पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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विज्ञप्तिः
विदिततरमेवेदं तत्र भवतां प्रेक्षावतां यत् किल पुरा भारते वर्षे न
केवलमध्यात्मविद्याया एवानुशीलनं निदधानास्ते विश्वविश्रुतकीर्तय-
स्तीर्थङ्करास्ततोऽन्यत्र स्वनयनं न विदधतिस्मेति। अध्यात्मविद्यैव ये खलुः
लौकिकसूक्ष्मविषयास्तैः केवलेन प्रज्ञाबलेनैवानुशीलितास्तेष्वेवान्यतममिदं
“नलपाकदर्पणं” मिदानीमुपक्रम्यते मुद्रयित्वा प्रकाशयितुम्। निबन्धोऽयं
भारतेतिहासप्रसिद्धेन निषधदेशाधिपतिना नलेन प्रणीत इति ग्रन्थस्य
नाम्ना, सन्दर्भेण च विज्ञायते। स खलु महाराजो नलः कदा प्रादुर्भूदिति
निर्णये महाभारतमेव प्राधान्येन वरीवर्त्ति। परन्तु महाभारतमपि स
कस्मिन् समये प्रादुर्भूदिति न सम्यङ् निर्धारयति। एतावदेवास्ति तत्र
वनपर्वणि—
"आसीद्राजा नलो नाम वीरसेनसुतो बली।
उपपन्नो गुणैरिष्टैरूपवानश्वकोविदः। इति वन ५३ अ०
परमपरोऽपि कश्चिदस्ति नलनामा नृपतिर्यः खलु सूर्यवंशे समज्रनि ।
यथा सूर्यवंशवर्णने—
'अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः।
नलस्तु नैषधस्तस्मान्नभस्तस्मादजायतइति ।
एतदेव द्रढयति मत्स्यपुराणं हरिवंशश्च—
मात्स्ये यथा—
नलौ द्वावेव विख्यातौ वंशे कश्यपसम्भवे।
वीरसेनसुतस्तद्वन्नैषधश्च नराधिपः॥
हरिवंशे च—
नलौ द्वावेव विख्यातौ पुराणे भरतर्षभ।
वीरसेनात्मजश्चैव यश्चेक्ष्वाकुकुलोद्वह इति ॥
परमेषोऽस्माकं समालोच्यविषयो नलपाकदर्पणप्रणेता नलस्तुः न सूर्य-
वंशीयनिषधपुत्रः किन्तु निषधदेशाधिपतेः चन्द्रवंशीयवीरसेनस्यात्मजः ।
कविकुलचूडामणिना श्रीहर्षेणापि प्रतिपादितमेतत् स्वरचितनैषधचरित-
भू० १ पा० द०
Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text from both pages:
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( २ )
काव्ये—
“सुधांशुवंशस्य करीरमेव मां,
निशम्य किं नासि फलेग्रहि ग्रहा ॥” इति ।
एष एव महाराजो नलः दमयन्तीस्वयम्बरे समागतान् इन्द्रादिलोक-
पालचतुष्टयान् दौत्येन प्रसाद्याष्टौ वरानध्यगच्छदिति सुविदितमेव ।
यथा—वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ।
प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाष्टौ वरान् ददुः ॥ इति ।
महा० वन० ५८ अ० ।
तेषामेवैकतमं सूदविद्यापारदर्शित्वं नाम वरं परेतभर्तुः ॐसकाशा-
दधिगतवान् महीश्वरो नल इत्यस्य ग्रन्थस्य प्रथमप्रकरणे, महाभारते च
दृश्यते । यथा—
“शृणु राजेन्द्र विद्याया निदानं मम तत्त्वतः ।
स्वयंवरार्थं वैदर्भ्याः समायाताः सुरेश्वराः ॥
ततोऽन्नरससिद्धिश्च सूर्यपुत्रादलौकिकम् ।”
नलपा० १ प्र० ।
महाभारते च—
“तस्मिन्नन्तर्हिते नागे प्रययौ नैषधो नलः ।
ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशद् दशमेऽहनि ॥
स राजानमुपातिष्ठद्वाहकोऽहमिति ब्रुवन् ।
अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ।
अन्नसंस्कारमपि च जानाम्यन्यैर्विशेषतः ॥” वन० ६७ अ० ।
नैषधचरितेऽपि—
“अमुष्य विद्यारसनाग्रनर्त्तकी” त्यादि श्लोके “रसनाग्रनर्त्तकी”त्यनेन
सूदविद्यैव लक्षितेति । अत एव पाकदर्पणप्रणेता नलश्चन्द्रवंशीयवीरसेन-
नृपतेस्तनय इति सुस्पष्टमेव वक्तुं शक्यते ।
महाराजनलस्य जन्मसमयनिर्धारणन्तु दुःशकमेव । केचितु --
'अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो भवेदिति ।'
“प्रतिकुर्व्वन्ति नूनं नलरामयुधिष्ठिरा” इत्यत्र नलरामयुधिष्ठिरा इति
युगक्रमं निर्दिशन्तो नलस्य कृतयुगप्रादुर्भूतत्वं स्थापयन्ति प्रदर्शयन्ति
ॐ यमस्त्वन्नरसं प्रादाद्धर्मे च परमां स्थितिम् । वन० ५७,३७३ श्लो०
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( ३ )
चापरं निदर्शनं श्रीहर्षस्य सूक्तम्—
पदैश्चतुर्भिः सुकृते स्थिरीकृते,
कृतेऽमुना के न तपः प्रपेदिरे । इत्यादि ।
परन्तु वयं विनिगमकाभावादस्मिन् विषये माध्यस्थ्यमेवावलम्बामहे ।
प्राधान्येनास्मिन् निबन्धे एकादशप्रकरणानि वर्त्तन्ते । तेषु च यथायथं
नानाविधाः पाकसाधनोपायाः पाकभेदाश्च प्रदर्शिताः । आयुर्वेदीयमतानु-
सारेण ऋतुभेदेन च पाकभेदान् प्रदर्श्य परमरमणीयत्वमुपादेयत्वञ्च निबन्ध-
स्यास्य सम्पादितं निबन्धकारेण । प्रथमस्तावदोदनभेदः । द्वितीयः
सूपभेदस्ततश्च क्रमेण सर्पिर्भेदः । व्यञ्जनभेदः । मांसपाकभेदः । भक्ष्यभेदः ।
पायसभेदः । रसायनभेदः । पानभेदः । यूषभेदः । घृताद्यन्नभेदः । लेह्यभेदः ।
क्षीरभेदः । तक्रभेदश्चान्ये चावान्तरभेदाः समीचीनरीत्या प्रदर्शिताः ।
पुस्तकस्यास्य परमोपादेयत्वेऽपि एतस्य मुद्रणाय वाराणसेय-
चौखम्बासंस्कृतसीरिजसम्पादकेन सुप्रसिद्धबाबुहरिदासतनूजनुषा श्रीमता
हरेकृष्णगुप्तेन बहुशोऽनुरुद्धोऽपि च विशुद्धादर्शपुस्तकाभावात् कालमेता-
वन्तं शिथिलप्रयत्न एवासम् । अनन्तरञ्च वाराणसीस्थराजकीयसंस्कृत-
पाठशालीयपुस्तकालयाध्यक्षेण पण्डितवर श्रीमद्विन्ध्येश्वरोप्रसादद्विवेदि-
महाशयेन पुस्तकदानादिना परमनुगृहीतोऽहं कथमप्येतन्मुद्रणमकरवम् ।
तत्र तेनैव महाशयेन प्रदत्तमेकमेव नवीनमनतिविशुद्धञ्च पुस्तकमन्य-
गतिकत्वादादर्शरूपेण परिकल्पितं मया । सोस्काक्षराणां दोषेण वा
मम मतेरपाटवाद्वा सम्भाव्यन्त एवाशुद्धयः । अतः साञ्जलिबद्धमभ्यर्थ-
येऽहं श्रीमद्भिः कृपया ते ते दोषाः क्षन्तव्या इत्यलं पल्लवितेनेतिशम् ।
वाराणसी ।
भाद्रशुक्ल चतुर्थ्यां १९६८ । श्रीवामाचरणशर्मणः ।
२ पा.द.
प्रस्तावना
पुरातनवाङ्मय मानवोचित सुख-साधन सामग्री को संजोने में कुछ कसर
नहीं रक्खा है। या यों कहना चाहिए कि वेद, उपनिषद्, पुराण, धर्मशास्त्र
आदि ग्रंथ मानव को सर्वोत्तम सुख शान्ति की ओर प्रेरित करते हैं। जहां पर
परम श्रेय की प्राप्ति के लिए शास्त्र उपदेश देते हैं वही व्यवहार जगत् में
मनुष्य के ऐहिक सुख को प्राप्त कराने में कुछ उठा नहीं रखते। पहले मनुष्य को
स्वस्थ्य रहना है तभी परम श्रेय की प्राप्ति हो सकती है। "धर्मार्थकाममोक्षाणा-
मारोग्यं मूलमुत्तमम्" इस सूक्ति को किसने नहीं दुहराया है और आरोग्य के बिना
किस ने परम पद को प्राप्त किया है।
महर्षि चरक ने स्वस्थवृत्त उपदेश के साथ उपस्तम्भत्रय को विधिवत्
पालन करने की ओर संकेत किया है। "त्रय उपस्तम्भाः आहारो निद्रा ब्रह्मचर्य-
मिति"। स्वस्थ रहने के लिये सभी साधनों में आहार का प्रमुख स्थान है।
उसका विविध निर्माण, उपयुक्त समय, उपयोग, प्रकार आदि के प्रकार का ज्ञान
स्वस्थ वृत्त के साथ होना आवश्यक है।
प्रस्तुत ग्रन्थ नलविरचित 'पाकदर्पण' में स्वस्थ वृत्त के विवेचन के साथ
आहार सम्बन्धी पाक निर्माण प्रकार का भी विस्तृत निरूपण करने में ग्रन्थकार
ने बहुत बड़ा प्रयास किया है। स्वस्थ वृत्त में दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या
आदि सभी विषयों पर स्पृहणीय प्रकाश डाला गया है। ग्रन्थकार ने दिन-रात
में किस प्रकार छः ऋतुओं का परिभ्रमणचक्र चलता रहता है इस बात को
बड़ी बारीकी के साथ प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार अन्न में ६३ रस होते हैं
और असुत, पिच्छल, अशुचि शुष्कान्न, दग्धान्न, विरूपान्न, क्वथितान्न आदि आठ
दोष होते हैं। जिनका सलक्षण वर्णन मिलता है। आगे चलकर उन्होंने पाक के
विविध निर्माण प्रकार को स्पष्ट वर्णन किया गया है। भात बनाने में कितना जल
कितना चावल एवं कितने आँच पर बनाना चाहिए इसको दर्शाया है जिसकी
अनुकृति आजकल कदम-कदम पर देखी जा रही है। पाक निर्माण में मांस,
मछली, पुलाव आदि का निर्माण प्रकार उपयोग एवं उसके लाभ का भी वर्णन
है। विविध दालों का नाम, निर्माण प्रकार एवं उनके गुणों का भी वर्णन है।
यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
( ६ )
आगे चलकर दूध, दही, घी तक्र आदि का गुण सहित वर्णन मिलता है।
व्यवहारोपयोगी विविध शाकों का वर्णन है, तथा उनको बनाने के विभिन्न प्रकारों
का दिग्दर्शन कराया गया है। विचित्र शाक का विशिष्ट प्रतिपादन तो इनकी
विशेष बुद्धि का विशिष्ट परिचय है। भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य, पेय आदि पञ्च-
विध भोजन को कैसे बनाया जाता है, उसके कौन-कौन उपकरण हैं तथा
उनके क्या गुण हैं यह सब ग्रन्थकार की अद्भुत देन है। फलों से जितने भी
प्रकार बन सकते हैं उनका विस्तार पूर्वक प्रयोगात्मक वर्णन मिलता है।
इस ग्रन्थ को ग्यारह प्रकरणों में बाँटा गया है। सब से बड़ा प्रकरण पहला
है। जिसमें पाक का विवेचन विस्तारपूर्वक किया गया है। दाल के भेद, घी के
भेद, व्यञ्जन भेद, मांसपाक प्रकार आदि प्रथम प्रकारण के अवान्तर भेद हैं।
द्वितीय प्रकरण में ऋतु वर्णन प्रतिदिन ऋतुओं के परिभ्रमण का क्रम एवं उनकी
उपयोगिता, तृतीय प्रकरण में विभिन्न भक्ष्य भोज्यादि का वर्णन, चतुर्थ में पायस
के विभिन्न प्रकार एवं गुण, पञ्च
( ८ )
में नियुक्त होने की चर्चा है। पाकदर्पण १ में नल ने स्वयं अपने को बाहुक नाम
से ऋतुपर्ण के नगर में जाना तथा अश्ववाहन विद्या तथा पाक विद्या में अपने
को प्रवीण बता कर रहने का उल्लेख किया है।
राजा नल का जन्म कब हुआ, इसका निर्णय करना कठिन हैं क्योंकि इनके
सम्बन्ध में कोई उल्लेख नहीं मिलता । कवि कुल चूडामणि हर्ष ने सत्ययुग में
उत्पन्न होने की बात दर्शाई है "पदैश्चतुर्भिः सुकृते स्थिरी कृते कृतेऽमुना केन तपः
