबहुँ ना मरै होय न जिव का नास ।
फूली है यह केतकी भौंरा लीजै बास ॥
( ११५ )
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
ज्यों छुरी तरबूज कुसल दोऊ बिधि नाहीं ।
गिरै गिराये घाव लगे तरबूजै माहीं ॥
कनक - कामिनी बड़ी दोऊ है तीछन¹ धारा ।
तब बचिहै तरबूज रहै छुरी से न्यारा ॥
छोट बड़ा कतलाम नहीं छुरी को दाया ।²
बचे बिबेकी संत गये जिन अंग लगाया ॥
पलटू उन से बैर है पड़े न मूरख बूझ ।
गुरु की भक्ति और माया ज्यों छुरी तरबूज ॥
( ११६ )
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
बिहतर कद्दू होय संत से नइ³ कै चलिये ।
जुरै सो आगे धरै गोड़ धै सेवा करिये ॥
आपन जीवन जनम सुफल कै वह दिन जानै ।
देखत नैन जुड़ाय सीतलता मन में आनै ॥
अंतर नाहीं करै मन बच⁴ से लावै सेवा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस संत हैं तीनों देवा ॥
सीस नवावै संत को सीस बखानौ सोइ ।
पलटू जो सिर ना नवै बिहतर कद्दू होय ॥
( ११७ )
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
मरना किया कबूल मरै से बचै न कोई ।


(१) तेज । (२) छुरी निर्दईपने से सब छोटू बड़े का कतल या खून करती है।
(३) झुक कर । (४) बचन ।

दसचौदह१ औतार काल के बसि में होई ॥
सुर नर मुनि सब देव मुए सब मौत अपानी ॥
देव पितर ससि भानु पवन नभ धरती पानी ॥
राजा रंक फकीर सूर और बीर करारी ।
साधु सती औ अगिन मुए जिन सब को जारी ॥
पलटू आगे मरि रहौ आखिर मरना मूल ।
राम कृस्न परसराम ने मरना किया कबूल ॥
( ११८ )
समुझावै सो भी मरै पलटू को पछिताय ॥
पलटू को पछिताय दिना दस सबै मुसाफिर ।
हिलि मिलि रहैं सराय भोर भये पंथ पड़ा सिर ॥
इक आवै इक जाय रहै ना पैंड़ा खाली ।
इक ओर काटो जाय दूसरा लावै माली ॥
बूढ़ा बारा ज्वान नहीं है कोई इस्थिर ।
सबै बटाऊ लोग काहे को पचिये मरि मरि ॥
मरने वाला मरि गया रोवै सो मरि जाय ।
समुझावै सो भी मरै पलटू को पछिताय ॥
( ११९ )
तुझे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
अपनी ओर निबेर छोड़ि गुड़ बिष को खावै ।
कूँवाँ में तू परै और को राह बतावै ॥
औरन को उँजियार मसालची जाइ अँधेरे ।
त्यों ज्ञानी की बात मया से रहते घेरे ॥२
बेचत फिरैं कपूर आप तो खारी खावै ।
घर में लागी आग दौरि के घूर बुतावै ॥


(१) औतारों की संख्या चौबीस है। (२) माया में डूबा है और मुँह से ज्ञान
कथता है ।

पलटू यह साची कहै अपने मन का फेर ।
तुम्हे पराई क्या परी अपनी ओर निबेर ॥
( १२० )
बहता पानी जात है धोउ सिताबी१ हाथ ॥
धोउ सिताबी हाथ करौ कछु नीकी करनी ।
बीस-सात२ है नरक मिली अठएँ२ बैतरनी ॥
तोहि से परिहि सो बयरा३ जम धिकवै भाथी ।
स्वारथ के सब लोग औसर के कोऊ न साथी ॥
आगे बूझि बिचारि करौ डेर वहि दिन केरी ।
संत सभा में बैठु परै नहिं जम की बेरी४ ॥
पलटू हरि जस गाइले येही तुम्हरे साथ ।
बहता पानी जात है धोउ सिताबी हाथ ॥
( १२१ )
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
तिन तिन चले छिपाय प्रगट में होय हरक्कत ।
भीड़ भाड़ से डेरै भीड़ में नहीं बरक्कत ॥
धनी भयो जब आप मिली हीरा की खानी ।
ठग है सब संसार जुगत से चलै अपानी ॥
जो हैं रहते गुप्त सदा वह मुक्ति में रहते ।
उन पर आवै खेद प्रगट जो सब से कहते ॥
पलटू कहिये उसी से जो तन मन दे ले जाय ।
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
( १२२ )
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार ॥


(१) जल्द । (२) नर्कों की संख्या सत्ताईस लिखी है और अट्ठाईसवीं बैतरनो
नदी है जिस को पित्र लोक में पहुँचने के लिए जीव को पार करना पड़ता है । (३) बैर,
बिगाड़ । (४) बेड़ी ।

पलटू साहिब की बानी भाग— १ ४६
तब छूटै संसार जगत से प्रीति न कीजै।
लोभ मोह को जारि सत्य पद मारग लीजै॥
मारै भूख पियास जगत की करै न आसा।
काम क्रोध को जारि तजै सब भोग बिलासा॥
सदा रहै निवृत्त१ चित्त ना अंतै जावै।
मन को लेवै फेरि भजन में जाय लगावै॥
पलटू हिरन के कारने जड़भर्त लिया अवतार२।
बीज बासना को जरै तब छूटै संसार॥
( १२३ )
तो कहँ कोऊ कछु कहै कीजै अपनो काम॥
कीजै अपनो काम जगत को भूकन दीजै।
जाति बरन कुल खोय संतन को मारग लीजै॥
लोक बेद दे छोड़ि करै कोउ कितनौ हाँसी।
पाप पुन्न दोउ तजौं यही दोउ गर की फाँसी॥
करम न करिहौ एक भरम कोउ लाख दिखावै।
टरै न तेरी टेक कोटि ब्रह्मा समुझावै॥
पलट तनिक न छोड़िहौ जिउ के संगै नाम।
तो कहँ कोऊ कछु कहै कीजै अपनो काम॥
( १२४ )
इहाँ उहाँ कुछ है नहीं अपने मन का फेर॥
अपने मन का फेर सक्ति सिव दूसर नाहीं।
माया से है अंत३ तेहि से बोचे माहीं॥
जब मैं इहवाँ रहा सोच उहवाँ की भारी।
(१) निष्काम। (२) जड़ भरत राजा भरत को कहते हैं जिन्होंने राज-पाट
छोड़ कर बन में भगवत आराधन के लिये बास किया। एक हिरन से इनकी ऐसी गहरी
प्रीत हो गई थी कि उसी के वियोग में प्रान त्याग किया और उस बासना के कारन हिरन
का चोला पाया। (३) अलग।
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