पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ २३
एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
( ५७ )
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
नहीं पदारथ चार मुक्ति संतन की चेरी ।
ऋद्धि सिद्धि पर थुकैं स्वर्ग की आस न हेरी ॥
तीरथ करहिं न बर्त नहीं कछु मन में इच्छा ।
पुन्य तेज परताप संत को लगै अनिच्छा ॥
ना चाहें बैकुंठ न आवागवन निवार ।
सात स्वर्ग अपबर्ग तुच्छ सम ताहि बिचारा ॥
पलटू चाहै हरि भगति ऐसा मता हमार ।
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
( ५८ )
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
मची नाम की कीच बूढ़ा औ बाला गावै ।
परदे में जो रहै सब्द सुनि रोवत आवै ॥
भक्ति करै निरधार रहै तिर्गुन से न्यारा ।
आवै देय लुटाय आपु ना करै अहारा ॥
मन सब को हरि लेय सभन को राखै राजी ।
तीन देख ना सकै बैरागी पंडित काजी ॥
पलटूदास इक बानिया रहै अवध के बीच ।
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
॥ प्रेम ॥
( ५६ )
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
पिय की मीठी बोल सुनत मैं भई दिवानी ।
भँवरगुफा के बीच उठत है सोहं बानी ॥
दखा पिय का रूप रूप में जाय समानी ।