प्रपेदिरे" इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। इन की उत्पत्ति सत्ययुग में हुई
इसका कोई विशिष्ट प्रमाण उपलब्ध न होने से उनका जन्म काल अन्वेषणीय है।
यह ग्रन्थ प्राचीन काल का आहार-विचार रहन-सहन आदि का ज्वलन्त
प्रतीक है। इससे हम प्राचीन परम्पराओं का स्वरूप आधुनिक समय में जन-
साधारण के सामने रख सकते हैं कि उस समय हमारा विज्ञान कितना परिपूर्ण था।
क्षेम कुतूहम् के प्रकाशन के समय से ही मेरा मन नल पाकदर्पण के प्रकाशन
की ओर लगा था अनुवाद भी उसके बाद ही हो गया था। किन्तु कुछ कार्य
कारण वश विलम्ब हो गया। प्रसङ्गतः बात चीत के प्रवाह में चौखम्भा संस्कृत
संस्थान के संस्थापक श्रीमोहनलाल गुप्त के सौजन्य से इसको प्रकाशित करने में
अधिक बिलम्ब नहीं हुआ और अब पाठकों के सामने प्रस्तुत है। आशा है यह
हिन्दी रूपान्तर साहित्यिकों की रुचि को बढ़ायेगा ।
इसके अनुवाद में अनेक ग्रन्थों का सहयोग लेना पड़ा है जिनके कर्त्ता का
आभारी हूँ। प्रूफ संशोधन एवं संयोजन में मेरे कनिष्ठ पुत्र रजनीश त्रिपाठी का
बहुत सहयोग रहा है। उनके भविष्य की शुभकामना करता हूँ। श्री कपिल देव
गिरिजी शोध सहायक, संस्कृत महाविद्यालय का० हि० वि० वि० का सहयोग ही
नहीं मार्ग प्रदर्शन भी अद्वितीय रहा है। अतः उनको हार्दिक धन्यवाद है।
यह कृति विश्वनाथ की अनुकम्पा से सम्पन्न हुई है। अतः उनके चरण
कमलों में समर्पित करता हूँ ।
श्रीरामनावमी काशी गुरुवार २१ अप्रैल ८३,
इन्द्रदेव त्रिपाठी
१. एकाकी नैषधः प्राप्तः कदाचित् कलिनाशनः ।
ऋतुपर्णस्य नगरीं राजानमिदमब्रवीत् ॥
अश्वानां वाहने राजन् पृथिव्यां नास्ति मत्समः ।
अर्थज्ञानाय चैवाहं द्रष्टव्यो नैषधेन च ।
अन्नसंस्कारमपि च जानामि पिशितस्य च ॥ पा० द० प्र० १।१-३
विषय सूची
पृष्ठ सं०
प्रथम प्रकरण
ग्रन्थोपत्रम १-७२
ग्रन्थ प्रारम्भ करने का उपक्रम १
पाँच प्रकार के भोजन के भेद १
नल तथा राजा-ऋतुपर्ण का सम्बाद ३
इन्द्रादि लोकपालों के द्वारा दिये वरों का निरूपण ४
राजा नल के द्वारा स्वनिर्मित ग्रन्थ के विषय का वर्णन ४
रसोइया का लक्षण ५
परोसने वाले का लक्षण तथा विधि ५
ग्रन्थ के उपक्रम विषय ६
अन्न की प्रशंसा ७
अन्न सम्बन्धी दोषों का विवेचन ७
अन्न में आठ दोषों का उत्पत्ति निरूपण ७
अन्नगतदोषविचार का प्रयोजन ८
अमृत अन्न का लक्षण तथा दोष ८
पैच्छिल अन्न का गुण तथा दोष ९
अशुचि (अपवित्र) अन्न का लक्षण तथा दोष ९
क्वथितान्न का लक्षण तथा दोष ९
शुष्क-अन्न का लक्षण तथा दोष ९
दग्धान्न के लक्षण तथा दोष १०
विरूपान्न का लक्षण तथा दोष १०
विपरीत ऋतुज-अन्न के लक्षण तथा दोष १०
राजा के लिये निर्दोष अन्न देने का विधान १०
अन्न (भात) बनाने की विधि तथा गुण ११
मांसग्रहण करने का नियम ११
उत्तक्राणोदक बनाने की विधि १२
( १० )
उल्काणोदक शब्द की व्युत्पत्ति १२
सामान्य मांसौदन ( पुलाव ) बनाने के विधि १३
मांसौदन ( पुलाव ) के गुण १३
तहरी बनाने की विधि तथा गुण १४
चित्रपाक सम्बन्धी भक्तभेद का निरूपण १५
लावुक ( लावापक्षी ) मांसौदन बनाने की विधि १५
लावुक मांसौदन का गुण १६
कुक्कुट ( मुर्गा ) मांस तैलोदन बनाने की विधि १६
कुक्कुट मांसतैलोदन के गुण १६
सूक्ष्म मांसौदन बनाने की विधि तथा गुण १७
प्रश्नोत्तर के रूप में अन्नकी विषाक्तता का निराकरण १७
नल कथित अन्योन्य द्रव्यसंसर्गज विष का निरूपण १८
संसर्गज विष का निराकरणपूर्वक अमृत स्वरूप का निरूपण १८
स्वकृत पाक की प्रशंसा १९
सूप ( दाल ) बनाने की विधि १९
दाल के गुण २०
विशेष प्रकार का दाल तैयार करने का प्रकार २०
विशेष प्रकार से दाल पकाने की विधि २१
विशिष्ट परिपक्व दाल के गुण २१
अन्य प्रकार का दाल बनाने की विधि तथा गुण २१
सूप ( दाल ) की प्रशंसा २२
तेमन तक्र ( मट्ठा ) बनाने की विधि तथा गुण २३
खल तक्र बनाने की विधि तथा गुण २३
त्रिकटू खल बनाने की विधि तथा गुण २४
शुद्ध तेमन बनाने की विधि तथा गुण २४
कैटर्य खल बनाने की विधि तथा गुण २४
विशिष्ट 'खल' बनाने की विधि तथा गुण २५
सफेद कुर्थी का रस बनाने की विधि २५
कृष्णकुर्थी का रस बनाने की विधि तथा गुण २६
निर्मितखलपदार्थ की प्रशंसा २६
नवीन गाय का मक्खन बनाने की विधि तथा गुण २७
( ११ )
भैंस के दही का नवनीत बनाने की विधि तथा गुण २७
पुराण नवनीत के दोष २७
गोघृत निर्माण विधि तथा गुण २८
कुलथी, उड़द आदि शिम्बीधान्यों की विशिष्टपाकनिर्माणविधि तथा गुण २९
केला का शाक बनाने की विधि तथा गुण ३०
कदली स्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक बनने की विधि तथा गुण ३२
वृन्ताक ( बैंगन ) का शाक बनाने की विधि ३३
बैंगन ( गोल बैंगन ) का दूसरे प्रकार से शाक बनाने की विधि तथा गुण ३४
विशिष्ट प्रकार से बृहतीफलचित्रपाक बनाने की विधि तथा गुण ३४
अन्य प्रकार से कटहल का शाक बनाने की विधि ३६
कटहल का मीठा पाक बनाने का प्रकार तथा गुण ३७
निष्पाव फलयुक्त कटहलफल का पाक निर्माणप्रकार तथा गुण ३७
अलसन्दी फलपाकनिर्माण-विधि तथा गुण ३८
क्षुद्रदन्तीफलपाक बनाने की विधि तथा गुण ३८
कुर्पाटक ( कुर्पासिक ) फल पाक बनाने का प्रकार तथा गुण ३९
रक्तक्षुद्रबृहती ( लघुकण्टकारी ) फल पाक बनाने का प्रकार तथा गुण ३९
लाल क्षुद्र बृहतीफल का अन्य प्रकार से पाक बनाने की विधि तथा गुण ४०
रक्त क्षुद्र बृहतीफल के पाक का गुण ४०
कटुकी-फल-पाक बनाने की विधि तथा गुण ४१
बाल एरण्डफल के पाक की निर्माण विधि तथा गुण ४१
सहिजनफल की पाकनिर्माणविधि तथा गुण ४१
अगस्त्य फल पाक बनाने की विधि तथा गुण ४२
हुँकारफल तथा विरूपकफलपाक बनाने की विधि तथा गुण ४३
गूलरफल के पाक-निर्माण की विधि तथा गुण ४३
गूलर का बालफलपाक बनाने की विधि तथा गुण ४४
कुष्माण्ड फलपाक निर्माणविधि तथा गुण ४४
भंटवासयुक्त कुष्माण्ड फलपाक बनाने की विधि तथा गुण ४५
तुम्बी ( लौकी ) फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ४५
ककड़ी फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ४५
सूरनकन्दपाक की निर्माण-विधि तथा गुण ४६
वनसूरन कन्द का पाक बनाने की विधि तथा गुण ४६
कमलकन्द ( भिसौंडा ) का पाक बनाने की विधि तथा गुण ४७
( १२ )
मूलककन्द का पाक बनाने की विधि तथा गुण ४७
चक्रवर्त्त ( वथुआ ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ४७
दूसरे प्रकार से बथुआ का शाक बनाने की विधि तथा गुण ४८
नवीन वथुआ का शाक बनाने की विधि तथा गुण ४९
चुल्ली शाक बनाने की विधि तथा गुण ४९
लता चुल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण ४९
महाचुल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण ४९
शिलाछिल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५०
वाष्प शाक ( मारिष - माछीशाक ) बनाने की विधि तथा गुण ५०
अन्य ग्रन्थानुसार वाष्प ( मर्छा ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५१
धना के पत्ते का शाक बनाने की विधि गुण ५१
तण्डुलीय ( चौराई ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५२
महावाष्प ( महामार्च्छा ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५२
रक्तमर्च्छा का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५२
उपोदकी ( पोई ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५२
चित्रपाक में कड़वी कद्दू फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५२
तिक्तरोई के फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५३
तिक्तपटोलफल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ५४
करैली के पत्ते का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५४
जीवन्ती पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ५५
मुण्डक फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ५६
कारवल्ली ( करैला ) फल का पाक ( कलौंजी ) बनाने की विधि
तथा गुण ५८
अन्य ग्रन्थ के अनुसार करैला का पाक बनाने की विधि ५९
करैला फल का पाक बनाने की दूसरी विधि ६०
कोशातकी ( नेतुआ ) के फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ६१
बालकोशातकीफल ( बाल नेतुआ ) के फल का गुण ६१
छोटा तथा बड़ा नेतुआ के फल का गुण ६१
'परवल के फलका शाक बनाने की विधि तथा गुण ६२
बिम्ब फल ( कुन्दरू फल ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६२
कोकान्दोल फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ६३
( १३ )
कलिंग ( बहेरा ) फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण ६३
कुवेराक्षि ( करञ्ज ) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६४
पुनर्नवा के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६४
अलर्क ( मन्दार ) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६५
कुमारी ( घी कुँआर ) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६५
गुडूची के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६६
नीम के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६६
अर्क ( मदार विशेष ) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६७
पाटली ( पाढ़ल ) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६७
वटपत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६८
सुकुण्डली पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६८
