पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग-१ ३१
निंदा कोउ कै जाय रहौ संतन सरनाई ॥
छोड़ौ दिन दिन संग सुनौ ना बेद पुराना ।
ठान अपनी ठानि आन ना करिहौ काना ॥
पलटू संसै छूटि गई मिलिया पूरा यार ।
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
॥ सतसंग ॥
( ७५ )
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
जाइ करै सतसंग प्रान बैराग उठावै ।
स्रवन करै बेदान्त मनन करि मन समुझावै ॥
तब साधै हठ जोग बिपर्जय¹ कौ घर पावै ।
प्रान करै आयाम पुरुष तब नजरि में आवै ॥
देखै अपनो रूप होय तब ज्ञान समाधी ।
तब दे साधन छोड़ि लेइ जब पहिले साधी ॥
पलटू खोवै आपु को तब लागैगा रंग ।
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
( ७६ )
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
जल में खोजै राम जाय के तीरथ स्रानै ।
भरमै चारिउ खूँट नहीं सुधि अपनी आनै ॥
फूल माहिं ज्यों बास काठ में अगिन छिपानी ।
खोदे बिनु नहिं मिलै अहै धरती में पानी ॥
जैसे दूध घृत छिपा छिपी मिहँदी में लाली ।
ऐसे पूरन ब्रह्म कहूँ तिल भरि नहिं खाली ॥
पलटू सतसंग बीच में करि ले अपना काम ।
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
(१) आपे को भूल जाना ।