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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३३
रचि रचि तीसौ सखी अभूषन प्रेम बनाई ।
गोबरधन मन पूजि बहुरि सब घर को आई ॥
पलटू सतसंगत मिला खेलि लेहु दिन चार ।
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
( ८३ )
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
घर में रहै सिकार भेद ना कोउ बतावै ।
गया अहेरी भूलि कहाँ से सावज¹ पावै ॥
खोजा चारिउ खूँट कहीं कुछ नजर न आवै ।
कतहूँ ना सुधि आइ नहीं कोउ भेद बतावै ॥
जप तप तीरथ बरत किया बहु नेम अचारा ।
खोजा बेद पुरान सबै सतसंग पुकारा ॥
सतगुरु किया इसारा पलटू लीन्हा मार ।
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
( ८४ )
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
खाये आलस होय कहो कैसी बिधि कीजै ।
दोऊ बिधि से बिपति दोस का को हम दीजै ॥
मन बैरी है बड़ा कहे में अपने नाहीं ।
पुन्न में करता पाप पाप में पुन्न कराही ॥
सुभ असुभ के बीच पड़ा है जीव बिचारा ।
दोऊ में वह मिला बात सब वही बिगारा ॥
पलटू सतसंगत दोऊ छुटै करै जो कोय ।
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
( ८५ )
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा² जाय ॥

(१) शिकार । (२) इस कुंडलिया में बिगड़ने का शब्द व्यंग से सुधरने के
अर्थ में कहा है।
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