सेमर के फूल तथा पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६८
इक्ष्वालिकाग्र ( कास का अग्रभाग ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६९
अक्षीव ( महानिम्ब ) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६९
शिला ( नील दूर्वा ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६९
आकली पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ६९
धत्तूर पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ७०
पद्म ( कमल ) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ७०
किंशुक ( ढाक ) के पत्तों के शाक बनाने की विधि तथा गुण ७०
वन सहिजन के पत्तों के शाक बनाने की विधि तथा गुण ७१
कुरण्ट ( कट सरैया ) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण ७१
प्याज का शाक बनाने की विधि तथा गुण ७१
सैकस का शाक बनाने की विध तथा गुण ७१
वासा ( अडूसा ) के पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण ७२
सूदराज पद की प्राप्ति ७२
पाक प्रकरण का उपसंहार ७२
द्वितीय प्रकरण
ऋतुधर्म निरूपण ७३-७९
राजा ऋतुपर्ण का प्रश्न ७३
राजा ऋतुपर्ण के प्रश्न का उत्तर ७३
( १४ )
ऋतुओं के प्रकार का विचार ७४
प्रतिदिन के ऋतुओं के विभागक्रम का निरूपण ७५
बसन्तादि ऋतुओं में पथ्य तथा उनके गुण ७६
ऋतुओं के सन्धिधर्म का निरूपण ७६
ऋतु के अनुसार मांस सेवन के योग्य जन्तु ७७
बसन्त में उपभोग करने योग्य मांस ७७
ग्रीष्म में उपभोग करने योग्य मांस ७७
वर्षा ऋतु में उपभोग करने योग्य मांस ७७
शरद ऋतु में उपभोग योग्य मांस ७८
हेमन्त ऋतु में उपभोग योग्य मांस ७८
शिशिर ऋतु में उपभोग योग्य मांस ७८
पाचक की प्रशंसा ७८
तृतीय प्रकरण
भक्ष्य प्रकार ८०-८२
विभिन्न भक्ष्यपदार्थों में भक्ष्यराजनिर्माण-प्रकार ८०
भक्ष्यराज के गुण ८१
अन्य प्रकार का भक्ष्य बनाने की विधि तथा गुण ८१
भक्ष्य पदार्थ विषयक उपसंहार ८२
चतुर्थ प्रकरण
पायस प्रकार ८३-८७
विचित्र लसुन पायस बनाने की विधि तथा गुण ८३
गेहूँ का पायस बनाने की विधि तथा गुण ८५
फलपुष्पपानक बनाने की विधि तथा गुण ८६
उपसंहार ८७
पञ्चम प्रकरण
पानक प्रकार ८८-९१
पानक का भेद निरूपण ८८
विचित्र पानक बनाने की विधि तथा गुण ८८
( १५ )
राजा ऋतुपर्ण का पाक पात्र विषयक प्रश्न ९१
षष्ठ प्रकरण
विवधान्नयूषपाकनिर्माण ९२-९५
शाल्यन्न का यूष ( यूषामृत ) बनाने की विधि तथा गुण ९२
राजशाल्यन्न यूष बनाने की विधि तथा गुण ९४
यूषपाक का उपसंहार ९५
सप्तम प्रकरण
घृतान्नपाकप्रकरण ९६-९९
घृतान्न पाक बनाने की विधि तथ गुण ९६
प्रकारान्तर से घृतान्न बनाने की विधि तथा गुण ९७
इमली फल के रस से मिश्रित शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण ९७
कैटर्य कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण ९८
सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण ९८
दधिमिश्रित शाल्यन्न का प्रकार तथा गुण ९९
घृतशाल्यन्न प्रकरण का उपसंहार ९९
अष्टम प्रकरण
लेह्यप्रकरण १००-१०१
आम आदि फलों का लेह्य ( चटनी ) बनाने का प्रकार तथा गुण १००
लेह्य प्रकरण की प्रशस्ति एवं उपसंहार १०१
नवम प्रकरण
शैत्यजलनिर्माणप्रकरण १०२-१०८
शीतल जल बनाने का प्रकार तथा गुण १०२
राजा के ऊषर क्षेत्र के जल को स्वादिष्ट बनाने के सम्बन्ध में प्रश्न १०३
नल के द्वारा ऊषर जल स्वादिष्ट बनाने का प्रकार निरूपण १०४
पुष्परहित देश तथा काल में जल सुवासित करने की विधि १०६
जल को शीतल करने के सम्बन्ध में वादी तथा प्रतिवादी का कथन १०७
जल शीतल करनेवाले प्रकरण का उपसंहार १०८
( १६ )
दशम प्रकण
क्षीरादिपाकनिरूपण १०९-१११
क्षीरपाक बनाने का प्रकार १०९
क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण १०९
अन्य प्रकार के क्षीर पाक बनाने के विधि तथा गुण १११
क्षीरपाक के गुण १११
एकादश प्रकरण
दधिभेदप्रकरण १३१-११४
दही बनाने की विधि तथा गुण ११३
॥ श्रीः ॥
अथ नलविरचितं
पाकदर्पणम्
ग्रन्थोप्रक्रमः
एकाकी नैषधः प्राप्य कदाचित् कलिनाशनः ।
ऋतुपर्णस्य नगरीं राजानमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
ग्रन्थ प्रारम्भ करने का उपक्रम— किसी समय झगड़ा को दूर करने के
अभिप्राय से नैषध (निषध देश का राजा नल) अकेले ही ऋतुपर्ण की नगरी में
जाकर वहाँ के राज से इस प्रकार बोले ॥ १ ॥
स्वदेशं हि परित्यज्य बाहुकाख्योऽहमागतः ।
अश्वानां वाहने राजन् पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥ २ ॥
हे राजन् ! मेरा नाम बाहुक है और मैं अपना देश छोड़ कर आया हूँ ।
इस पृथिवी पर घोड़ों को हाँकने (घोड़सवारी करने) में मेरे समान कोई
नहीं है ॥ २ ॥
अर्थज्ञानस्य चैवाहं द्रष्टव्यो नैपुणेन च ।
अन्नसंस्कारमपि च जानामि पिशितस्य च ॥ ३ ॥
हे राजन् ! अश्व सम्बन्धी अर्थज्ञान में भी मेरे समान कोई नहीं है । अच्छी
तरह आप मुझे देख लें । अर्थात् परीक्षा कर लें । मैं अन्नसंस्कार (विभिन्न प्रकार
के भोजननिर्माण-प्रकार) को भी जानता हूँ और मांसमिश्रित अन्नसंस्कार (मांस-
मिश्रित ओदन निर्माण प्रकार) को भी जानता हूँ ॥ ३ ॥
पञ्चविधभोजनस्य भेदाः
भक्ष्यं भोज्यं तथा लेह्यञ्चोष्यं पेयं पयोगतम् ।
भेदं रसानां षण्णाञ्च शुद्धसंस्कारभेदतः ॥ ४ ॥
पाँच प्रकार के भोजन का भेद— भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य तथा दुग्धगत
पेय ये पाँच प्रकार के भोजन शुद्धसंस्कार भेद से छः रसों का भेद होता है ॥ ४ ॥
पाकदर्पणम् (पृष्ठ २)
पाकदर्पणम्
सर्वेषां व्यञ्जनानाञ्च संस्कारं लवणादिभिः ।
एभिर्विना च तोयैश्च चित्रपाकं रसावहम् ॥ ५ ॥
सभी व्यञ्जनों का संस्कार लवणादिरसद्रव्यों से होता है। इन नवों के
बिना तथा जल से भी पाक होता है और चित्रपाक उत्तम रस लाने वाला
होता है ॥ ५ ॥
यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन् यच्चान्यदपि दुर्लभम् ।
मया कृतरसः किञ्च सुधाताभ्यश्च दुर्लभः ॥ ६ ॥
इस संसार में जितने भी शिल्पी कर्म हैं और भी जो कुछ दुर्लभ हैं तथा
पाकसम्वन्धित शिल्पकर्म हैं उन रसपाककार्य को भी मैंने बनाया है। वह कार्य
अच्छे धातुओं (पदार्थों) से भी बनना दुर्लभ है ॥ ६ ॥
भुज्यते येन यत्नेन तस्यारोग्यं भवेद्ध्रुवम् ।
वातजं पित्तजं रोगं श्लेष्मजं हन्ति सर्वदा ॥
सकृन्निषेवणेनैव त्रिपुरं त्र्यम्बको यथा ॥ ७ ॥
मेरे द्वारा बनाये हुए सरस पाक को जो व्यक्ति प्रयत्न पूर्वक खाता है
उसको अवश्य ही आरोग्य प्राप्त होता है। एक ही बार सेवन करने से वातज,
पित्तज तथा कफज रोगों को हमेशा नष्ट करता है। जैसे शंकर जी त्रिपुर नामक
राक्षस को एक ही बार में नष्ट कर दिये थे ॥ ७ ॥
अजीर्णदोषादुत्पन्नं ज्वरं माहेश्वरादिकम् ।
हृद्रोगं राजयक्ष्मादिरोगं शूलादिकं ततः ॥ ८ ॥
भगन्दरातिसारञ्च सन्निपातादिकं तथा ।
इत्थमेवादिकं सर्वं रोगजालं निहन्ति सः ॥ ९ ॥
यह रसपाक अजीर्ण आदि दोष से उत्पन्न माहेश्वर¹आदि ज्वर, हृदयरोग,
राजयक्ष्मा, श्वास, कास आदि रोग, शूल, उदरशूल, अंगशूल आदि रोग,
भगन्दर, अतिसार तथा सान्निपातिक रोग, इसी प्रकार के सभी रोग समूहों को
नष्ट करता है ॥ ८-९ ॥
सर्वं यतिष्ये तत्कर्तुं ऋतुपर्ण ! भरस्व माम् ।
इत्युक्त्वां वसतीं चक्रे ऋतुपर्णस्य वेश्मनि ॥ १० ॥
हे राजा ऋतुपर्ण ! पूर्वोक्त सभी प्रकार के कर्मों को करने का मैं प्रयत्न
१. दक्षापमानसंक्रुद्धरुद्रनिःश्वाससम्भवः ।
ज्वरोऽष्टधा पृथग्द्वन्द्वसंघातागन्तुजः स्मृतः ॥
(मा० नि० ज्व० नि० १)
नलविरचितम् (पृष्ठ ३)
नलविरचितम् ३
करूँगा, आप मेरा भरण-पोषण करें। यह कहकर नल राजा ऋतुपर्ण के घर में
रहने लगे ॥ १० ॥
नल-ऋतुपर्णयोः सम्वादः
ऋतुपर्ण उवाच
तं कदाचित्समाहूय स राजा राजसत्तमः ।
एताः कलाः कुतो लब्धास्त्वमस्माकं वद प्रियम् ॥ ११ ॥
नल तथा राजा-ऋतुपर्ण का सम्वाद—किसी समय राजाओं में श्रेष्ठ राजा
ऋतुपर्ण नल को बुलाकर पूछे कि हे नल तुम इन कलाओं को कहाँ से प्राप्त किये
हो, इस प्रिय कथा को हमसे कहो ॥ ११ ॥
नल उवाच
श्रुत्वा तद्वचनं साधुस्तद्वक्तुमुपचक्रमे ।
शृणु राजेन्द्र! विद्याया निदानं मम तत्त्वतः ॥ १२ ॥
राजा के वचन को सुनकर नल बोले—हे राजन् ! मेरे इन विद्याओं को प्राप्त
करने का आदि कारण विधिवत् सुनें ॥ १२ ॥
स्वयम्बरार्थं वैदर्भ्याः समायाताः सुरेश्वराः ।
अहमप्यागतस्तत्र दृष्ट्वा दृष्टश्च तैः पथि ॥ १३ ॥
हे राजन् ! वैदर्भी (दमयन्ती) के स्वयंवर के लिये सुरेश्वर (इन्द्रादि)
देवता आये। वहाँ पर वे लोग मार्ग में ही सौभाग्यवश मुझे देख लिये ॥ १३ ॥
मामूचुस्तत्र वै देवा वञ्चनार्थमिदं वचः ।
अस्मान् वै पुरुषव्याघ्र यथा भैमी वरिष्यति ॥ १४ ॥
तथा कुरु वतेत्युक्ते स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रुवन् ।
वे इन्द्रादिक देवता वहाँ पर ठगने के लिये मुझसे कहे कि हे पुरुषों में श्रेष्ठ
नल ! दमयन्ती हम लोगों को ही जैसे वरण करे वैसा करें। 'करूँगा' ऐसा कहने
पर 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा बोले ॥ १४ ॥
दूतरूपं समाभृत्य मामकार्थी यथार्थतः ॥
ते नैषधं समालोक्य वरान् ददुरनुत्तमान् ॥ १५ ॥
इन्द्रादि देवगण मेरे स्वीकार करने पर दूत के रूप में यथार्थ में मुझे ही
खोजनेवाले मुझ नल को देखकर उत्तम वरों को दिये ॥ १५ ॥
इन्द्रादि लोकपालप्रदत्तवरनिरूपणम्
अदृश्यसिद्धिं प्रथममिन्द्रस्तुष्टोऽददात्स्वयम् ।
३ पा.द.
