पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ३५
मलयागिर की बास बाँस में नहीं समावै ॥
पलटू पारस क्या करै जो लोहा खोटा होय ।
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
॥ शब्द ॥
( ८८ )
सबद छुड़ावै राज को सबदै करै फकीर ॥
सबदै करै फकीर सबद फिर राम मिलावै ।
जिन के लागा सबद तिन्हें कछु और न भावै ॥
मरे सबद की घाव उन्हें को सकै जियाई ।
होइ गा उनका काम परी रोवै दुनियाई ॥
घायल भा वह फिरै सबद कै चोट है भारी ।
जियतै मिरतक होय झुकै फिर उठै सँभारी ॥
पलटू जिन के सबद का लगा कलेजे तीर ।
सबद छुड़ावै राज को सबदै करै फकीर ॥
( ८६ )
सुरत सबद के मिलन में मुझ को भया अनंद ॥
मुझ को भया अनंद मिला पानी में पानी ।
दोऊ से भा सूत नहीं मिलि कै अलगानी ॥
मुलुक भया सलतन्त१ मिला हाकिम को राजा ।
रैयत करै अराम खोलि के दस दरवाजा२ ॥
छूटी सकल बियाधि मिटी इंद्रिन की दुतिया ।
को अब करै उपाधि चोर से मिलि गइ कुतिया ॥
पलटू सतगुरु साहिब काटौ मेरी बंद ।
सुरत सबद के मिलन में मुझ को भया अनंद ॥
( ६० )
जोग जुगत आसन नहीं साधन नहीं बिबेक ॥
(१) अमन । (२) दसवाँ द्वार सन्तों का जो ओंकार पद के परे है ।