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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

२२ कुंडलिया
मीन लिया कोउ मारि ठाँव ढेला चिहराना१ ॥
ऐसी मानुष देह बृथा में जात अनारी ।
भूला कौल करार आप से काम बिगारी ॥
पलट बरस औ मास दिन पहर घड़ी पल छीन ।
ज्यों ज्यों सूखै ताल है त्यों त्यों मीन मलीन ॥
( ५५ )
बूड़ी जात जहाज है नाम निवर्तिक२ बोल ॥
नाम निवर्तिक बोल हाथ से तेरे जाती ।
माँझ धार में फटी सूम की जोगवै थाती ॥
ऐसे मूरख लोग लालच में जनम गँवावैं ।
गई हाथ से चीज तेहू पर लेखा लावैं ॥
कंठा रूँधन भये मोह में लागा अजहूँ ।
कीन्हे प्रान पयान नाम ना सुमिरे तबहूँ ॥
पलटू नर तन रतन सम भा कौड़ी के मोल ।
बूड़ी जात जहाज है नाम निवर्तिक बोल ॥
॥ भक्ति ॥
( ५६ )
एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
और झूठ सब बात करै हठजोग अनारी ।
ब्रह्म दोष वो लेय काया को राखै जारी ॥
प्रान करै आयाम कोई फिर मुद्रा साधै ।
धोती नेती करै कोई लै स्वासा बाँधै ॥
उनमुनि लावै ध्यान करै चौरासी आसन ।
कोई साखी सबद कोइ तप कुस कै डासन ॥
पलटू सब परपंच है करै सो फिर पछितात ।
(१) पानी के सूख जाने पर तलैया की तली फट कर मट्टी के थक्के बन जाते
हैं। (२) बचाने वाला ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ २३

एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
( ५७ )
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
नहीं पदारथ चार मुक्ति संतन की चेरी ।
ऋद्धि सिद्धि पर थुकैं स्वर्ग की आस न हेरी ॥
तीरथ करहिं न बर्त नहीं कछु मन में इच्छा ।
पुन्य तेज परताप संत को लगै अनिच्छा ॥
ना चाहें बैकुंठ न आवागवन निवार ।
सात स्वर्ग अपबर्ग तुच्छ सम ताहि बिचारा ॥
पलटू चाहै हरि भगति ऐसा मता हमार ।
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
( ५८ )
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
मची नाम की कीच बूढ़ा औ बाला गावै ।
परदे में जो रहै सब्द सुनि रोवत आवै ॥
भक्ति करै निरधार रहै तिर्गुन से न्यारा ।
आवै देय लुटाय आपु ना करै अहारा ॥
मन सब को हरि लेय सभन को राखै राजी ।
तीन देख ना सकै बैरागी पंडित काजी ॥
पलटूदास इक बानिया रहै अवध के बीच ।
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
॥ प्रेम ॥
( ५६ )
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
पिय की मीठी बोल सुनत मैं भई दिवानी ।
भँवरगुफा के बीच उठत है सोहं बानी ॥
दखा पिय का रूप रूप में जाय समानी ।

२४ कुंडलिया
जब से भया मिलाप मिले पर ना अलगानी ॥
प्रीत पुरानी रही लिया हम ने पहिचानी ।
मिली जोत में जोत सुहागिन सुरत समानी ॥
पलटू सब्द के सुनत ही घूँघट डारा खोल ।
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
( ६० )
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
आपुइ गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा ।
जेकर पिय में ध्यान भई वह पिय के भेसा ॥
आगि माहिं जो परै सोऊ अग्नी ह्वै जावै ।
भृङ्गी कीट को भेंट आपु सम लेइ बनावै ॥
सरिता बहि के गई सिन्धु में रही समाई ।
सिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई ॥
पलटू दिवाल कहकहा १ मत कोउ झाँकन जाय ।
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
( ६१ )
मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कंथ ॥
जब से पाया कंथ पंथ सतगुरु बतलाया ।
सतगुरु बड़े दयाल करी उन मो पर दाया ॥
स्वस्ता २ मन में आइ छुटी मेरी दुचिताई ।
सोऊँ कंथ के साथ अंग से अंग लगाई ॥
अभ्यन्तर ३ जागी प्रीत निरन्तर कंथ से लागी ।
दरस परस के करत जगत की भ्रमना भागी ॥
पलटू सतगुरु सब्द सुनि हृदय खुला है ग्रंथ ।
(१) एक दीवार कहानी की जिसका होना चीन देश में मशहूर है जिस
पर चढ़ कर दूसरी ओर झाँकने से परिस्तान दीख पड़ता है और ऐसा हर्ष होता है
कि हँसी के मारे देखने वाला बेइख्तियार होकर उधर कूद कर गायब हो जाता है ।
(२) शांति । (३) अंतर में ।

मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कंथ ॥
( ६२ )
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
जैसे चन्द चकोर पलक से टारत नाहीं ।
चुगै बिरह से आग रहै मन चन्दै माहीं ॥
फिरै जेही दिस चंद तेही दिसि को मुख फेरै ।
चन्दा जाय छिपाय आग के भीतर हेरै ॥
मधुकर तजै न पदम जान से जाइ बँधावै१ ।
दीपक में ज्यों पतंग प्रेम से प्रान गँवावै ॥
पलटू ऐसी प्रीत कर परधन चाहै चोर ।
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
( ६३ )
अम्मा मेरा दिल लगा मुझ से रहा न जाय ॥
मुझ से रहा न जाय बिना साहिब को देखे ।
जान तसद्बुक२ करौं लगै साहिब के लेखे ॥
मुझ को भया है रोग जायगा जीव हमारा ।
एकर दारु यही मिलै जो प्रीतम प्यास ॥
पड़ा प्रेम जंजाल जिकिर३ सीने में लागी ।
मैं गिरि परी बेहोस लोक की लज्जा भागी ॥
पलटू सतगुरु बैद बिन कौन सकै समझाय ।
अम्मा मेरा दिल लगा मुझ से रहा न जाय ॥
( ६४ )
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहिं ॥
सहज आसिकी नाहिं खाँड़ खाने को नाहीं ।


(१) रात को जब कमल सम्पुट अर्थात् बन्द होने लगता है तो भवँरा जो उस पर आसक्त है उड़ कर भागता नहीं बरन उसी के भीतर बन्द हो जाता है ।
(२) न्यौछावर । (३) सुमिरन ।
४

२६ कुंडलिया
झूठ आसिकी करै मुलुक में जूती खाही ॥
जीते जी मरि जाय करै ना तन की आसा ।
आसिक को दिन रात रहै सूली पर बासा ॥
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना ।
तिल भर रक्त न माँस नहीं आसिक को रोना ॥
पलटू बड़े बेकूफ वे आसिक होने जाहिं ।
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहिं ॥
( ६५ )
भूली जग की चाल सब भई जोगिनि अलमस्त ॥
भई जोगिनि अलमस्त खबर कछु तन की नाहीं ।
खाय पियै अब कौन रहै मन भजनै माहीं ॥
ऐसी लागी नेह तुरिया से भई अतीता ।
आठ पहर गलतान जोति के घर को जीता ॥
है गइ दसा अरूढ़ ज्ञान तजि भई बिज्ञानी ।
धरती नभ जरि गई जरा है पवन औ पानी ॥
पलटू दिनकर उदय भा रजनी है गई अस्त ।
भूली जग की चाल सब भई जोगिनि अलमस्त ॥
( ६६ )
फनि से मनि ज्यों बीछुरै जल से बिछुरै मीन ॥
जल से बिछुरै मीन प्रान को तुरत गँवावै ।
रहै न कोटि उपाय दूध के भीतर नावै ॥
ऐसी करै जो प्रीति ताहि की प्रीति सराहो ।
बिछुरे पर नर जियै प्रीति वाहू की नाहीं ॥
पटकि पटकि तन रहै बिछोहा सहा न जाई ।
नैन ओट जब भये प्रान को संग पठाई ॥
पलटू हरि से बीछुरे ये ना जीवैं तीन ।
फनि से मनि जो बीछुरे जल से बिछुरै मीन ॥