पाकदर्पणम्
ततो हविर्भुजः प्रादादग्निसिद्धिं निरिन्धनीम् ॥ १६ ॥
ततोऽन्नग्ससिद्धिंश्च सूर्य्यपुत्रश्च लौकिकीम्।
वरुणो जलसिद्धिञ्च विना यत्नेन सत्तम ॥ १७ ॥
इति विद्याः सुरास्ते तु दत्त्वा निजपदं ययुः ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा त विस्मितोऽब्रवीत ॥ १८ ॥
इन्द्रादि लोकपालों के द्वारा दिये वरों का निरूपण—हे राजन् ! सबसे
पहले इन्द्र संतुष्ट होकर स्वयं अदृश्यसिद्धि (अदृश्य विद्या) को दिये। इसके
बाद अग्निदेव बिना लकड़ी के ही अग्नि उत्पन्न कर देने की शक्ति (अग्निसिद्धि)
को दिये। तत्पश्चात् सूर्य पुत्र (यमराज) लौकिक अन्नसिद्धि (अनेक प्रकार के
अन्न-व्यञ्जनादि को बनाने की शक्ति) को दिये। इसके बाद वरुण बिना प्रयत्न के
ही जल उत्पन्न करने की शक्ति (जलसिद्धि) को दिये। इसप्रकार वे देवगण इन
विद्याओं को देकर अपने धाम को चले गये। इस प्रकार उनके वाक्यों को सुनकर
राजा ऋतुपर्ण आश्चर्यित होकर नल से बोले ॥ १६-१८ ॥
इयं त्वलौकिकी विद्या त्वद्गता नरदुर्लभा ।
अतो नरहितार्थाय निदर्शनमुखेन ताम् ॥ १९ ॥
दर्शनं कुरु तत्त्वेन दृष्टेः कौतूहलं हि नः ।
इत्युक्तवति राजेन्द्र नैषधः पुनरब्रवीत् ॥ २० ॥
तुम्हारे अन्दर मनुष्यों के लिये दुर्लभ यह अलौकिकी विद्या प्राप्त हुई है।
अतः इस विद्या को मनुष्यों के हित के लिये प्रत्यक्ष रूप से विधिपूर्वक प्रदर्शन
कीजिये। हम लोगों को वह विद्या देखने के लिए बहुत बड़ी उत्कण्ठा है। इस
प्रकार राजा ऋतुपर्ण के कहने पर राजा नल फिर बोले ॥ १९-२० ॥
नलेन स्वनिर्मितग्रन्थविषयवर्णनम्
अस्मिन्नर्थे मयाऽकारि ग्रन्थो लोकहिताय च ।
लोकपालप्रसादेन पाकदर्पणनामतः ॥ २१ ॥
तस्यावलोकनेनैव दृश्यन्ते विविधाः क्रियाः ।
सूदस्य लक्षणं तावद् वक्ष्ये संक्षेपतः प्रभो ॥ २२ ॥
राजा नल के द्वारा स्वनिर्मित ग्रन्थ के विषय का वर्णन—राजा ऋतुपर्ण के
वाक्य को सुनकर राजा नल ने कहा कि अन्नसिद्धि के विषय में मैंने सभी लोगों
के कल्याणार्थ लोकपालों के प्रसाद से पाकदर्पण नामक ग्रन्थ बनाया है। उस ग्रन्थ
को देखने से ही सभी अनेक प्रकार के पाकनिर्माण सम्बन्धी क्रियाओं का ज्ञान हो
जाता है, हे राजन् ! सर्वप्रथम रसोइया का लक्षण संक्षेप में कहता हूँ ॥ २१-२२ ॥
नलविरचितम्
सूदस्य लक्षणम्
स्वदेशसम्भवः प्राज्ञः सर्वलक्षणलक्षितः ।
सदाचारसमायुक्तो विशिष्टकुलसम्भवः ॥ २३ ॥
शान्तो दान्तो दानशीलो राजपूज्यो शुचिस्मितः ।
स्वदारनिरतः शुद्धः परदारविवर्जितः ॥ २४ ॥
मितभाषी सदा दाता दयालुश्च सुभाषितः ।
धातुज्ञो देशकालज्ञो वयोऽवस्थादिविद्बुधः ॥ २५ ॥
रसोइया का लक्षण—रसोइया को निम्न लक्षणों से युक्त होना चाहिए।
जिस देश में काम करता हो वहीं का उत्पन्न हो, विद्वान् हो, सभी अच्छे लक्षणों
से युक्त हो, सदाचारी हो, अच्छे विशिष्ट कुल में उत्पन्न हो, शान्त स्वभाव का
हो, इन्द्रियों को वश में किया हो, दान प्रवृत्ति वाला हो, राज्य परिवार का
विश्वासपात्र हो, पवित्र हो, अपनी धर्मपत्नी से ही सम्बन्ध रखने वाला हो, शुद्ध
हो, परायी स्त्री से सम्बन्ध न रखता हो, थोड़ा बोलने वाला हो, हमेशा दान देने
वाला हो, दयालु हो, मृदुभाषी हो, धातुओं (अनेक प्रकार के लौह, ताम्र आदि
धातुओं) की जानकारी रखनेवाला हो, देश-विदेश तथा कालविशेष की जानकारी
रखने वाला हो, आयु एवं अवस्था आदि का जानकार हो ॥ २३-२५ ॥
परिवेशकस्य लक्षणं विधिश्च
प्रक्षाल्य चरणौ हस्तौ कृतशौचविधिस्तदा ।
सम्पूर्णकामो निष्ठात्मा राजभोजनकालवित् ॥ २६ ॥
राज्ञश्चावसरं ज्ञात्वा पाकादींश्च प्रदापयेत् ।
यदा पथ्यं भवेद्राज्ञः क्रमेण प्रक्षिपेच्च तान् ॥ २७ ॥
परोसने वाले का लक्षण तथा विधि—रसोइया सभी शौच क्रिया (उठने
से लेकर पूजन पर्यन्त शौच विधि) को सम्पन्न कर, हाथ-पैर को अच्छी तरह
धोकर, संतुष्ट मन से निष्ठावान् होकर राजा के भोजन काल को जानने वाला,
राजा के भोजन समय को जानकर भोजन सामग्री को राजा के सामने रखे।
जब जो पदार्थ राजा के लिए हितकर हो उन पदार्थों को भोजन¹परिवेशण क्रम से
रखे ॥ २६-२७ ॥
ग्रन्थस्योपक्रमणिका
ओदनस्य प्रभेदोऽत्र प्रथमं कथ्यते मया ।
द्वितीयं सूपभेदश्च सर्पिषश्च तृतीयकम् ॥ २८ ॥
१. विविध भोजन-सामग्री रखने का क्रम आगे के श्लोक में देखें।
६ पाकदर्पणम्
व्यञ्जनस्य च भेदश्च चतुर्थः स प्रपञ्चकः ।
पञ्चमो मांसशाकोऽत्र सप्रभेदश्च कथ्यते ॥ २९ ॥
ग्रन्थ के उपक्रम विषय--सर्वप्रथम ओदन (भात, रोटी, विविध अन्न आदि
के विविध भेदों को कहेंगे । दूसरा सूप (दाल) के भेद, तीसरा घी के भेद,
चौथा सप्रपञ्च (विधिविधान पूर्वक) व्यंजनों के भेद तथा पाँचवां मांस एवं
शाक आदि के भेदों को कहेंगे ॥ २८-२९ ॥
षष्ठोऽत्र भक्ष्यभेदश्च सप्तमः पायसस्य च ।
रसायनश्चाष्टमोऽत्र नवमः पानभेदतः ॥ ३० ॥
दशमं यूषभेदश्च घृताद्यन्नप्रभेदकः ।
एकादशश्च लेह्यस्य भेदो द्वादशकस्तथा ॥ ३१ ॥
त्रयोदशन्तु पानीयं क्षीरभेदश्चतुर्दशः ।
दधिभेदः पञ्चदशः षोडशः तक्रभेदकः ॥ ३२ ॥
छठवाँ भक्ष्य प्रकार के भेद, सातवाँ पायस (खीर) के भेद, आठवाँ रसायन
भेद, नवाँ पानक भेद, दसवाँ यूष का भेद, ग्यारहवाँ घृतपक्वादि अन्न के भेद,
बारहवाँ लेह्य पदार्थों का भेद, तेरहवाँ विविध प्रकार के जल का भेद, चौदहवाँ
दूध का भेद, पन्द्रहवाँ दही का भेद तथा सोलहवाँ तक्र का भेद कहा गया
है ॥ ३०-३२ ॥
षोडशो मुख्यभेदश्च दृष्टान्तेन प्रदर्शितः ।
मृग्योऽवान्तरभेदश्च तत्र तत्र महद्धिया ॥ ३३ ॥
प्रधान सोलह भेदों को दृष्टान्त के साथ दिखाया गया है । उसके सम्बन्ध में
अपनी विशद बुद्धि के अनुसार अवान्तर भेदों को भी विज्ञजन खोज करें ॥ ३३ ॥
तत्र तत्र यथायोग्यो वादस्तु कथितो मया ।
पानीयनामदेशे हि पानीयस्य समुद्भवः ॥ ३४ ॥
पुनश्चित्रं च कथितं पायसं चाम्लसम्भवम् ।
एवमादीनि चित्राणि कार्याणि विविधानि च ॥ ३५ ॥
पाकोत्थितान्यपाकानि कर्तव्यानि मनीषिभिः ।
किमत्र बहुनोक्तेन युक्तं चैकं शृणु प्रभो ! ॥ ३६ ॥
पूर्वोक्त सोलह प्रकार के पाकों के सम्बन्ध में मैंने यथायोग्य विवेचन किया
है । पानीय नामक देश में ही पानी का उद्भव बताया गया है। इसके बाद चित्र-
पाक का वर्णन है और आम्लवस्तु से पायस निर्माण का वर्णन है। इस तरह अनेक
नलविरचितम् ७
प्रकार के चित्र-विचित्र विधियों का वर्णन किया गया है। विद्वानों को विना
पकाये ही पाक बनाना चाहिए। इस सम्बन्ध में अधिक कहना भी ठीक नहीं है।
हे राजन् ! वहाँ पर एक उपयोगी विषय को सुनें ॥ ३४-३६ ॥
यस्मिन् काले देशकाले दयाभावो हि भूमिप ! ।
तथा तस्मिन्नुपायेन कथितस्तस्य सम्भवः ॥ ३७ ॥
हे राजन् ! जिस समग्र तथा जिस काल में दयाभाव (दयालुता) रहता है,
उस समय तथा उस काल में उसका उत्पादन उसी प्रकार के उपायों से कहा
गया है ॥ ३७ ॥
अन्नस्य प्राशस्त्यनिरूपणम्
सर्वेषां प्राणिनां प्राणमन्नं प्रथममुच्यते ।
ब्रह्मरूपमिदं सम्यक् त्रिषष्टिरसरूपकम् ॥ ३८ ॥
दोषाष्टकेन रहितमाहरेदन्नमुत्तमम् ।
अन्न की प्रशंसा—सभी प्राणियों का प्राण सर्व प्रथम अन्न ही कहा गया
है, अच्छी तरह तिरसठ रस वाला यह अन्न ब्रह्म स्वरूप है अतः आठ दोषों से
रहित उत्तम अन्न को ग्रहण करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अन्नगतदोषाणां विवेचनम्
दोषस्वरूपमज्ञात्वा तद्राहित्यं कथं लभेत् ॥ ३९ ॥
अनिन्द्यत्वाददोषत्वाद् दोषो नास्ति तदाश्रयः ।
अतोऽष्टरूपो दोषो हि नास्त्यत्र श्रुतिमानतः ॥ ४० ॥
अन्न सम्बन्धी दोषों का विवेचन—अन्न सम्बन्धी दोषों की जानकारी के
बिना अन्नगत दोषों को कैसे दूर किया जा सकता है। क्योंकि अन्न अनिन्द्य एवं
दोषरहित है । अतः उसमें दोष नहीं रह सकते, साथ ही शास्त्रनिर्देश के अनुसार
उसमें आठ दोष नहीं हैं ॥ ३९-४० ॥
अन्नेऽष्टदोषसम्भव निरूपणम्
विद्यते ह्यष्टदोषो हि प्रत्यक्षेण प्रमादतः ॥
अन्न में आठ दोषों का उत्पत्ति-निरूपण—अन्न में प्रमाद (असावधानी)-
वश प्रत्यक्ष कारणों से अन्न में आठ दोष उत्पन्न होते हैं ॥ ४०½ ॥
के ते दोषाः सदाविष्टाः प्रत्यक्षेण बलीयसा ॥ ४१ ॥
वे कौनसे दोष हैं जो बलवान् प्रत्यक्ष कारणों से अन्न में उत्पन्न होते हैं ॥४१॥
[पृष्ठ ८]
पाकदर्पणम्
