पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ कुंडलिया
घर ही लागा रंग कीन्ह जब संतन दाया ।
मन में भा बिस्वास छूटि गइ सहजै माया ॥
बस्तु जो रही हिरान ताहि का लगा ठिकाना ।
अब चित चलै न इत उत आपु में आपु समाना ॥
उठती लहर तरंग हृदय में सीतल लागे ।
भरम गई है सोय बैठि कै चेतन जागे ॥
पलटू खातिर जमा भई सतगुरु के परसंग ।
खोजत खोजत मरि गये घर ही लागा रंग ॥
( ६६ )
नजर मँहै सब की पड़े कोऊ देखै नाहिं ॥
कोऊ देखै नाहिं सीस पै सब के छाजै ।
पूरन ब्रह्म अखंड सकल घट आपु बिराजै ॥
दिवसै फिरै भुलान रहै तिरगुन महँ माता ।
देखि देखि दै छाड़ि पंडित पहँ¹ पूजन जाता ॥
भूला सब संसार भेद नहिं जानै वा की ।
देखत है इक संत ज्ञान की दीठी² जा की ॥
पलटू खाली कहूँ नहिं परगट है जग माहिं ।
नजर मँहै सब की पड़े कोऊ देखै नाहिं ॥
॥ दास ॥
( ६७ )
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान³ ॥
सो बैराग प्रमान सेवा साधुन की कीजै ।
तब छोड़ै संसार बूझ घरही में लीजै ॥
काढ़े रस रस गोड़⁴ कछुक दिन फिरै उदासी ।
सतगुरु उहवाँ बसैं जहाँ काया की कासी ॥
आसन से दृढ़ होय घटावै नींद अहारा ।
(१) पास । (२) दृष्टि, निगाह । (३) मानने योग्य । (४) धीरे-धीरे कदम बढ़ावै ।