पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ कुंडलिया
झूठ आसिकी करै मुलुक में जूती खाही ॥
जीते जी मरि जाय करै ना तन की आसा ।
आसिक को दिन रात रहै सूली पर बासा ॥
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना ।
तिल भर रक्त न माँस नहीं आसिक को रोना ॥
पलटू बड़े बेकूफ वे आसिक होने जाहिं ।
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहिं ॥
( ६५ )
भूली जग की चाल सब भई जोगिनि अलमस्त ॥
भई जोगिनि अलमस्त खबर कछु तन की नाहीं ।
खाय पियै अब कौन रहै मन भजनै माहीं ॥
ऐसी लागी नेह तुरिया से भई अतीता ।
आठ पहर गलतान जोति के घर को जीता ॥
है गइ दसा अरूढ़ ज्ञान तजि भई बिज्ञानी ।
धरती नभ जरि गई जरा है पवन औ पानी ॥
पलटू दिनकर उदय भा रजनी है गई अस्त ।
भूली जग की चाल सब भई जोगिनि अलमस्त ॥
( ६६ )
फनि से मनि ज्यों बीछुरै जल से बिछुरै मीन ॥
जल से बिछुरै मीन प्रान को तुरत गँवावै ।
रहै न कोटि उपाय दूध के भीतर नावै ॥
ऐसी करै जो प्रीति ताहि की प्रीति सराहो ।
बिछुरे पर नर जियै प्रीति वाहू की नाहीं ॥
पटकि पटकि तन रहै बिछोहा सहा न जाई ।
नैन ओट जब भये प्रान को संग पठाई ॥
पलटू हरि से बीछुरे ये ना जीवैं तीन ।
फनि से मनि जो बीछुरे जल से बिछुरै मीन ॥