इति प्रश्नकृते जातमुत्तरं ज्येष्ठमानतः ।
ये ते तदाश्रिताः दोषा अस्रुतः पिच्छिलोऽशुचिः ॥ ४२ ॥
क्वथितश्शुष्कतो दग्धो विरूपो नर्तुजस्तथा ।
स्वरूपलक्षणं चैषां कथ्यते क्रमशो गुणम् ॥ ४३ ॥
अन्नगत दोषों को पूछने पर उत्तम प्रमाणों के द्वारा उत्तर दिये। प्रमादादि-
वश अन्न में रहनेवाले निम्नलिखित दोष हैं। आस्रुत (अन्नगत मांड न निकालने
से खट्टा हुआ अन्न), पिच्छिल, अशुचि, क्वथित, शुष्क, दग्ध, विरूप तथा विपरीत
ऋतुओं में उत्पन्न — ये अन्नगत आठ दोष होते हैं; । इन दोषों के स्वरूप, लक्षण
तथा गुणों को आगे कहेंगे ॥ ४२-४३ ॥
अन्नगतदोषविचारस्य प्रयोजननिरूपणम्
किं तस्य हासरूपस्य विचारस्य प्रयोजनम् ।
पयस्त्वात् त्यज्यते सद्भिर्द्रवत्वे तु विशारदैः ॥ ४४ ॥
इदं सदोषं निर्दोषमिदं चेति विवेकितुम् ।
विकारार्थं न दोषेण युक्तद्रव्यम्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥
किन्त्वदुष्टवशाद्कर्त्तु रेतदेव प्रयोजनम् ।
अन्नगतदोषविचार का प्रयोजन — अन्न सम्बन्धी इन तुच्छ विचारों का
क्या प्रयोजन है ? अच्छे पण्डित लोग द्रव में शक्ति होने पर भी छोड़ देते हैं।
यह विचार करने के लिए कि यह दोषयुक्त है या दोषरहित है। दोष से युक्त द्रव
विकारोत्पादक न हो जाय इसके लिए प्रयत्नपूर्वक दोषरहित बनाना ही दोष के
विचार का प्रयोजन है ॥ ४४-४५॥
अन्नस्य नास्ति वा दोषा न भवन्ति कदाचन ॥ ४६ ॥
ते तस्य सम्भवन्त्येव पाचकस्य प्रमादतः ।
क्रमेण वक्ष्ये दोषाणामष्टानां लक्षणं गुणम् ॥ ४७ ॥
अन्न में न दोष हैं और न होते हैं। उसमें वे दोष रसोइया के प्रमाद के
कारण हो सकते हैं। प्रमाद से होनेवाले उन अन्नगत आठों दोषों के लक्षण तथा
गुणों को आगे कहेंगे ॥ ४६-४७ ॥
अस्रुतान्नलक्षणं दोषाश्च
अश्रावितयवागुं यदन्नमस्रुतमुच्यते ।
तदन्नं येन भुक्तं चेत् तस्य व्याधिकरणं भवेत् ॥ ४८ ॥
अस्रुत अन्न का लक्षण तथा दोष — जो अन्न मांड न निकालने से अम्ल हो
[पृष्ठ ९]
नलविरचितम्
जाता है उसे अस्रुतान्न कहते है । जो उस अन्न को खाता है उसके लिए वह अन्न
रोगकारक होता है ॥ ४८ ॥
पैच्छिलान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
अन्नमाश्रयते जीर्णमतिपाकेन पैच्छिलम् ।
तद्भक्तं भुज्यते येन तं त्यजेदौदरोऽनलः ॥ ४९ ॥
पेंच्छिल अन्न का गुण तथा दोष — अन्न अधिक पकाने से पैच्छिल दोषों से
युक्त हो जाता है, जो लोग उस भात को खाते है उनको जठराग्नि छोड़ देती है।
अर्थात् उसकी जठराग्नि मन्द हो जाती है और कड़े अन्न पचाने में असमर्थ भी
हो जाती है ॥ ४९ ॥
अशुच्यन्नस्य लक्षणं दोषाश्च
कृमिकेशादिसंयुक्तं यदन्नमशुचि स्मृतम् ।
तद्भक्षणादरुचीरसना स्रवते जलम् ॥ ५० ॥
अशुचि (अपवित्र) अन्न का लक्षण तथा दोष — जो कृमि तथा केश
आदि से मिश्रित अन्न होता है उसे अशुचि अन्न कहते हैं। उस अन्न को खाने से
अरुचि (अरोचक) होती है और रसना (जिह्वा) से जल स्राव (लार)
निकलता है ॥ ५० ॥
क्वथितान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
ईषत्तण्डुलमिश्रं यत् क्वथितं परिकीर्तितम् ।
आत्मादिदोषकृत्यर्थं कायस्थं यस्य तद्भवेत् ॥ ५१ ॥
क्वथितान्न का लक्षण तथा दोष — थोड़ा तण्डुल (चावल) से मिश्रित जो
पाक होता है उसे क्वथित अन्न कहते हैं। यह अन्न जिसके शरीर में जाता है
वह शरीर में स्थित होकर आत्मा आदि में विकार उत्पन्न करता है ॥ ५१ ॥
शुष्कान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
यत्कालविरहादन्नं शुष्कं तत्परिकीर्तितम् ।
भक्षितं येन तस्यान्नं विधूमो भवति ध्रुवम् ॥ ५२ ॥
शुष्क अन्न का लक्षण तथा दोष — जो अन्न अधिक समय तक रह जाने से
शुष्क हो जाता है उसे शुष्कान्न कहते हैं । उस शुष्कान्न को जो खाता है उसको
अवश्य ही विधूम (अपचन) हो जाता है ॥ ५२ ॥
१० पाकदर्पणम्
दग्धान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
पावकस्यातियोगाद्धि दग्धं भवति चोदनम् ।
भक्षितं येन कुक्षिस्र्थं तत्कुर्याद्धातुशोषणम् ॥ ५३ ॥
दग्धान्न के लक्षण तथा दोष—तेज अग्नि के सहयोग से जो अन्न जल
जाता है उसे दग्धान्न कहते है । उस अन्न को जो खाता है उसके पेट में स्थित
होकर वह अन्न धातुओं (रस, रक्त, मांस आदि का) शोषण करता है ॥ ५३ ॥
विरूपान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
ओदनं स्याद्विरूपाख्यं पाकादक्षुण्णतण्डुलम् ।
कुक्षिस्र्थं यस्य तद्भुक्तमायुरादीन्निहन्ति च ॥ ५४ ॥
विरूपान्न का लक्षण तथा दोष—बिना अच्छी तरह कूटा-छाँटा चावल
पाक करने से विकृत रूप हो जाता है उसे विरूपान्न (विरूपौदन) कहते हैं। वह
खाया हुआ भात जिसके पेट में रहता है उसकी आयु, बल, वीर्य आदि को नष्ट
कर देता है ॥ ५४ ॥
अनर्तुजान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
अनर्तुजाभिधानादन्नं पर्युषितं भवेत् ।
निद्राशीतादिरोगः स्याद्कुक्षितस्य च तस्य वै ॥ ५५ ॥
विपरीत ऋतुज अन्न के लक्षण तथा दोष--अनर्तुज कहने से पर्युषित (ऋतु
विपरीत-बासी) अन्न होता है। जो उस अन्न को खाता है उसको निद्रा आलस्य
दौर्बल्यादि रोग होते हैं ॥ ५५ ॥
राज्ञे निर्दोषान्नप्रदानस्य विधानम्
एते चान्नाश्रिता दोषाः मया सम्यक् प्रकाशिताः ।
एभिर्दोषैर्विहीनं यदन्नं राज्ञे प्रदापयेत् ॥ ५६ ॥
राजा के लिए निर्दोष अन्न देने का विधान--पूर्वोक्त अन्नगत आठ दोष
हैं उनको मैंने अच्छी तरह बता दिया है। जो अन्न पूर्वोक्त दोषों से रहित हो उस
अन्न को राजा को खाने के लिए देना चाहिए ॥ ५६ ॥
अन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
विधानमत्र पाकस्य वक्ष्ये सर्वहिताय च ।
अखण्डतण्डुलान् क्षुष्यान् पुराणव्रीहिसम्भवान् ॥ ५७ ॥
क्षालयेत्तान् बुधः सम्यगोषदुष्णेन वारिणा ।
शुद्धोदकं पुनः स्थाल्यां पूरयेत्तत्रिभागिकम् ॥ ५८ ॥
नलविरचितम् ११
चुल्यामारोपयेत्स्थालीं पूरितां पाककोविदः ।
शीतबुद्बुदसंयुक्ते पक्वे पयसि तान् क्षिपेत् ॥ ५९ ॥
तण्डुलानां यथा मध्ये ईषत्कठिनता भवेत् ।
दर्वीपुटेन तान् सम्यगवलोड्य पुनः पुनः ॥ ६० ॥
तत्रैव तु सदा सिञ्चेत् तक्रं क्षीरं पयोऽथवा ।
तदावतार्य प्रस्थाप्य चाङ्गारेषु¹ पुनर्न्यसेत् ॥ ६१ ॥
तदन्नं सम्यगालोक्य मृदुभूतं च दापयेत् ।
इदं तण्डुलसम्भूतमायुरारोग्यवर्द्धनम् ॥ ६२ ॥
अन्न (भात) बनाने की विधि तथा गुण--यहाँ पर सभी लोगों के लिए
पाक बनाने की विधि कहता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति पुराने धान के बिना टूटे, सूखे
चावल को थोड़े गरम जल से अच्छी तरह धो कर बटलोही (भोजन-निर्माण-
पात्र) में चावल से तीन गुना शुद्ध जल भर दे। इसके बाद पाचक जलपूर्ण भोजन-
निर्माण पात्र को चूल्हा के ऊपर रक्खे । जल के थोड़े गरम हो जाने पर पूर्वोक्त
धोये हुए चावल को छोड़ दे । जब चावल में थोड़ा कड़ापन रह जाय तब कलछुल
से बार-बार अच्छी तरह चलाये और उसी में मट्ठा, दूध या जल छोड़ दे । इसके
बाद उतार कर तथा रख कर पुनः अंगार (आग) के ऊपर रखे । उस अन्न
(भात) को अच्छी तरह मुलायम देखकर खाने के लिए दे। यह चावल का भात
आयु एवं आरोग्य को बढ़ाने वाला है ॥ ५७-६२ ॥
मांसग्रहणविधिः
छागमेषशकुन्तादिप्राणिनां पलं बुधः ।
समादाय पुनस्तस्य त्वगन्त्राणि समुत्सृजेत् ॥ ६३ ॥
तेषामेकतमं मांसं क्षालयेद्वारिणा ततः ।
अस्थिभिस्सह संच्छिद्य निक्षिपेत्तस्य भाजने ॥ ६४ ॥
मांसग्रहण करने का नियम - बुद्धिमान व्यक्ति बकरी, भेड़, शकुन्त (पक्षी)
आदि प्राणियों के मांस लेकर उसके चमड़े तथा आँतों को निकाल दे। पुनः उनमें
से किसी एक का मांस लेकर जल से प्रक्षालन करे । इसके बाद उस मांस को
अस्थिसहित काटकर मांस बनाने के पात्र में रक्खे ॥ ६३-६४ ॥
१. भात को उतार कर आग के ऊपर रखने की प्रक्रिया आज भी प्रचलित
है । इससे भात में एक प्रकार का स्वाद आ जाता है और कच्चा रहने की आशंका
नहीं रहती । योग्य पाचक अब भी इस प्रक्रिया को अपनाते हैं ।
पृष्ठ १२
१२ पाकदर्पणम्
उत्क्राणोदकनिर्माणविधिः
अनापलं ततो भाण्डे तण्डुलस्योदकं शुभे ।
निधाय शुद्धमुदकं समं कृत्वा पचेत्सुधीः ॥ ६५ ॥
तप्ते पयसि तन्मासं निक्षिपेत्क्षालितं पुनः ।
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र कुम्भीकुस्तुम्बुरीं बुधः ॥ ६६ ॥
