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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

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पृष्ठ 38

३२ कुंडलिया
( ८० )
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
सीतल होवत साँप ताप को तुरत बुझाई ।
संगत के परभाव सीतलता वा में आई ॥
मूरख ज्ञानी होय जाय ज्ञानी में बैठै ।
फूल अलग का अलग बासना तिल में पैठै ॥
कंचन लोहा होय जहाँ पारस छुइ जाई ।
पनपै ऊकठा १ काठ जहाँ उन सरदी पाई ॥
पलटू संगत किये से मिटते तीनिउँ ताप ।
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
( ८१ )
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
लोहा महँग बिकान छुए से कीमत निकरी ।
चंदन के परसंग चंदन भई बन की लकरी ॥
जैसे तिल का तेल फूल सँग महँग बिकाई ।
सतसंगति में पड़ा संत भा सदन कसाई ॥
गंग में है सुभगंग मिली जो नारा सोती ।
सीप बीच जो पड़ै बूँद सो होवै मोती ॥
पलटू हरि के नाम से गनिका चढ़ी बिमान ।
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
( ८२ )
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
दियना लीजै बार महल में है उँजियारा ।
उदय होय ससि भान अमावस मिटै अँधियारा ॥
ज्ञान होय परगास कुमति जूआ में हारै ।
दुतिया २ खंडन करै एक को बैठि बिचारै ॥
(१) कटा हुआ । (२) द्वैत भाव ।