पलटू साहिब की बानी भाग—१ २७
( ६७ )
प्रेम बान जा के लगा सो जानैगा पीर ॥
सो जानैगा पीर काह मूरख से कहिये ।
तिल भरि लगै न ज्ञान ताहि से चुप है रहिये ॥
लाख कहै समुझाय बचन मूरख नहिं मानै ।
तासे कहा बसाय ठान जो अपनी ठानै ॥
जेहि के जगत पियार ताहि से भक्ति न आवै ।
सतसंगति से बिमुख और के सन्मुख धावै ॥
जिन कर हिया कठोर है पलटू धसै न तीर ।
प्रेम बान जा के लगा सो जानैगा पीर ॥
( ६८ )
अपने पिय की सुन्दरी लोग कहैं बौरान ॥
लोग कहैं बौरान काहि की पकरौं बानी ।
घर घर घोर मथान फिरौं मैं नाम दिवानी ॥
घूँघट डारेउँ खोलि ज्ञान कै ढोल बजाई ।
चढ़िउँ बाँस पर धाइ सहर के बिचै गड़ाई ॥
देखि देखि सब चिढ़ें लोग मैं अधिक चिढ़ावौं ।
लगी गुरु से डोरि मगन है ताहि रिझावौं ॥
पलटू हमरे देस की जानैं संत सुजान ।
अपने पिय की सुन्दरी लोग कहैं बौरान ॥
( ६६ )
सतगुरु सब्द के सुनत ही तन की सुधि रहि जात ॥
तन की सुधि रहि जात जाय मन अंतै अटका ।
बिसरी भूख पियास किया सतगुरु ने टोटका¹ ॥
दतुइन करी न जाय नहीं अब जाय नहाई ।
बैठा उठा न जाय फिरी अब नाम दुहाई ॥
(१) जादू ।

कौन बनावै भेष कौन अब टोपी देवै ।
बिसरा माला तिलक कौन अब दर्पन लेवै ॥
पलटू झुका है आपु को मुख से भली बात ।
सतगुरु सब्द के सुनत ही तन की सुधि रहि जात ॥
( ७० )
की तौ इक ठौरै रहै की दुइ में इक मरि जाय ॥
दुइ में इक मरि जाय रहत है दुबिधा लागी ।
सुचित नहीं दिन रात उठत बिरहा की आगी ॥
तुम जीवो भगवान मरन है मेरो नीका ।
तुम बिन जीवन धिक्क लगे कारिख को टीका ॥
की तुम आवो इहाँ लेव की प्रान अपाना ।
दोऊ को दुख होय हस जोड़ी अलगाना ॥
कह पलटू स्वामी सुनो चिन्ता सही न जाय ।
की तौ इक ठौरै रहै की दुइ में इक मरि जाय ॥
( ७१ )
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ॥
खाला का घर नाहिं सीस जब धरै उतारी ।
हाथ पाँव कटि जाय करै ना संत करारी१ ॥
ज्यों ज्यों लागै घाव तेहुँ तेहुँ कदम चलावै ।
सूरा रन पर जाय बहुरि ना जियता आवै ॥
पलटू ऐसे घर मँहैं बड़े मरद जे जाहिं ।
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ॥
( ७२ )
आसिक का घर दूर है पहुँचै बिरला कोय ॥
पहुँचै बिरला कोय होय जो पूरा जोगी ।
बिंद२ करै जो छार नाद के घर में भोगी ॥
(१) ठहराव, रोक । (२) काम को जला कर खाक कर डाले ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ २६
जीते जी मरि जाय मुए पर फिर उठि जागै ।
ऐसा जो कोइ होइ सोई इन बातन लागै ॥
पुरजे पुरजे उड़ै अन्न बिनु बस्तर पानी ।
ऐसे पर ठहराय सोई महबूब¹ बखानी ॥
पलटू आपु लुटावही काला मुँह जब होय ।
आसिक का घर दूर है पहुँचै बिरला कोय ॥
( ७३ )
जहाँ तनिक जल बीछुड़ै छोड़ि देतु है प्रान ॥
छोड़ि देतु है प्रान जहाँ जल से बिलगावै ।
देइ दूध में डारि रहै ना प्रान गँवावै ॥
जा को वही अहार ताहि को का लै दीजै ।
रहै ना कोटि उपाय और सुख नाना कीजै ॥
यह लीजै दृष्टान्त सकै सो लेइ बिचारी ।
ऐसो करै सनेह ताहि की मैं बलिहारी ॥
पलट ऐसी प्रीति करु जल और मीन समान ।
जहाँ तनिक जल बीछुड़ै छोड़ि देतु है प्रान ॥
( ७४ )
जो मैं हारौं राम की जो जीतौं तौ राम ॥
जो जीतौं तौ राम राम से तन मन लावौं ।
खेलौं ऐसो खेल लोक की लाज बहावौं ॥
पासा फेंकौं ज्ञान नरद बिस्वास चलावौं ।
चौरासी घर फिरै अड़ी पौबारह नावौं ॥
पौबारह सिरवाय एक घर भीतर राखौं ।
कच्ची मारौं पाँच रैनि दिन सत्रह भाखौं ॥
पलट बाजी लाइहौं दोऊ बिधि से राम ।
जो मैं हारौं राम की जो जीतौं तौ राम ॥
(१) प्रीतम ।