तप्ते मांसे पुनः सम्यक् शोधयेच्चिचक्रणं विना ।
शीतलञ्च पुनः कृत्वा कुसुमैरधिवासयेत् ॥ ६७ ॥
न्यसेच्च मृगनाभिश्च कर्पूरं हिमचारि च ।
मुहूर्त्तमेकं संस्थाप्य प्रसूनानि परित्यजेत् ॥ ६८ ॥
एतदुत्क्राणमुदकमाहुः सूदविशारदः ॥ ६९ ॥
उत्क्राणोदक बनाने की विधि - उत्क्राणोदक बनाने के लिये पहले शुद्ध पात्र
में चावल का जल रखकर सम भाग शुद्धजल मिलाकर बुद्धिमान रसोइया पकाये ।
जल गरम हो जाने पर पूर्वोक्त प्रक्षालित मांस को पुनः छोड़ दे । इसके बाद
उसमें कुम्भी, कुस्तुम्बुरी, (धनिया) आदि छोड़ दे । पुनः मांस के गरम हो जाने
पर चिकनापन के बिना ही छान ले । पुनः जल को शीतल कर पुष्पों से सुगन्धित
करे । पुनः उसमें कस्तूरी तथा कर्पूर मिला दे । उसमें एक घड़ी तक पुष्पों को
रखकर निकाल दे । इसको पाकशास्त्रवेत्ता उत्क्राणोदक कहते हैं ॥ ६६-७० ॥
उत्क्राणोदकशब्दस्य विवेचनम्
सर्वोदकातिक्रमणादुत्कृष्टत्वादितं पयः ।
रससर्वस्वरूपत्वादुत्क्राणमिति कथ्यते ॥ ७० ॥
उत्क्राणोदक शब्द की व्युत्पत्ति - सभी प्रकार के जल को अतिक्रमण करने
से तथा उत्कृष्ट (उत्तम) होने से और सभी रसस्वरूप होने से उत्क्राण
(उत्क्राणोदक) कहा जाता है ॥ ७१ ॥
सामान्यमांसौदननिर्माणविधिः
त्रिभागपूरितां स्थालीं तज्जलैश्च प्रमाणवित् ।
स्थापयेच्च तथा चुल्यां तप्ते पयसि वह्निना ॥ ७१ ॥
चतुर्थांशान्निक्षिपेत्सम्यक् क्षालितान् गौरतण्डुलान् ।
ईषत्पाके तु सञ्जाते सुशुभे शालितण्डुले ॥ ७२ ॥
आदाय पक्वपललमपक्वमथवामिषम् ।
तण्डुलाकारवच्छित्त्वा किञ्चित्सैन्धवमावहेत् ॥ ७३ ॥
पृष्ठ १३
नलविरचितम् १३
भर्जयित्वा पुनस्थाल्यां किञ्चिदाज्यं च निक्षिपेत् ।
जले विलीने तद्भक्तमङ्गारेषु समाविशेत् ॥ ७४ ॥
क्षीरं च नारिकेलस्य नवसर्पिस्तथैव च ।
न्यसेत्तत्रैव रम्याणि केतकीकुसुमानि च ॥ ७५ ॥
निक्षिपेत् शकलांस्तत्र पर्पटप्रमुखोद्भवान् ।
गन्धैः कर्पूरकस्तूरीसम्भवैश्चाधिवासयेत् ॥ ७६ ॥
तन्मुखं छादयेत्सम्यग्विधानेन विचक्षणः ।
लिम्पेत्तद्गन्धरक्षार्थं तद्रन्ध्र कणिकैर्ध्रुवम् ॥ ७७ ॥
आवर्त्तनं पुनः कुर्यादङ्गारेष्वेव तान् पुनः ।
यावता मृदुभावं स्यात्तावत्तत्र प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥
एवमामिषसम्भूतं दापयेदन्नमीदृशम् ॥ ७९ ॥
सामान्य मांसोदन (पुलाव) बनाने की विधि - पूर्वनिर्मित उत्क्राणोदक से
प्रमाण जाननेवाला रसोइया स्थाली का तीन भाग भर दे तथा स्थाली को चूल्ही
पर रखे । इसके बाद आग से पानी गरम हो जाने पर अच्छी तरह प्रक्षालित
चतुर्थांश सफेद चावल को छोड़ दे । उत्तम शालिचावल के थोड़ा पक जाने पर
पका मांस या अपक्व मांस लेकर तथा चावल के बराबर-बराबर काट कर थोड़ा
नमक मिला दे । पुनः स्थाली में भूनकर मिला दे तथा थोड़ा घी मिला दे । जल
के नष्ट हो जाने पर उस भात को अंगार पर रखे । इसके बाद नारियल का
जल तथा नया घी मिला दे और वहीं पर रमणीय केवड़ा के फूल को रखे ।
तदनन्तर उसमें पर्पट (पापड़) आदि के टुकड़ों को छोड़ दे और कर्पूर-कस्तूरी
आदि के गन्ध से अधिवासित (सुगन्धित) करे । बाद में बुद्धिमान् पाचक उसके
मुख को ढक दे और उसके गन्ध को सुरक्षित रखने के लिये ढकने के छेद को
आटे से बन्द कर दे । पुनः अंगार के ऊपर ही उनको घुमाकर (झोंककर)
नीचे-ऊपर कर रख दे । जब
१४ पाकदर्पणम्
तदर्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
स्थाल्यां पक्वेऽथ पयसि पूर्ववत् सुद्वेदवित् ।
तत्रैव भिन्नमुद्गांस्तु निक्षिपेन्निष्पचेत्पुनः ॥ ८१ ॥
गतेषु तेषु मुद्गेषु किञ्चित् पाकं प्रयत्नतः ।
समालोक्य पुनस्तत्र निक्षेपेत्क्षालितण्डुलान् ॥ ८२ ॥
कुक्कुटस्यामिषं पिष्ट्वा पूर्ववद्भर्ज्य निक्षिपेत् ।
मुद्गतण्डुलमांसानां समपाकं यदा भवेत् ॥ ८३ ॥
तथा पचति पाकज्ञः प्रदद्यादन्नमुत्तमम् ।
इदं रुचिकरं सम्यक्कायपावकवर्धनम् ॥ ८४ ॥
समीरणहरं सम्यग् वारिदोषहरं परम् ।
तहरीत्युच्यते सद्भिरिदमन्नं शुभावहम् ॥ ८५ ॥
**तहरी बनाने की विधि तथा गुण—**पाकशास्त्र को जाननेवाला पाचक पूर्व-
वत् पके उत्क्राणोदक को भोजन-निर्माण पात्र में रक्खे और उसी में मूँग के दाल
को छोड़ दे तथा पकावे । मूँग के दाल के गल जाने पर प्रयत्न पूर्वक थोड़ा पका
हुआ जान कर उसमें जड़हन के चावल को छोड़ दे और पुनः मुर्गी के मांस को
पीसकर तथा कड़ाही में भूनकर छोड़ दे । जब तक मूँग, चावल तथा मांस एक
साथ पाक न हो जाय तब तक पाकज्ञ पाचक पकावै और इस उत्तम अन्न को खाने
के लिये दे । यह मुद्ग-तण्डुल-मांसान्न रुचिवर्द्धक, अच्छी तरह जाठराग्निवर्द्धक,
वातनाशक तथा अच्छी तरह जल के दोष को दूर करने वाला है। इस लाभ-
कारक अन्न को सज्जनवृन्द तहरी कहते हैं ॥ ८१-८५ ॥
चित्रपाकीय भक्तभेदनिरूपणम्
कथ्यन्ते भक्तभेदाश्च चित्रपाकसमन्विताः ।
पुष्पैैरनेकैर्बहुभिः सुगन्धैर्वासितेषु च ॥ ८६ ॥
विशालेषु च रम्येषु पूगपादेषु मानवित् ।
सुजातं राजशाल्यन्नं सुपक्वं सुमनोहरम् ॥ ८७ ॥
निक्षिपेतत्तथा योग्यं सुशील भक्तमुत्तमम् ।
सर्वत्र सैन्धवं न्यस्येत् मृगनाभिसकर्पूरम् ॥ ८८ ॥
कुंकुमं हिमतयोञ्च्च केतकीकुसुमं न्यसेत् ।
मातुलुङ्गदलं न्यस्य कुम्भीकुस्तुम्बरी तथा ॥ ८९ ॥
आर्द्रकस्य पलाण्डोश्च शकलान् समुन्निक्षिपेत् ।
जीरकस्य च मेथ्याश्च चूर्णं सर्वत्र निक्षिपेत् ॥ ९० ॥
नलविरचितम् १५
एभिश्चाकलयेद्भक्तं पूगपदेषु संस्थितम् ।
केषाञ्चित् निक्षेपेन्मांसमोदनानां नवं घृतम् ॥ ९१ ॥
**चित्रपाक सम्बन्धी भक्तभेद का निरूपण—**चित्रपाक से युक्त भात के प्रकार
को कहते हैं । प्रमाण को जानने वाला पाचक अनेक बहुत प्रकार के सुगन्धित
पुष्पों से सुगन्धित विशाल एवं मनोहर पूग पद में निर्मित अच्छी तरह परिपक्व
मनोहर, शीतल एवं उत्तम राजशालि का भात यथा योग्य स्थान पर रक्खे ।
सर्वत्र सेन्धा नमक रक्खे । कस्तूरी, कपूर, केशर, शीतल जल तथा केवड़ा का
फूल रक्खे । नींबू के टुकड़ों तथा कुम्भी, कुस्तुम्बरी को रख कर अदरक तथा
पलाण्डु (प्याज) के टुकड़ों को रक्खे । सभी स्थानों पर जीरा तथा मेथी के चूर्ण
को रक्खे । इन पूर्वोक्त द्रव्यों से पूगपद में स्थित भात को आकलन (सुसज्जित)
करे । कुछ पशु-पक्षियों का मांसौदन तथा नया घृत रक्खे ॥ ८६-९१ ॥
लावुकमांसौदननिर्माणविधिः
लावुकस्यामिषं दग्धं दग्धं मेदस्य मेदस्रम् ।
तण्डुलाकारवत्कृत्वा सम्यगाभर्ज्य सर्पिषा ॥ ९२ ॥
निक्षिपेच्छकलैः सार्द्धं पर्पटादिसमुद्भवैः ।
किञ्चिदाज्यं पुनस्तत्र नवनीतसमुद्भवम् ॥ ९३ ॥
मेलयित्वा तु तैस्साकं कुर्यात्पोटलिका पुनः ।
अन्तरालाट्टालके सम्यक् पचेतां पाकवित्तथा ॥ ९४ ॥
इदं चित्रतरं भक्तमेवं कृत्वा प्रदापयेत् ।
अमिषस्योदनश्चायं लावुकस्याति दुर्लभः ॥ ९५ ॥
**लावुक (लावापक्षी) मांसौदन बनाने की विधि—**लावा पक्षी का पका हुआ
मांस तथा पका हुआ घो ले ले । मांस को चावल के आकार का टुकड़ा-टुकड़ा
बनाकर घी में अच्छी तरह भून ले और पर्पट आदि से निर्मित टुकड़ों के साथ
छोड़ दे । पुनः उसमें मक्खन का निकाला हुआ थोड़ा घी मिलाकर उन पूर्वोक्त
द्रव्योंके साथ पोटलिका बनाये और पाक निर्माण को जाननेवाला पाचक अन्तराल
(मध्य में) अच्छी तरह पूर्वोक्त प्रकार से पकावे । इस प्रकार इस चित्र-विचित्र
भात को बना कर खाने के लिये दे । यह लावापक्षी के मांस का मांसौदन अत्यन्त
दुर्लभ है ॥ ९२-९५ ॥
लावुकमांसौदनस्य गुणाः
वृष्यं रोगहरं पथ्यमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ।
श्लेष्मजित् श्रमजिद् बल्यमायुर्वृद्धिकरम्परम् ॥ ९६ ॥
१६ पाकदर्पणम्
लावुक मांसौदन का गुण — लावा पक्षी का मांसौदन वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक,
पथ्य, इन्द्रियों को बल देनेवाला, कफनाशक तथा थकावट को दूर करने वाला है
और अच्छी तरह बलकारक एवं आयुवर्द्धक है ॥ ९६ ॥
कुक्कुटमांसतैलौदननिर्माणविधिः
जाठरः कथितः सम्यक् लावुकस्यामिषोद्भवः । ९७ ॥
कथ्यते ताम्रचूडस्य पिशितस्यौदनः पुनः ।
सैन्धवादीनि वस्तूनि केषाञ्चिन्निक्षिपेद् बुधः ॥ ९८ ॥
पादायुधस्य पलं छित्त्वा दग्ध्वा च पूर्ववत् ।
निक्षिपेत्तिलपिण्याकलेह्येन सह सूदवित् ॥ ९९ ॥
भर्जितं तिलतैलेन रामठं तत्र निक्षिपेत् ।
