पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमगन भई मेरी माइजी जब से पाया कंथ ॥
( ६२ )
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
जैसे चन्द चकोर पलक से टारत नाहीं ।
चुगै बिरह से आग रहै मन चन्दै माहीं ॥
फिरै जेही दिस चंद तेही दिसि को मुख फेरै ।
चन्दा जाय छिपाय आग के भीतर हेरै ॥
मधुकर तजै न पदम जान से जाइ बँधावै१ ।
दीपक में ज्यों पतंग प्रेम से प्रान गँवावै ॥
पलटू ऐसी प्रीत कर परधन चाहै चोर ।
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
( ६३ )
अम्मा मेरा दिल लगा मुझ से रहा न जाय ॥
मुझ से रहा न जाय बिना साहिब को देखे ।
जान तसद्बुक२ करौं लगै साहिब के लेखे ॥
मुझ को भया है रोग जायगा जीव हमारा ।
एकर दारु यही मिलै जो प्रीतम प्यास ॥
पड़ा प्रेम जंजाल जिकिर३ सीने में लागी ।
मैं गिरि परी बेहोस लोक की लज्जा भागी ॥
पलटू सतगुरु बैद बिन कौन सकै समझाय ।
अम्मा मेरा दिल लगा मुझ से रहा न जाय ॥
( ६४ )
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहिं ॥
सहज आसिकी नाहिं खाँड़ खाने को नाहीं ।
(१) रात को जब कमल सम्पुट अर्थात् बन्द होने लगता है तो भवँरा जो उस पर आसक्त है उड़ कर भागता नहीं बरन उसी के भीतर बन्द हो जाता है ।
(२) न्यौछावर । (३) सुमिरन ।
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