३० कुंडलिया
॥ बिस्वास ॥
( ७५ )
लगन महूरत झूठ सब और बिगाडै काम ॥
और बिगाड़ै काम साइत जनि सोधै कोई ।
एक भरोसा नाहिं कुसल कहवाँ से होई ॥
जेकरे हाथै कुसल ताहि को दिया बिसारी ।
आपन इक चतुराई बीच में करै अनारी ॥
तिनका टूटै नाहिं बिना सतगुरु की दाया ।
अजहूँ चेत गँवार जगत है झूठी काया ॥
पलटू सुभ दिन सुभ घड़ी याद पड़े जब नाम ।
लगन महूरत झूठ सब और बिगाड़ै काम ॥
( ७६ )
मोर राम मैं राम का ता से रहौं निसंक ॥
ता से रहौं निसंक तनिक मोर बार ना बाँकै ।
जो कोइ मानै बैर हारि के आपुइ थाकै ॥
दोऊ१ बिधि से राम भार उनके सिर दीन्हा ।
मो पर परै जो गाढ़ राम आपुइ पर लीन्हा ॥
राम भरोसा पाय डेरौं काहू से नाहीं ।
फूल में है ज्यों बास राम हैं हमहीं माहीं ॥
पलटू सब में राम है क्या राजा क्या रंक ।
मोर राम मैं राम का ता से रहौं निसंक ॥
( ७७ )
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
भाड़ परै संसार नाहिं काहू से कामा ।
मन बच करम लगाय जानिहौ केवल रामा ॥
लोक लाज कुल त्यागि जगत की बूझ बड़ाई२ ।
(१) परमार्थ और स्वार्थ दोनों में । (२) दुनिया की बूझ और बड़ाई की हैसियत ।

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ३१
निंदा कोउ कै जाय रहौ संतन सरनाई ॥
छोड़ौ दिन दिन संग सुनौ ना बेद पुराना ।
ठान अपनी ठानि आन ना करिहौ काना ॥
पलटू संसै छूटि गई मिलिया पूरा यार ।
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
॥ सतसंग ॥
( ७५ )
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
जाइ करै सतसंग प्रान बैराग उठावै ।
स्रवन करै बेदान्त मनन करि मन समुझावै ॥
तब साधै हठ जोग बिपर्जय¹ कौ घर पावै ।
प्रान करै आयाम पुरुष तब नजरि में आवै ॥
देखै अपनो रूप होय तब ज्ञान समाधी ।
तब दे साधन छोड़ि लेइ जब पहिले साधी ॥
पलटू खोवै आपु को तब लागैगा रंग ।
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
( ७६ )
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
जल में खोजै राम जाय के तीरथ स्रानै ।
भरमै चारिउ खूँट नहीं सुधि अपनी आनै ॥
फूल माहिं ज्यों बास काठ में अगिन छिपानी ।
खोदे बिनु नहिं मिलै अहै धरती में पानी ॥
जैसे दूध घृत छिपा छिपी मिहँदी में लाली ।
ऐसे पूरन ब्रह्म कहूँ तिल भरि नहिं खाली ॥
पलटू सतसंग बीच में करि ले अपना काम ।
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
(१) आपे को भूल जाना ।