मेलयित्वा तु कुर्वीत पोटलीः पूर्ववत् पचेत् ॥ १०० ॥
अनैनैव प्रकारेण साधयित्वान्नमुत्तमम् ।
राज्ञे दद्यादिदं विद्वान् कुक्कुटामिषसम्भवम् ॥ १०१ ॥
कुक्कुट (मुर्गा) मांस तैलौदन बनाने की विधि — उदर के लिये हितकर
लावा मांस का बना हुआ मांसौदन कहा गया। अब मुर्गे का मांसतैलौदन
निर्माण कहते हैं। बुद्धिमान् पाचक पुनः सेन्धा नमक आदि वस्तु समूहों को एकत्र
कर छोड़ दे । पूर्वोक्त प्रकार से मांस को तण्डुलाकार काट कर तथा घी में भून
कर पाक शास्त्रवेत्ता पाचक तिल के गीले खली के साथ छोड़ दे । पुनः उसमें घी
में भूनी हुई हींग छोड़ दे। पूर्वोक्त सभी चीजों को मिलाकर पूर्व की तरह पोटली
बनावे और पकावे । इसी प्रकार मुर्गे के मांस से निर्मित उत्तम कुक्कुटतैलमांसौ-
दन को विद्वान् पाचक राजा के लिये खाने को दे ॥ ९७-१०१ ॥
कुक्कुटमांसतैलौदनस्य गुणाः
एतत्कीर्तिकरं नित्यं शरीरस्य हितप्रदम् ।
मरुद्दोषहरं शश्वत् वृष्यं लघुबलप्रदम् ॥ १०२ ॥
कुक्कुट मांसतैलौदन के गुण — यह कुक्कुटमांसतैलौदन यशकारक तथा
शरीर के लिये हितकर है। यह वातविकार को दूर करने वाला निरन्तर वीर्य-
वर्द्धक, हल्का तथा बलकारक है ॥ १०२ ॥
सूक्ष्ममांसौदननिर्माणविधिर्गुणाश्च
अन्नञ्च दर्शितं रम्यं कुक्कुटामिषसम्भवम् ।
सूक्ष्ममांसौदनं रम्यं कथ्यते क्रमशस्ततः ॥ १०३ ॥
नलविरचितम् १७
भक्तानां निक्षिपेत्तेषां सैन्धवादीन् सुबुद्धिमान् ।
सूक्ष्ममांसं न्यसेत् पक्वं पुनः तण्डुलभक्तिकी ॥ १०४ ॥
कैटर्यपत्रसंभूतलेह्यं तत्र समाविशेत् ।
तिलपिष्टेन रचितं षट् चूर्णं तत्र निक्षिपेत् ॥ १०५ ॥
हिंगुञ्च भर्जितं दद्यात् तैलं च तिलसम्भवम् ॥ १०६॥
सममेभिर्मेलयित्वा भक्तं तत् पूर्ववत् पचेत् ।
कृत्वान्नमेतदेवञ्च प्रदद्यात् प्राणकारणम् ॥ १०७ ॥
रुच्यं श्लेष्महरं रम्यं सुराणामपि दुर्लभम् ॥ १०८ ॥
सूक्ष्म मांसौदन बनाने की विधि तथा गुण — मुर्गा के मांस से निर्मित स्वादिष्ट
भात को मैंने बनाया। अब स्वादिष्टसूक्ष्ममांसौदन को क्रमशः कह रहा हूँ। बुद्धि-
मान् पाचक उन अन्नों में सेन्धा नमक आदि छोड़ दे। इसके बाद पका हुआ
सूक्ष्म मांस का टुकड़ा छोड़े। पुनः चावल का भात तथा कैटर्य पत्र का बना
हुआ लेह्य पदार्थ उसमें छोड़ दे। पुनः उसमें तिल की पिट्ठी से बना हुआ षट्-
चूर्ण छोड़ दे। इसके बाद भूनी हुई हींग तथा तिल का तेल मिलादे। इस प्रकार
इन सबों के साथ मिलाकर उस अन्न को पूर्ववत् पकाये। इस जीवन प्रदान करने
वाले सूक्ष्म मांसौदन को राजा के लिये दे। यह सूक्ष्म मांसौदन रुचिकारक,
वातनाशक, मनोरम तथा देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ १०३-१०८ ॥
प्रश्नोत्तररूपेणान्नस्य विषाक्तत्वनिराकरणम्
युक्तं भक्तं त्वयाप्युक्तं विषवद्भाति बाहुक ॥
अस्माभिर्भुज्यते भक्तं कथं च विषदूषितम् ॥ १०९ ॥
अमृतद्रव्यसंयुक्तं भुक्तमन्नं मया प्रभो ! ।
न कापि विषसंयुक्तमन्नं वै कथितं मया ॥ ११० ॥
प्रमादेन यदुक्तञ्च सत्यं तद्ब्रूत पार्थिव ! ।
बाहुकस्य वचः श्रुत्वा राजैनमिदमब्रवीत् ॥ १११ ॥
प्रश्नोत्तर के रूप में अन्न विषाक्तता का निराकरण — विविध संमिश्रित अन्न
निर्माण विधि एवं गुण को सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने पूछा कि हे बाहुक ! आपने
कहा है कि युक्तिपूर्वक बनाया हुआ भी अन्न विषसदृश हो जाता है। तब हमलोग
विष दूषित अन्न को कैसे भोजन करते हैं। इस बात को सुनकर बाहुक नल ने
कहा कि हे राजन् ! अमृत द्रव्य से युक्त उचित अन्न को मैंने कहीं भी विषयुक्त अन्न
नहीं कहा है। यदि मैंने प्रमादवश सचमुच कहा है तो आप कहें। इसप्रकार बाहुक
की बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने पूर्वोक्त आख्यान को बताया ॥ १०९-१११ ॥
प्रथम खण्ड: सूप, ओदन (चावल), शाक एवं व्यंजन निर्माण विधि
१८ पाकदर्पणम्
नलोक्तान्योन्यद्रव्यसंसर्गजविषनिरूपणम्
श्रूयतां पाचकश्रेष्ठ ! त्वदुक्तं गरलं पुनः ।
सर्वं वस्तुस्वरूपेण सुधा भवति वै ध्रुवम् ॥ ११२ ॥
अन्योन्यद्रव्यसंसर्गाद्विषं भवति वै तृणम् ।
अत्रापि तैलसंसर्गात् कर्पूरस्य कृतं त्वया ॥ ११३ ॥
इदं हि गरलं प्रोक्तं प्राणिनां दृश्यते मृतिः ।
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा बाहुकः पुनरब्रवीत् ॥ ११४ ॥
नल कथित अन्योन्य द्रव्यसंसर्गज विष का निरूपण—राजा ऋतुपर्ण ने नल
के कथन को स्मरण दिलाया कि हे पाचकश्रेष्ठ बाहुक ! तुमने संसर्गज विष का
निरूपण किया है। सभी द्रव्य अपने स्वरूप में निश्चय ही अमृत के समान होते
हैं। किन्तु विभिन्न द्रव्यों के संसर्ग से तृण भी विष हो जाता है। यहाँ पर भी
आपने तैल के संसर्ग से कर्पूर को विष बताया है। इसको गरल (संसर्गज विष)
कहते हैं और इससे प्राणियों की मृत्यु होती है। इस प्रकार राजा के वचन सुनकर
बाहुक ने उत्तर दिया ॥ ११२-११४ ॥
संसर्गजविषनिराकरणपूर्वक ममृतत्वनिरूपणम्
सत्यमुक्तं महाराज ! नत्वेतद् गरलं भवेत् ।
किन्तु पीयूषसदृशमन्नमेतद् भवेद् ध्रुवम् ॥ ११५ ॥
सत्यं संगविशेषेण विषमप्यमृतायते ।
हरिसन्निधिमात्रेण शेषो निर्विषतां यथा ॥ ११६ ॥
तथायोगस्तु कर्पूरंतैलयोरमृतायते ।
मांसशाल्यन्नयोगाद्धि तद्विषं निर्विषायते ॥ ११७ ॥
सूदस्य हस्तकरणममृतं तद्द्भवेद्ध्रुवम् ।
तदेतन्मात्रया युक्तं विषमप्यमृतं भवेत् ॥ ११८ ॥
अमात्रयाभिसंयुक्तममृतं विषमेव तत् ॥ ११९ ॥
संसर्गज विष का निराकरणपूर्वक अमृत स्वरूप का निरूपण- हे महाराज !
आपने सत्य कहा है किन्तु मैंने जो मांसोदन पदार्थ निर्माण किया है वह गरल
(संसर्गज विष) नहीं होता है। किन्तु निश्चय ही वह अन्न अमृत सदृश
होता है। यह सत्य है कि विशिष्ट पदार्थ का संसर्ग होने से विष भी अमृत हो जाता
है। जैसे भगवान् विष्णु के संसर्ग से शेषनाग भी निर्विष हो जाते हैं उसी प्रकार
कर्पूर और तैल का संयोग भी अमृत सदृश हो जाता है। कर्पूर तथा तैल का
संसर्गज विष मांस एवं शाल्यन्न के संयोग से निर्विष हो जाता है। पाचक के
नलविरचितम् १९
हाथ से बनाया हुआ वह निश्चय ही अमृत हो जाता है। वह विष भी उचित
मात्रा में मिलने पर विष अमृत हो जाता है, किन्तु विषम मात्रा (अनुपयुक्त
मात्रा) में मिलने पर अमृत भी विष हो जाता है ॥ ११५-११९ ॥
स्वकृतपाकप्रशस्तिः
नानाद्रव्यसमन्वितं बहुगुणं प्राणस्वरूपन्नृणाम्
धातूनाञ्च विवर्धनं कलिमलध्वंसं त्रिवर्गप्रदम् ।
नानाव्याधिहरं परत्र हिमकृत्कायस्य कान्तिप्रदम्
पीयूषालयमीदृशञ्च न हि तं भक्तं मया साधितम् ॥ १२० ॥
स्वकृत पाक की प्रशंसा—मैंने विविध द्रव्यों से युक्त अनेक गुणवाला मनुष्यों
के प्राणस्वरूप, धातुओं (रस-रक्त-मांस-भेदादि) को बढ़ाने वाला कलिकाल के
मल (रोगादि) की नाश करने वाला, त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) देने वाला,
अनेक व्याधियों को दूर करनेवाला, दूसरों का हित करने वाला शरीर की शोभा
को बढ़ाने वाला अमृत भण्डारस्वरूप अन्न का निर्माण किया है। मैंने आपके
कथनानुसार विषाक्त अन्न का निर्माण नहीं किया है ॥ १२० ॥
सूपानां निर्माणविधिः
कुलित्थमाषनिष्पावतुवरीचणकादयः ।
शूर्पेण शोधयेत् सम्यक् मुद्गादीन्चितुषीकृतान् ॥ १२१ ॥
पचेत्प्रवण्यां पाकज्ञः समभागोदकैश्च तान् ।
पक्वे सूपे समालोक्य यथाहं सैन्धवं क्षिपेत् ॥ १२२ ॥
सुवर्णार्थञ्च तत्रैव निशाचूर्णं विनिक्षिपेत् ।
पुनश्च वासनाथंन्तु यथाहं हिंगु निक्षिपेत् ॥ १२३ ॥
दर्वीपुटेन निर्मथ्य पयसा लोडयेच्च तम् ।
कर्पूरपुष्पमुख्यैश्च सुहृदश्वाधिवासयेत् ॥ १२४ ॥
एवं मत्साधितं सूदः प्रदद्यात् सूपमुत्तमम् ॥ १२५ ॥
सूप (दाल) बनाने की विधि—कुरथी, उड़द, भटवास, अरहर तथा चना
आदि को सूप से अच्छी तरह साफ करे और पाचक भूसी रहित मूंग आदि के
दाल को समान भाग जल के साथ बटलोही में पकावे । पका हुआ दाल देखकर
उचित मात्रा में सेन्धा नमक छोड़ दे। दाल को सुन्दर रंग वाला बनाने के लिए
उस में हल्दी का चूर्ण मिला दे। उसमें सुगन्ध लाने के लिये पुनः उचित मात्रा
में हींग (घृतभर्जित) छोड़ दे। इसके बाद कलछुल से अच्छी तरह मथ कर
जल मिला दे। तदनन्तर कर्पूर तथा विभिन्न सुगन्धित पुष्पों से अच्छी तरह सुवा-
४ पा.द.
