पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 116 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ कुंडलिया
जब से भया मिलाप मिले पर ना अलगानी ॥
प्रीत पुरानी रही लिया हम ने पहिचानी ।
मिली जोत में जोत सुहागिन सुरत समानी ॥
पलटू सब्द के सुनत ही घूँघट डारा खोल ।
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
( ६० )
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
आपुइ गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा ।
जेकर पिय में ध्यान भई वह पिय के भेसा ॥
आगि माहिं जो परै सोऊ अग्नी ह्वै जावै ।
भृङ्गी कीट को भेंट आपु सम लेइ बनावै ॥
सरिता बहि के गई सिन्धु में रही समाई ।
सिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई ॥
पलटू दिवाल कहकहा १ मत कोउ झाँकन जाय ।
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
( ६१ )
मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कंथ ॥
जब से पाया कंथ पंथ सतगुरु बतलाया ।
सतगुरु बड़े दयाल करी उन मो पर दाया ॥
स्वस्ता २ मन में आइ छुटी मेरी दुचिताई ।
सोऊँ कंथ के साथ अंग से अंग लगाई ॥
अभ्यन्तर ३ जागी प्रीत निरन्तर कंथ से लागी ।
दरस परस के करत जगत की भ्रमना भागी ॥
पलटू सतगुरु सब्द सुनि हृदय खुला है ग्रंथ ।
(१) एक दीवार कहानी की जिसका होना चीन देश में मशहूर है जिस
पर चढ़ कर दूसरी ओर झाँकने से परिस्तान दीख पड़ता है और ऐसा हर्ष होता है
कि हँसी के मारे देखने वाला बेइख्तियार होकर उधर कूद कर गायब हो जाता है ।
(२) शांति । (३) अंतर में ।