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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

३५ कुंडलिया
सो सो बिगरा जाय फूल सँग तेल बसाना ।
ज्ञानी के संग परा ज्ञान मूरख ने जाना ॥
पारस के परसंग बिगरि गा लोहा जाई ।
लोहा से भा कनक आपनी जाति गँवाई ॥
सलिता गइ है बिगरि मिली गंगा में जाई ।
मलया के परसंग काठ चन्दन कहवाई ॥
पलटू काग से हंस भा और काग पछिताइ ।
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा जाइ ॥
( ८६ )
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा१ हुआ तमाम ॥
मुद्दा हुआ तमाम परे सतसंगति माहीं ।
निस दिन तौलै पूर घाट२ अब सुपनेहु नाहीं ॥
पूँजी पाई साच दिनों दिन होती बढ़ती ।
सतगुरु के परताप भई है दौलत चढ़ती ॥
कोठी दसवें द्वार३ सहज की खेप चलावो ।
कोई न टोकनहार नफ़ा घर बैठे पावो ॥
दूनों पाँव पसारि कै निस दिन करो अराम ।
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा हुआ तमाम ॥
॥ सतसंग अनधिकारी को ॥
( ८७ )
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
लेता नाहीं कोय सीस को धरै उतारी ।
वही सकस४ को मिलै मरै की करै तयारी ॥
कडू बहुत सतनाम देखत कै डेरै सरीरा ।
रोटी खावनहार खायगा क्योंकर हीरा ॥
अंधा होवै नीक बैद का पथ जो खावै ।
(१) मतलब या काम। (२) कमी। (३) शून्य। (४) आदमी।