२० पाकदर्पणम्
सित (सुगन्धित) कर ले। इस प्रकार मेरा बनाया हुआ उत्तम स्वादिष्ट दाल
पाचक राजा के लिये दे ।। १२१-१२५ ।।
सूपस्य गुणाः
अयं रुचिकरात्सूपः रुच्यः पित्तविनाशकः ।
सर्वैर्गुणैस्समाविष्टो लघुरूपो निरामयः ।। १२६ ।।
दाल के गुण—पूर्वोक्त प्रकार से निर्मित दाल मन के अनुकूल होने से रुचि-
कारक एवं पित्तनाशक होता है। यह सभी गुणों से युक्त, हल्का तथा आरोग्यप्रद
होता है ।। १२६ ।।
विशिष्टसूप (द्विदल) निर्माणविधिः
सामान्यसूपस्सुपोऽत्र कथितो व्यञ्जनाग्रणीः ।
अत्र सिंहासनारूढः कथ्यते सूपभूपतिः ।। १२७ ।।
तेषां मध्ये समाधाय मुद्गोहितकरं परम् ।
तिलतैलेन संमृज्य तक्राम्ले तत्र लोडयेत् ।। १२८ ।।
शोषयित्वाऽऽतपे तन्तु भिन्नं कुर्यात् हरदृके ।
अपक्वतण्डुलोप्तेऽत्र साकं सूदस्तुषैश्च तम् ।। १२९ ।।
पूरयित्वाधितिष्ठेच्च दिनानि दशपञ्च च ।
मुसलेन सुतं यावद् भवेत्तावत् प्रसादयेत् ।। १३० ।।
एवञ्च निस्त्वचं कृत्वा क्षालयेद् वारिणा च तम् ।। १३१ ।।
विशेष प्रकार का दाल तैयार करने का प्रकार—बाहक नल ने बताया कि
मैंने सभी व्यञ्जनों में श्रेष्ठ सामान्य दाल का निर्माण बताया। अब यहाँ पर
सिंहासनारूढ (राजासन पर बैठे हुए) दालों के राजा को कहता हूँ। पूर्वोक्त
कुरथी, उड़द, मूँग आदि शिम्बी धान्य में से उत्तम हितकारक मूँग को लेकर
तिल तैल से मींजकर खट्टे मठ्ठे में भिगो दे। इसके बाद उसको धूप में सुखा
कर हरहक (दाल दलने की चकरी) में दरकर अलग-अलग कर ले। इसके
बाद उसको कच्चे चावल के पात्र में धान की भूसी के साथ रखकर दस-पन्द्रह
दिन रहने दे। पुनः निकाल कर मुसली के आघात से जब तक वह स्वच्छ-मुलायम
न होजाय तब तक स्वच्छ करे। इस प्रकार दाल की भूसी निकाल कर जल से
धो दे ।। १२७-१३ १।।
विशिष्टसूपपाकविधिः
भिन्नमुद्गसमं तोयं प्रवण्वां सेचयेद्बुधः ।
तस्मिन् पयसि शोभार्थं निशाचूर्णं च निक्षिपेत् ।। १३२ ।।
नलविरचितम् २१
रामठं च तथा क्षीरमासिञ्चेत्तत्र मानवित् ।
चुल्ल्यामारोप्य तान् विद्वान् जले बुद्बुदसंयुते ।। १३३ ।।
निक्षिपेत् क्षालितं पक्वं तुषादिवितुषीकृतम् ।
ईषन्मृदुत्वे जातेऽस्मिन्नवतार्य स्रावेदबुधः ।। १३४ ।।
तमादाय पुनः पूगपट्टनेत्रेषु निक्षिपेत् ।
सैन्धवं च यथायोग्यं तत्रैव परिनिक्षिपेत् ।। १३५ ।।
कुर्वीत वासेन सम्यक् कर्पूरप्रमुखैश्च तम् ।
वासितं तं पुनः सम्यग् वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।। १३६ ।।
विशेष प्रकार से दाल पकाने की विधि—बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से
भूसीरहित मूँग की दाल के बराबर जल बटलोही में रक्खे और उस जल में शोभा
बढ़ाने के लिए हल्दी का चूर्ण छोड़ दे। इसके बाद प्रमाण को जानने वाला
पाचक हींग तथा दूध छोड़ दे। विद्वान् पाचक उनको चूल्हे पर रखकर बुदबुद
शब्द जल में होने पर भूसी आदि से रहित धोये हुए परिपक्व दाल को मिला-
दे। थोड़ा मुलायम हो जाने पर उतारकर जल को निकाल दे। इसके बाद
उसको लेकर पुनः सुपारी पात्र के मध्य में रख दे और उचित मात्रा में
सेन्धानमक मिला दे। इसके बाद कर्पूर आदि प्रमुख सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित
बना कर तथा पुनः अच्छी तरह लपेटकर खाने के लिये राजा को दे। यह दक्षिण-
भारतीय "मसाल डोसा" का स्वरूप हो सकता है ।। १३२-३६।।
विशिष्टसूपपाकस्य गुणः
अयं स्वादुतरः रूपः सर्वेषां हितकृद्बली ।
स्निग्धो मनोहो रूपः सद्यः पित्तविमर्दकः ।। १३७ ।।
विशिष्ट परिपक्व दाल के गुण—पूर्वोक्त विशिष्ट प्रकार से निर्मित परिपक्व
दाल अत्यन्त स्वादिष्ट, सभी के लिये हितकर, बलकारक, स्निग्ध, मनोहर रूप-
कारक तथा शीघ्र ही पित्तनाशक होता है ।। १३७ ।।
अन्यविधसूपपाकविधिर्गुणाश्च
तादृशं मुद्गमादाय प्रवण्वां पाचयेद् बुधः ।
सम्यक् पक्वे ततः सूपे सैन्धवं हिंगु च क्षिपेत् ।। १३८ ।।
सूपमेवंविधं विद्वान् वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
शनैः शलाकयालोड्य राजे तञ्च प्रदापयेत् ।। १३९ ।।
अयं स्वादुतरः सूपः प्रोक्तो लोकहितप्रदः ।
वृष्यः सुधासमः सद्यः सुराणामपि दुर्लभः ।। १४० ।।
अन्य प्रकार का दाल बनाने की विधि तथा गुण—बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त
२२ पाकदर्पणम्
प्रकार के मूँग की दाल लेकर बटलोही में पकावे । अच्छी तरह दाल के पक जाने
पर सेन्धानमक तथा हींग छोड़ दे । विद्वान् पाचक इस प्रकार के दाल को कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर ले । इसके बाद कलछुल से धीरे चलाकर
दाल को राजा के लिये दे । यह स्वादिष्ट दाल संसार के हित के लिये कहा गया
है । अमृत समान दाल सद्यः वीर्यवर्द्धक है और देवताओं को भी दुर्लभ है ।
सूपप्रशस्तिः
माषादिसामन्तनृपैरनेकैः रम्भाप्रसूनप्रमुखैर्बलौघैः ।
शाल्यन्नसिंहासनगो विभाति घृतात्तपत्रः खलु सूपभूपः ॥ १४१ ॥
सूप (दाल) की प्रशंसा—माष (उड़द) अरहर आदि रूप अनेक सामन्त
राजाओं से तथा केला, पुष्प आदि रूप प्रमुख सेनासमूहों से घृत रूप छत्र से युक्त
सूपराज मूंग की दाल शालि (जड़हन चावल का) भातरूपी सिंहासन पर स्थित
होकर सु शोभित हो रहा है ॥ १४१ ॥
तेमनतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्चः
सप्रभेदः सूपभेदः कथितः कथ्यते खलु ।
जातितोलुलितं तक्रं तिलतैलेन संयुतम् ॥ १४२ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तं कुसुमैरधिवासयेत् ।
मुहूर्त्तमात्रं संस्थाप्य कुसुमानि परित्यजेत् ॥ १४३ ॥
लशुनार्द्रकयोः खण्डान् पुनस्तत्र विनिक्षिपेत् ।
कुम्भीदलं च धान्याकं शुण्ठीचूर्णं च निक्षिपेत् ॥ १४४ ॥
सैन्धवं च यथा योग्यं जम्बीराम्लञ्च निक्षिपेत् ।
रामठं तत्र निक्षिप्य कुर्यादालोडनं बुधः ॥ १४५ ॥
चुल्यां पचेच्च तं तक्रं दवघट्टनपूर्वकम् ।
पाकार्थं निक्षिपेत्तत्र शुचिभिन्नमरीचिकाः ॥ १४६ ॥
तद्यावतां कटु भवेत्तावत् पाकावतारयेत् ।
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्यामस्यां प्रदापयेत् ॥ १४७ ॥
दर्वीविघट्टनं कृत्वा तेमनं तत्र निक्षिपेत् ।
पिधानेन समाच्छाद्य तन्मुखं तत्पुनः पचेत् ॥ १४८ ॥
प्रकृतेऽस्मिन् तदादाय मातुलुंगदलं क्षिपेत् ।
कर्पूरं मृगनाभि च केतकी कुसुमं न्यसेत् ॥ १४९ ॥
स्वादु पथ्यं लघुतरं तेमनं तत्र सम्भवम् ।
आरोग्यदं रोगहरं वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५० ॥
नलविरचितम् २३
तेमन तक्र (मट्ठा) बनाने की विधि तथा गुण—सूप (दाल) के विविध
भेद को मैंने कहा । अब तेमन तक्र को कहता हूँ। अच्छी तरह मथा हुआ तक्र
(मट्ठा) तिल तैल के साथ मिला दे और सुगन्ध से युक्त कर फूल से सुवासित
कर दे । पुष्पों को मट्ठा में थोड़ा देर रखकर निकाल दे । इसके बाद लहसुन
तथा अदरक के टुकड़ों को उसमे छोड़ दे । पुनः कट्फल का पत्र, धनिया तथा
सोंठ का चूर्ण, उचित मात्रा में सेन्धानमक तथा जम्बीरी नीबू छोड़ दे । इसके
बाद उसमें हींग छोड़कर बुद्धिमान् पाचक अच्छी तरह मिला दे । इन द्रव्यों से
युक्त तक्र को कलछुल से चलाते हुए चुल्ही के ऊपर पकाये । उसमें पाक के लिये
शुद्धमरिच का चूर्ण छोड़ दे । जब तब वह कड़ुआ न हो जाय तब तक पाक करे ।
वटलोही में रखकर चूल्हे के ऊपर रखे । कलछुल से चला कर उसमें "तेमन"१
छोड़ दे, और ढक्कन से उसका मुँह ढँक कर पुनः पाक करें । अच्छी तरह परि-
पाक हो जाने पर विजोरा नीबू का दल छोड़ दे इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी
तथा केवड़ा का फूल रक्खे । इस प्रकार तैयार "तेमन तक्र" स्वादिष्ट, पथ्यकारक
तथा हल्का होता है। यह आरोग्यप्रद, रोगनाशक, वात-कफ को दूर करनेवाला
तथा कल्याण कारक होता है ॥ १४२-१५० ॥
'खलतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पुनर्नवा तथा वह्निघजाजीतक्रसमुद्भवम् ।
वासितं घनशारेण वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५१ ॥
खलं गुल्महरं शीघ्रं पुष्पैश्च सुमनोहरैः ।
अशीतिवातजान् रोगान् जठरानलवृद्धिकृत् ॥ १५२ ॥
खल तक्र बनाने की विधि तथा गुण—पुनर्नवा, चित्रक, अजाजी (जीरा)
तथा तक्र से बनाया हुआ कर्पूर तथा मनोहर पुष्पों से सुवासित किया हुआ "खल
तक्र"२ शीघ्र ही गुल्म रोग को दूर करता है। यह अस्सी प्रकार के वात रोगों
को नाश करता है तथा जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १५१-१५२ ॥
१. व्यञ्जनं सूपशाकादि मिष्ठान्न तेमनं स्मृतम्—(रा० नि० २०) ।
२. मालवे व्यञ्जनविशेषः । मातुधानीयकपुष्पैर्योषितगुणः स "खल" इत्युच्यते ।
फलमूलैर्धनादानं व्यञ्जनं पाकतो घनम् । लेहवत् खल इत्यन्ये दोषलाः स्व
स्व योनिवत् ।। कल्को विल्वशलाटूनां तिलकल्कश्च तत्समः । दध्नः सरोऽम्लः
सस्नेहः खलो हन्ति प्रवाहिकाम् । श्रीकुक्कुटः अपराजितश्च नामपरो खला-
वपि । (वा० चि०-९।१२) ।