३२ कुंडलिया
( ८० )
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
सीतल होवत साँप ताप को तुरत बुझाई ।
संगत के परभाव सीतलता वा में आई ॥
मूरख ज्ञानी होय जाय ज्ञानी में बैठै ।
फूल अलग का अलग बासना तिल में पैठै ॥
कंचन लोहा होय जहाँ पारस छुइ जाई ।
पनपै ऊकठा १ काठ जहाँ उन सरदी पाई ॥
पलटू संगत किये से मिटते तीनिउँ ताप ।
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
( ८१ )
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
लोहा महँग बिकान छुए से कीमत निकरी ।
चंदन के परसंग चंदन भई बन की लकरी ॥
जैसे तिल का तेल फूल सँग महँग बिकाई ।
सतसंगति में पड़ा संत भा सदन कसाई ॥
गंग में है सुभगंग मिली जो नारा सोती ।
सीप बीच जो पड़ै बूँद सो होवै मोती ॥
पलटू हरि के नाम से गनिका चढ़ी बिमान ।
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
( ८२ )
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
दियना लीजै बार महल में है उँजियारा ।
उदय होय ससि भान अमावस मिटै अँधियारा ॥
ज्ञान होय परगास कुमति जूआ में हारै ।
दुतिया २ खंडन करै एक को बैठि बिचारै ॥
(१) कटा हुआ । (२) द्वैत भाव ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३३
रचि रचि तीसौ सखी अभूषन प्रेम बनाई ।
गोबरधन मन पूजि बहुरि सब घर को आई ॥
पलटू सतसंगत मिला खेलि लेहु दिन चार ।
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
( ८३ )
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
घर में रहै सिकार भेद ना कोउ बतावै ।
गया अहेरी भूलि कहाँ से सावज¹ पावै ॥
खोजा चारिउ खूँट कहीं कुछ नजर न आवै ।
कतहूँ ना सुधि आइ नहीं कोउ भेद बतावै ॥
जप तप तीरथ बरत किया बहु नेम अचारा ।
खोजा बेद पुरान सबै सतसंग पुकारा ॥
सतगुरु किया इसारा पलटू लीन्हा मार ।
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
( ८४ )
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
खाये आलस होय कहो कैसी बिधि कीजै ।
दोऊ बिधि से बिपति दोस का को हम दीजै ॥
मन बैरी है बड़ा कहे में अपने नाहीं ।
पुन्न में करता पाप पाप में पुन्न कराही ॥
सुभ असुभ के बीच पड़ा है जीव बिचारा ।
दोऊ में वह मिला बात सब वही बिगारा ॥
पलटू सतसंगत दोऊ छुटै करै जो कोय ।
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
( ८५ )
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा² जाय ॥

(१) शिकार । (२) इस कुंडलिया में बिगड़ने का शब्द व्यंग से सुधरने के
अर्थ में कहा है।
५

