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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

पलटू साहिब की बानी भाग—१ २७
( ६७ )
प्रेम बान जा के लगा सो जानैगा पीर ॥
सो जानैगा पीर काह मूरख से कहिये ।
तिल भरि लगै न ज्ञान ताहि से चुप है रहिये ॥
लाख कहै समुझाय बचन मूरख नहिं मानै ।
तासे कहा बसाय ठान जो अपनी ठानै ॥
जेहि के जगत पियार ताहि से भक्ति न आवै ।
सतसंगति से बिमुख और के सन्मुख धावै ॥
जिन कर हिया कठोर है पलटू धसै न तीर ।
प्रेम बान जा के लगा सो जानैगा पीर ॥
( ६८ )
अपने पिय की सुन्दरी लोग कहैं बौरान ॥
लोग कहैं बौरान काहि की पकरौं बानी ।
घर घर घोर मथान फिरौं मैं नाम दिवानी ॥
घूँघट डारेउँ खोलि ज्ञान कै ढोल बजाई ।
चढ़िउँ बाँस पर धाइ सहर के बिचै गड़ाई ॥
देखि देखि सब चिढ़ें लोग मैं अधिक चिढ़ावौं ।
लगी गुरु से डोरि मगन है ताहि रिझावौं ॥
पलटू हमरे देस की जानैं संत सुजान ।
अपने पिय की सुन्दरी लोग कहैं बौरान ॥
( ६६ )
सतगुरु सब्द के सुनत ही तन की सुधि रहि जात ॥
तन की सुधि रहि जात जाय मन अंतै अटका ।
बिसरी भूख पियास किया सतगुरु ने टोटका¹ ॥
दतुइन करी न जाय नहीं अब जाय नहाई ।
बैठा उठा न जाय फिरी अब नाम दुहाई ॥
(१) जादू ।