पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकौन बनावै भेष कौन अब टोपी देवै ।
बिसरा माला तिलक कौन अब दर्पन लेवै ॥
पलटू झुका है आपु को मुख से भली बात ।
सतगुरु सब्द के सुनत ही तन की सुधि रहि जात ॥
( ७० )
की तौ इक ठौरै रहै की दुइ में इक मरि जाय ॥
दुइ में इक मरि जाय रहत है दुबिधा लागी ।
सुचित नहीं दिन रात उठत बिरहा की आगी ॥
तुम जीवो भगवान मरन है मेरो नीका ।
तुम बिन जीवन धिक्क लगे कारिख को टीका ॥
की तुम आवो इहाँ लेव की प्रान अपाना ।
दोऊ को दुख होय हस जोड़ी अलगाना ॥
कह पलटू स्वामी सुनो चिन्ता सही न जाय ।
की तौ इक ठौरै रहै की दुइ में इक मरि जाय ॥
( ७१ )
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ॥
खाला का घर नाहिं सीस जब धरै उतारी ।
हाथ पाँव कटि जाय करै ना संत करारी१ ॥
ज्यों ज्यों लागै घाव तेहुँ तेहुँ कदम चलावै ।
सूरा रन पर जाय बहुरि ना जियता आवै ॥
पलटू ऐसे घर मँहैं बड़े मरद जे जाहिं ।
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ॥
( ७२ )
आसिक का घर दूर है पहुँचै बिरला कोय ॥
पहुँचै बिरला कोय होय जो पूरा जोगी ।
बिंद२ करै जो छार नाद के घर में भोगी ॥
(१) ठहराव, रोक । (२) काम को जला कर खाक कर डाले ।