३५ कुंडलिया
सो सो बिगरा जाय फूल सँग तेल बसाना ।
ज्ञानी के संग परा ज्ञान मूरख ने जाना ॥
पारस के परसंग बिगरि गा लोहा जाई ।
लोहा से भा कनक आपनी जाति गँवाई ॥
सलिता गइ है बिगरि मिली गंगा में जाई ।
मलया के परसंग काठ चन्दन कहवाई ॥
पलटू काग से हंस भा और काग पछिताइ ।
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा जाइ ॥
( ८६ )
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा१ हुआ तमाम ॥
मुद्दा हुआ तमाम परे सतसंगति माहीं ।
निस दिन तौलै पूर घाट२ अब सुपनेहु नाहीं ॥
पूँजी पाई साच दिनों दिन होती बढ़ती ।
सतगुरु के परताप भई है दौलत चढ़ती ॥
कोठी दसवें द्वार३ सहज की खेप चलावो ।
कोई न टोकनहार नफ़ा घर बैठे पावो ॥
दूनों पाँव पसारि कै निस दिन करो अराम ।
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा हुआ तमाम ॥
॥ सतसंग अनधिकारी को ॥
( ८७ )
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
लेता नाहीं कोय सीस को धरै उतारी ।
वही सकस४ को मिलै मरै की करै तयारी ॥
कडू बहुत सतनाम देखत कै डेरै सरीरा ।
रोटी खावनहार खायगा क्योंकर हीरा ॥
अंधा होवै नीक बैद का पथ जो खावै ।
(१) मतलब या काम। (२) कमी। (३) शून्य। (४) आदमी।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३५
मलयागिर की बास बाँस में नहीं समावै ॥
पलटू पारस क्या करै जो लोहा खोटा होय ।
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
॥ शब्द ॥
( ८८ )
सबद छुड़ावै राज को सबदै करै फकीर ॥
सबदै करै फकीर सबद फिर राम मिलावै ।
जिन के लागा सबद तिन्हें कछु और न भावै ॥
मरे सबद की घाव उन्हें को सकै जियाई ।
होइ गा उनका काम परी रोवै दुनियाई ॥
घायल भा वह फिरै सबद कै चोट है भारी ।
जियतै मिरतक होय झुकै फिर उठै सँभारी ॥
पलटू जिन के सबद का लगा कलेजे तीर ।
सबद छुड़ावै राज को सबदै करै फकीर ॥
( ८६ )
सुरत सबद के मिलन में मुझ को भया अनंद ॥
मुझ को भया अनंद मिला पानी में पानी ।
दोऊ से भा सूत नहीं मिलि कै अलगानी ॥
मुलुक भया सलतन्त१ मिला हाकिम को राजा ।
रैयत करै अराम खोलि के दस दरवाजा२ ॥
छूटी सकल बियाधि मिटी इंद्रिन की दुतिया ।
को अब करै उपाधि चोर से मिलि गइ कुतिया ॥
पलटू सतगुरु साहिब काटौ मेरी बंद ।
सुरत सबद के मिलन में मुझ को भया अनंद ॥
( ६० )
जोग जुगत आसन नहीं साधन नहीं बिबेक ॥
(१) अमन । (२) दसवाँ द्वार सन्तों का जो ओंकार पद के परे है ।

साधन नहीं बिबेक साधन सब कै के छूटा ।
लागी सहज समाधि सब्द ब्रह्मांड में फूटा ॥
खंडन तनिक न होय तेलवत१ लागी धारा ।
जोति निरन्तर बरै दसो दिसि भा उजियारा ॥
ज्ञान ध्यान सब छूटि छूटि संजम चतुराई ।
तन की सुधि गइ बिसरि अरूढ़२ अवस्था आई ॥
पलटू मैं भजनै भया रही न दूजी रेख ।
जोग जुगत आसन नहीं साधन नहीं बिबेक ॥
॥ ध्यान ॥
( ६१ )
कमठ दृष्टि जो लावई सो ध्यानी परमान ॥
सो ध्यानी परमान सुरति से अंडा सेवै ।
आप रहै जल माहिं सूखे में अंडा देवै ॥
जस पनिहारी कलस भरे मारग में आवै ।
कर छोड़े मुख बचन चित कलसा में लावै ॥
फनि मनि धरै उतारि आपु चरने को जावै ।
वह गाफिल ना परै सुरति मनि माहिं रहावै ॥
पलटू सब कारज करै सुरति रहै अलगान ।
कमठ दृष्टि जो लावई सो ध्यानी परमान ॥
( ६२ )
जैसे कामिनि के विषय कामी लावै ध्यान ॥
कामी लावै ध्यान रैन दिन चित्त न टारै ।
तन मन धन मर्याद कामिनि के ऊपर वारै ॥
लाख कोऊ जो कहै कहा ना तनिकौ मानै ।
बिन देखे ना रहै वाहि को सर्बस जानै ॥
लेय वाहि को नाम वाहि की करै बड़ाई ।
(१) तेल के समान । (२) ऊँची ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३७
तनिक बिसारै नाहिं कनक ज्यों किरपन१ पाई ॥
ऐसी प्रीति अब दीजिये पलटू को भगवान ।
जैसे कामिनि के विषय कामी लावै ध्यान ॥
॥ घट मठ ॥
( ६३ )
साहिब साहिब क्या करै साहिब तेरे पास ॥
साहिब तेरे पास याद करु होवै हाजिर ।
अंदर धसि कै देखु मिलेगा साहिब नादिर ॥
मान मनी हो फना२ नूर तब नजर में आवै ।
बुरका३ डारै टारि खुदा बाखुद४ दिखरावै ॥
रूह करै मेराज५ कुफर का खोलि कुलाबा६ ।
तीसौ रोजा रहै अंदर में सात रिकाबा७ ॥
लामकान में रब्ब को पावै पलटूदास ।
साहिब साहिब क्या करै साहिब तेरे पास ॥
( ६४ )
दिल में आवै है नजर उस मालिक का नूर ॥
उस मालिक का नूर कहाँ को ढूँढ़न जावै ।
सब में पूर समान दरस घर बैठे पावै ॥
धरती नभ जल पवन तेही का सकल पसारा ।
छुटै भरम की गाँठि सकल घट ठाकुरद्वारा ॥
तिल भरि नाहिं कहीं जहाँ नहिं सिरजनहारा ।
वोही आवै नजर फुरा८ बिस्वास हमारा ॥
पलटू नेरे साच के झूठे से है दूर ।
दिल में आवै है नजर उस मालिक का नूर ॥
( ६५ )
खोजत खोजत मरि गये घर ही लागा रंग ॥
(१) कंजूस । (२) नष्ट । (३) घूँघट । (४) अपने में । (५) चढ़ाई । (६) जंजीर,
सिकरी । (७) पद, स्थान । (८) सच्चा ।

