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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३७
तनिक बिसारै नाहिं कनक ज्यों किरपन१ पाई ॥
ऐसी प्रीति अब दीजिये पलटू को भगवान ।
जैसे कामिनि के विषय कामी लावै ध्यान ॥
॥ घट मठ ॥
( ६३ )
साहिब साहिब क्या करै साहिब तेरे पास ॥
साहिब तेरे पास याद करु होवै हाजिर ।
अंदर धसि कै देखु मिलेगा साहिब नादिर ॥
मान मनी हो फना२ नूर तब नजर में आवै ।
बुरका३ डारै टारि खुदा बाखुद४ दिखरावै ॥
रूह करै मेराज५ कुफर का खोलि कुलाबा६ ।
तीसौ रोजा रहै अंदर में सात रिकाबा७ ॥
लामकान में रब्ब को पावै पलटूदास ।
साहिब साहिब क्या करै साहिब तेरे पास ॥
( ६४ )
दिल में आवै है नजर उस मालिक का नूर ॥
उस मालिक का नूर कहाँ को ढूँढ़न जावै ।
सब में पूर समान दरस घर बैठे पावै ॥
धरती नभ जल पवन तेही का सकल पसारा ।
छुटै भरम की गाँठि सकल घट ठाकुरद्वारा ॥
तिल भरि नाहिं कहीं जहाँ नहिं सिरजनहारा ।
वोही आवै नजर फुरा८ बिस्वास हमारा ॥
पलटू नेरे साच के झूठे से है दूर ।
दिल में आवै है नजर उस मालिक का नूर ॥
( ६५ )
खोजत खोजत मरि गये घर ही लागा रंग ॥
(१) कंजूस । (२) नष्ट । (३) घूँघट । (४) अपने में । (५) चढ़ाई । (६) जंजीर,
सिकरी । (७) पद, स्थान । (८) सच्चा ।