३८ कुंडलिया
घर ही लागा रंग कीन्ह जब संतन दाया ।
मन में भा बिस्वास छूटि गइ सहजै माया ॥
बस्तु जो रही हिरान ताहि का लगा ठिकाना ।
अब चित चलै न इत उत आपु में आपु समाना ॥
उठती लहर तरंग हृदय में सीतल लागे ।
भरम गई है सोय बैठि कै चेतन जागे ॥
पलटू खातिर जमा भई सतगुरु के परसंग ।
खोजत खोजत मरि गये घर ही लागा रंग ॥
( ६६ )
नजर मँहै सब की पड़े कोऊ देखै नाहिं ॥
कोऊ देखै नाहिं सीस पै सब के छाजै ।
पूरन ब्रह्म अखंड सकल घट आपु बिराजै ॥
दिवसै फिरै भुलान रहै तिरगुन महँ माता ।
देखि देखि दै छाड़ि पंडित पहँ¹ पूजन जाता ॥
भूला सब संसार भेद नहिं जानै वा की ।
देखत है इक संत ज्ञान की दीठी² जा की ॥
पलटू खाली कहूँ नहिं परगट है जग माहिं ।
नजर मँहै सब की पड़े कोऊ देखै नाहिं ॥
॥ दास ॥
( ६७ )
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान³ ॥
सो बैराग प्रमान सेवा साधुन की कीजै ।
तब छोड़ै संसार बूझ घरही में लीजै ॥
काढ़े रस रस गोड़⁴ कछुक दिन फिरै उदासी ।
सतगुरु उहवाँ बसैं जहाँ काया की कासी ॥
आसन से दृढ़ होय घटावै नींद अहारा ।
(१) पास । (२) दृष्टि, निगाह । (३) मानने योग्य । (४) धीरे-धीरे कदम बढ़ावै ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३६
काम क्रोध को मारि तत्व का करै बिचारा ॥
भक्ति जोग के पीछे पलटू उपजै ज्ञान ।
पहिले दासातन करै सो बैराग प्रमान ॥
( ६५ )
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ।
साहिब ताकै मोर मिहर की नजरि निहारै ॥
तुरत पदम-पद देइ औगुन को नाहिं बिचारै ॥
राम गरीवनिवाज गरीबन सदा निवाजा ।
भक्त-बछल१ भगवान करत भक्तन के काजा ॥
गाफिल नाहीं परै साच है लौ जब लावै ।
परा रहै बहि द्वार धनी कै धक्का खावै ॥
आठ पहर चौंसठ घरी पलटू परै न भोर२ ।
का जानी केहि औसर साहिब ताकै मोर ॥
( ६६ )
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
चाकर रहै हजूर होइ ना निमक-हरामी ।
डेरत रहै दिन राति लगै ना कबहीं खामी३ ॥
आठ पहर रहै ठाढ़ सोई है चाकर पूरा ।
का जानी केहि घरी हरी दै देइ अजूरा४ ॥
निवाले रोह बरोह सलाम में रहता चोटा ।५
वह काफिर बेपीर खायगा आखिर सोटा ॥
पलटू पलक न भूलिये इतना काम जरूर ।
खामिंद कब गोहरावै चाकर रहै हजूर ॥
(१) भक्त वत्सल = भक्त को प्यार करने वाला । (२) भूल । (३) कचाई, चूक ।
(४) मिहमताना, इनाम । (५) खाना (निवाला) मिलने के वक्त तो हाजिर (रोह ब
रोह = रूबरू) और सलाम यानी काम के वक्त गायब (चोटा = चोर ।

४० कुंडलिया
॥ सूरमा ॥
( १०० )
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
तरकस बाँधे ज्ञान मोह दल मारि हटाई ।
मारि पाँच पच्चीस दिहा गढ़ आगि लगाई ॥
काम क्रोध को मारि कैद में मन को कीन्हा ।
नव दरवाजे छोड़ि सुरत दसएँ पर दीन्हा ॥
अनहद बाजै तूर अटल सिंहासन पाया ।
जीव भया संतोष आय गुरु नाम लखाया ॥
पलटू कफ्फन बाँधि के खैंचो सुरति कमान ।
संत चढ़े मैदान पर तरकस बाँधे ज्ञान ॥
( १०१ )
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
संत सिपाहि क पूत इसिम¹ में दाग न लागै ।
महा मोह दल टारि बहुरि ना पानी माँगै ॥
मारै पाँच पचीस बचै ना तिगुन पावै ।
लालच का सिर काटि मुलुक में अदल चलावै ॥
तृस्ना और हङ्कार माया की गर्दन मारै ।
मन को लेवै पकरि कैद करि बेरी दारै ॥
पलटू टरै न खेत से सोई है अवधूत² ।
बाना बाँधै लड़ि मरै संत सिपाहि क पूत ॥
( १०२ )
काया कोट छुडावै सोई है रजपूत ॥
सोई है रजपूत देइ गढ़ आगि लगाई ।
मुरचा पाँच पचीस बात में लेइ छुड़ाई ॥
काया गढ़ के बीच जाय के थाना करना ।
मन है बड़ा मवास³ पकरि के ठौरै मरना ॥
(१) नाम । (२) मस्त फकीर । (३) ठग ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ४१
काम क्रोध को मारि लोभ औ मोह हंकारा ।
लालच का सिर काटि बहै लोहू की धारा ॥
पलटू अठएँ लोक में अमल करै अवधूत ।
काया कोट छुड़ावै सोई है रजपूत ॥
( १०३ )
संत चढ़े जो मोह१ पर काया नगर मंझार ॥
काया नगर मंझार ज्ञान का तरकस बाँधे ।
दम की गोली साधि विस्वास बन्दूक है काँधे ॥
घोड़ा है संतोष छिमा का जीन बँधाई ।
बखतर पहिरे प्रेम गगन में लै दौड़ाई ॥
मुरचा पाँच पचीस बात में लिहा छुड़ाई ।
मन के बेरी२ डारि नगर में अदल चलाई ॥
पलटू सुरति कमान करि नाम निसाना मार ।
संत चढ़े जो मोह पर काया नगर मंझार ॥
( १०४ )
लागी गोली नाम की पलटू गया है लोट ॥
पलटू गया है लोट चोट सब्दन की लागी ।
रंजक दै कै ज्ञान दिया संतन ने दागी ॥
लोथ परी भहराय उठत हैं गिद्ध मसाना ।
भागे कादर३ देखि खेत सूरा ठहराना ॥
मारैं भरि भरि भेद छेद भा तन में तिल तिल ।
कड़खा४ दै ललकार खाल गिरि परी है छिल छिल ।
सतगुरु के मैदान में रही न तनिकौ ओट ।
लागी गोली नाम की पलटू गया है लोट ॥
(१) मोह दल पर चढ़ाई की । (२) बेड़ी । (३) कायर । (४) सूरता की महिमा
के शब्द ।
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